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मोदी की कश्मीर नीति में क्या खामी है? इस पर ग़ौर करना फिलहाल सबसे जरूरी है

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:45 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

कश्मीर अपने बच्चों के लिए, मारे गए, ज़ख्मी हुए या अंधे हो चुके लोगों के लिए मातम कर रहा है. लगातार हिंसा, बर्दाश्त से बाहर दुख और गहरी निराशा के नाते उनकी ज़िंदगी पटरी से उतर गई है. कश्मीर में सामान्य हालात बहाल होने के फिलहाल कोई आसार नजर नहीं आते हैं. वहीं दिल्ली में काबिज़ एनडीए सरकार को यकीन है कि हालात काबू में हैं और इनमें सुधार हो रहा है. 

कश्मीर पर सरकार की नई नीति एकतरफ़ा बातचीत करने की बन रही है. सभी 'देशभक्त' भारतीय यह उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सरकारी तंत्र की इस नई विचारधारा को भरपूर समर्थन दिया जाए. इसका मतलब है सुरक्षा के पहलुओं पर कोई सवाल खड़े नहीं किए जाएं. 

कश्मीर के संदर्भ में हमारी इस समझ का मतलब है कि कुछ नहीं करना है. यह राज्य तंत्र को लोगों तक पहुंचने की इजाजत नहीं देता. इस तरह सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए लोगों के परिजनों के दुख में शामिल होने और पैलेट गन से आंशिक या पूरी तरह अंधे हो चुके लोगों के अल्पकालीन या दीर्घकालीन पुनर्वास की कोई कोशिश नहीं होती. सुरक्षा बलों को प्रदर्शनकारियों के  खिलाफ मनमाने बल प्रयोग की मनाही की कोशिशें नहीं की जाएंगी. कम से कम जुलाई की शुरुआत से कश्मीर में जो कुछ हुआ है, बाक़ी भारत में उसकी न्यायिक जांच के आदेश तो दिए जा सकते हैं. 

यहां तक कि राजनीतिक स्तर पर ऐसी पहल नहीं हुई और न कश्मीरी समाज को अपने जख्मों पर मरहम लगाने की इजाज़त दी गई. फिलहाल सरकार के रुख में बदलाव के आसार नहीं लगते हैं. लोगों को चुप कराने के लिए बल प्रयोग की अवधारणा राष्ट्र निर्माण का फार्मूला नहीं है. 

साल 1971 में यही तौर-तरीके पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान में अपनाए थे और सेना के जरिए उन्हें काबू करने की कोशिश की थी. नतीजा, वे उसे पूर्वी हिस्से को पाकिस्तान का अभिन्न अंग बनाए रखने में नाकाम रहे. भारत की छवि लोकतंत्र को बढ़ावा देने, संघवाद और लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले मुल्क की है. ये तथ्य अकेले भारत में ही नहीं उसके पड़ोस में भी परिलक्षित होती है. 

धारा 370 के उलट संधि

भारत में संविधान की धारा 371 ए, बी और सी के तहत नागालैंड, मणिपुर और असम के लोगों को विशेष अधिकार दिए गए हैं. भारतीय संविधान में केन्द्र के राज्यों से संबंध में एकरूपता नहीं है. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इज़ाक मुइवा) के साथ हुई ऐतिहासिक संधि में कई विसंगतियों को नजरअंदाज कर दिया गया. नागाओं की संतुष्टि के लिए संघीय संबंधों पर बातचीत की अनुमति दे दी गई. इस परिप्रेक्ष्य में नागाओं से यह समझौता धारा 370 के एकदम विपरीत है.

विदेश नीति में झोल

भारत ने अपने पड़ोस नेपाल में समुदाय विशेष और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों का अनौपचारिक समर्थन किया था. तीन माह तक चले चक्का-जाम और सीमाबंदी आंदोलन का भारत ने भरपूर साथ दिया मगर यह नीति वास्तविक संघीय, स्थाई और शांतिपूर्ण नेपाल की दिशा में गंभीर भूल थी. 

इसी तरह श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिलों के अधिकारों की खातिर भारत ने पूरा जोर लगाया. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या समेत इसके कई घातक परिणाम हमें भी भुगतने पड़े. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अब भारत पाकिस्तान के दबे-कुचले बलोचों के अधिकारों का खुला समर्थन कर रहा है. इस तरह भारत के लिए नैतिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से यह कहना बहुत मुश्किल है कि स्वायत्तता के मुद्दे पर लंबे समय तक कश्मीरियों के साथ बातचीत से इन्कार कैसे किया जाए?

संक्षेप में सरकार की कश्मीर नीति में गंभीरता से पुनर्विचार की जरूरत है. मौजूदा गतिरोध को दूर करने के लिए कश्मीर के प्रति मानसिक बदलाव के साथ-साथ यह स्वीकार करने में नहीं हिचकना चाहिए कि कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह के सुलझाने की ईमानदार कोशिश हो.

First published: 5 November 2016, 7:59 IST
 
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