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जम्मू-कश्मीर लोकसभा उपचुनाव: दिग्गज फारूक़ अब्दुल्ला से सीधे मुकाबले में 25 साल का एक युवा

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 March 2017, 9:50 IST

 

मेहराज खुर्शीद मलिक 25 बरस के हैं लेकिन शक्ल सूरत से वे छोटे बच्चे जैसे मासूम लगते हैं. वो श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव के लिए एकमात्र निर्दलीय उम्मीदवार हैं और उनका सीधा मुकाबला नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला से है.


मलिक कहते हैं, ‘‘मुझे मालूम है कि राजनीति में मैं नया हूं. मगर मुझे यक़ीन है कि मैं अब्दुल्ला को हरा सकता हूं.’’ वे हर सुबह श्रीनगर के हैदीपोरा स्थित अपने घर से निकल कर लोकसभा क्षेत्रों फकीर गूजरी, गंड हसीपोरा और बीरवाह के निवासियों से मिलते हैं. वे कहते हैं मेरे शुभ चिंतक और जानने वाले मेरे जनसम्पर्क का कार्यक्रम तय करते हैं. इसलिए मैं घर-घर जाकर लोगों से मेरे लिए वोट अपील कर रहा हूं.’’

 

चुनाव के लिए लौटे कश्मीर?


मलिक ने अपना ज्यादातर वक्त घाटी के बाहर ही गुजारा है. उनकी प्रारंभिक शिक्षा जम्मू के केंद्रीय विद्यालय में हुई. उसके बाद उन्होंने चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की डिग्री ली. कुछ वर्षों पूर्व मलिक ने बेंगलुरू में माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी की लेकिन वे कहते हैं, ‘‘कश्मीर में चुनाव लड़ने के लिए मैं वह नौकरी छोड़ कर यहां आ गया.’’


चुनाव लड़ने के पीछे मलिक का तर्क कुछ इस प्रकार है, ‘‘मैं नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का वैकल्पिक नेतृत्व उपलब्ध करवाने के लिए राजनीति में आया हूं. इन पार्टियों ने हमें कुछ नहीं दिया सिवाय दुखों और मौतों के.’’ घाटी में मलिक का राजनीतिक संघर्ष देखने लायक होगा. दरअसल मलिक के समर्थकों के एक छोटे से समूह के अलावा कोई यह जानता ही नहीं कि वे चुनाव लड़ भी रहे हैं. उनके चुनाव लड़ने की अहमियत इसलिए है कि वे प्रदेश की राजनीति में उम्मीदवारी की हिमाकत कर रहे हैं.

 

बड़ा संदेश


एक ऐसी जगह जहां युवा आईएएस बनने से पहले कई बार सोचता है और उग्रवादियों को हीरो की तरह पूजा जाता है, वहां एक युवा के राजनीति में आने के पीछे सत्ता के साथ मिलीभगत जरूर हो सकती है ना कि जनता की भलाई. मलिक कहते हैं, 'वे अब घाटी के दोनों राजनीतिक पक्ष स्थापित राजनीति बनाम वर्गवादी राजनीति से इतर चुनावी राजनीति का हिस्सा हैं. वैसे भी असल चुनावी मुकाबला तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला और पीडीपी के नाजिर अहमद खान के बीच है. उनकी उम्मीदवारी तो बस नाम मात्र की है.


दूसरी लोकसभा सीट जिस पर उपचुनाव होना है, वह है अनंतनाग. यहां मुख्य मुकाबला मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के भाई सौदक मुफ्ती और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर के बीच है. बीते 7 जनवरी 2016 को मेहबूबा ने अपने पिता की मौत के बाद मुख्यमंत्री पद संभालने के लिए अनंतनाग लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था. उनके अलावा श्रीनगर से पीडीपी सांसद तारिक हमीद कर्रा ने पिछले साल विरोध प्रदर्शनकारियों की मौत और उन्हें अंधा करने के विरोध में इतीफा दे दिया था. कर्रा अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.

 

चुनावों की अहमियत


कश्मीर में पिछले साल रही अशांति के कारण इन लोकसभा उपचुनावों की अहमितयत और बढ़ जाती है. एक तरह से यह राज्य में पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार की लोकप्रियता पर जनमत संग्रह जैसा होगा. पीडीपी पर गत वर्ष प्रदर्शनकारियों पर ज्यादती करने के अरोप लग चुके हैं.

मगर मूलतः उपचुनाव पूरी तरह मतदान में हिस्सा लेने वाले लोगों पर निर्भर होंगे. पूर्व में ऐसा हो चुका है कि अलगाववादियों द्वारा बहिष्कार की घोषणा के बीच घाटी में तनाव व अशांति के बाद जनता ने मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. 2008 में अमरनाथ जमीन विवाद के चलते 60 लोगों की मृत्यु हो गई थी, उसके तुरंत बाद हुए चुनाव में जमक र मतदान हुआ था. इसके बाद के घटनाक्रम ने हुर्रियत को हैरत में डाल दिया था. शोपियां में दो महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या की कथित घटना के बाद 2009 के चुनावों मे भी रिकॉर्ड मतदान दर्ज हुआ.


इस प्रकार मतदाताओं ने अलगाववाहिदयों के हौंसले पस्त ही किए हैं. जनता हुर्रियत के मतदान का बहिष्कार करने के विरोध में जमकर वोट डालती है. आगामी लोकसभा उपचुनाव में भी शायद इतिहास दोहराया जाए? चुनाव बहिष्कार के कट्टरपंथी समर्थक भी इस बारे में कुछ नहीं कह सकते. निचले शहर में आजादी के समर्थक रफीक अहमद खान ने कहा, ‘‘मुझे लगता है ज्यादा लोग मतदान नहीं करेंगे. लेकिन किसे पता कि क्या होगा? हो सकता है मतदान वाले दिन फिर से रिकॉर्ड वोटिंग हो.’’

चुनाव बहिष्कार या मतदान ना होने से चुनाव प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ज्यादा से ज़्यादा यह हो सकता है कि बहिष्कार के चलते मतदान प्रतिशत में कमी आए. यही एक संभावना है, जिसके चलते मलिक जैसे कम लोकप्रिय नेता को चुनावी फायदा मिल सकता है. चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा उम्मीदवार अपने समर्थकों की संख्या वोटों में तब्दील करवा पाया.

संभवतः इसीलिए मलिक दूरदराज के गुर्जर और बकेरवाल्स बहुल इलाकों में दौरा कर रहे हैं, जो लोग वास्तव में वोट डालने आते हैं. शहरी और नजदीकी ग्रामीण इलाकों के मतदाता चुनावों का बहिष्कार कर सकते हैं. मलिक कहते हैं-‘‘मैं कोई जन नेता नहीं हूं. ना ही मैं फारुक अब्दुल्ला हूं. लेकिन मुझे विश्वास है कि मैं चुनाव जीतूंगा. ‘‘अगर मैं जनता तक यह संदेश पहुंचाने में कामयाब रहा कि एक युवा नेता राज्य की तकदीर बदल सकता है तो जरूर जीतूंगा.’’

 

First published: 28 March 2017, 9:50 IST
 
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