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कश्मीर: कुलगाम मुठभेड़ क्या कहता है? राख में चिंगारी बाकी है

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 14 February 2017, 10:06 IST
(फाइल फोटो )

रविवार सुबह, जब सुरक्षा बलों ने कुलगाम के फ्रिजल गांव में अब्दुल मजीद रेशी के घर की घेराबंदी की, उन्हें आशंका थी कि स्थानीय गांववाले आतंकियों को बचाने की कोशिश कर सकते हैं. लिहाजा वे बिना किसी हलचल के मुठभेड़ स्थल पर पहुंचे थे. पर गांव वाले बहुत ही कम समय में एनकाउंटर साइट पर पहुंच गए. इसके बाद दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गई. आतंकियों को सुरक्षाबलों की घेराबंदी से बच निकलने में मदद करना अब कोई बड़ी बात नहीं रही. कश्मीर में आए दिन ऐसा हो रहा है और स्थानीय लोगों के सहयोग से हो रहा है.

नतीजतन इस ऑपरेशन से आतंकियों का सफाया तो हुआ नहीं उल्टे दो सिपाही और दो नागरिक जरूर मारे गए. उनमें एक इशफाक मजीद रेशी थे, उस घर के मालिक के बेटे. दूसरे नागरिक की पहचान 22 वर्षीय मुश्ताक अहमद इटू के तौर पर हुई, जो पड़ोसी हाथीगाम गांव का रहने वाला था.

अलग-अलग क्षेत्रों में करीब पंद्रह और लोग गोलियों से घायल हुए. उनमें लस्सीपोरा के ओवैस अहमद को सीने में गोली लगी है. उनकी स्थिति नाजुक बताई जा रही है. उन सबको इलाज के लिए श्रीनगर के अस्पतालों में भर्ती किया गया है.

अशांति की आशंका


एक दिन में 9 लोगों की मौत से कश्मीर वापस अशांति के कगार पर आ गया. और वह भी तब जब सर्दी का मौसम बीत रहा है, खुशनमा बसंत आ चुका है. कारोबार और पर्यटन की रौनक बढऩे की उम्मीद बन रही थी. सबसे बड़ी बात तो यह कि लोग बीती गर्मी की अशांति की पीड़ा और कड़वाहट भूलने लगे थे.

इन मौतों ने बुरहान वानी के मौत के बाद पैदा हुई अशांति की याद ताजा कर दी. लगता है कि अशांति खत्म नहीं हुई है, सिर्फ थमी है, किसी भी समय फिर से भडक़ सकती है. रविवार को जो हुआ, उसे अगर संकेत मानें तो हालात एक अलग स्तर पर पहुंच चुके हैं. हाल के सालों में, आतंकियों के अंतिम सस्कार में बढ़ती भागीदारी से उनके लिए खुलकर समर्थन में तेजी दिखी. युवा वक्ता ‘शहीदों के मिशन’ को आगे ले जाने की कसमें खाते नज़र आ रहे हैं.

कुछ समय के लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट्स और टिप्पणियों में जन समर्थन नजर आ रहा था. इस ट्रेंड की प्रेरणा बुरहान ने खुद दी थी. सुरक्षा एजेंसियों द्वारा वेब पर नजर रखने से पहले, आजादी के लिए रोज ऑनलाइन संवाद की प्रेरणा देता था. पर अब लोग अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए अंतिम संस्कार का इंतजार नहीं करते, बल्कि फंसे हुए आतंकियों को बच निकलने या उन्हें भागने के लिए सीधा कदम उठाना ज्यादा ठीक समझते हैं, पहले से भी कहीं ज्यादा.

 

अब खुलकर भागीदारी

 

फ्रिजल की घटना सबसे ताजा और हिंसक उदाहरण है, जहां लोगों ने सीधा एक्शन लिया. लोग काफी संख्या में आगे आ रहे हैं और आतंकियों को छुड़ाने के लिए मरने-मारने को तैयार हैं. ऐसी स्थिति में सुरक्षा बलों को एनकाउंटर की साइट पर लोगों को पहुंचने से रोकने में ही अपनी बड़ी ऊर्जा और संसाधनन झोंकने पड़ते हैं. फ्रिजल की घटना में हुई दो मौतें और 15 घायलों की संख्या से सिद्ध होता है कि सुरक्षाबलों के सामने अराजक भीड़ पर सीधा गोली चलाना या पैलेट गन इस्तेमाल करना मजबूरी बन गई है. फ्रिजल में दोनों का इस्तेमाल हुआ.

सिहरा देने वाली इस वास्तविकता को उस समय के वायरल हुए एक वीडियो से महसूस किया जा सकता है. गुस्साई भीड़ के बीच से एक युवा ने चिल्लाकर नारे लगाए और पुलिस पर ताना कसा- ‘1500 रुपए का सरकारी नौकर.’ तभी उनमें से एक जो आगे था और सुरक्षाकर्मियों को नजर आ जाता है, वे उस पर गोली चलाते हैं, टांग पर. वह अपने साथियों को बताता है, ‘मुझे गोली मारी, मुझे गोली मारी. घाव पर तुम्हारा मफलर लपेट दो.’

आतंकियों का भी यही हाल


यही हाल आतंकियों का है. जनवरी के मध्य में, सुरक्षा बलों ने खूबसूरत पहलगाम के गांव अवूरा में तीन आतंकियों को खोज निकाला. पर गोलीबारी शुरू होने से पहले, आतंकियों ने अपनी लड़ाई की तैयारी का झटपट वीडियो बना लिया और वॉट्सएप पर सर्कुलेट कर दिया.

फोन कैमरे पर एक आतंकी ने कहा, ‘घर के इस मालिक पर कोई भी गड़बड़ी के लिए संदेह नहीं करे. हम जानते हैं कि किसने पुलिस को खबर दी है. पर चिंता नहीं करें, हम अंत तक लड़ेंगे.’ उसके ठीक बाद तीनों मारे गए.

 

चिंताजनक सवाल


इससे घाटी में जो कुछ चल रहा है, उसे लेकर कुछ चिंताजनक सवाल उठे हैं. यदि पिछली गर्मी में करीब सौ लोगों की मौतें और सैकड़ों लोगों के अंधा होने के बावजूद लोग हिंसा और ताकत के इस्तेमाल को लेकर लगभग निडर और विद्रोही हो चुके हैं. नई दिल्ली में बैठे लोगों को हमले की इस बदली प्रकृति पर विचार करने का यह अंतिम समय है. उससे पहले कि यह विरोध और भी खतरनाक रूप ले ले. कश्मीर में गर्मिया बस शुरू होने वाली हैं.

फ्रिजल की मौतों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की स्थानीय आतंकियों तक पहुंच उम्मीद के अनुसार नहीं है. अब तक उनमें से महज 6 युवा घर लौटे हैं, जिन्होंने बंदूकें हाथ में ले ली थीं. एक पुलिस अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘अधिकांश स्थानीय आतंकी आत्मसमर्पण का प्रस्ताव ठुकरा देते हैं और अपने घरवालों के निवेदन तक को मानने से इनकार कर देते हैं. जब आतंकी गोलियां चलाना शुरू करते हैं, तो हमारे पास सिवाय पलट कर हमला करने के और कोई विकल्प नहीं रहता.’

 

First published: 14 February 2017, 10:06 IST
 
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