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कश्मीर पंडितों की वापसी का प्रस्ताव महज़ खानापूर्ति है: संजय टिक्कू

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:36 IST

कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विस्थापन के 27 साल बाद कश्मीरी पंडितों और अन्य अल्पसंख्यकों की राज्य में वापसी संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया गया. इस प्रस्ताव का मतलब क्या है? क्या यह कोई राजनीतिक स्टंट है? या वाकई में विस्थापित अल्पसंख्यकों के पुनर्वास की दिशा में उठाया गया ठोस कदम.

मामले की तह तक जाने के लिए कैच ने घाटी के कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के प्रमुख संजय टिक्कू के साथ बातचीत की. उनसे बातचीत के अंश:

सवाल-जवाब

सभी अल्पसंख्यकों की वापसी संबंधी उमर अब्दुल्ला के इस प्रस्ताव के बारे में आपका क्या विचार है? इसे आप कितनी गंभीरता से ले रहे हैं? 

अव्वल तो विधानसभा में पारित होने वाले प्रस्तावों का कोई मतलब नहीं है. पहले भी कई प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं. हाल ही में स्वायत्ता को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया गया था, उसका क्या हुआ? इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए नहीं है क्योंकि जमीनी स्तर पर तो कुछ नहीं बदला. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हमारी टाउनशिप के खिलाफ अलगाववादियों का समर्थन किया था. और वही पार्टी अब यह प्रस्ताव ला रही है, हम कैसे विश्वास कर लें?

घाटी में रहते हुए क्या आपको लगता है कि माहौल बदला है? क्या अब कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की राह पिछले कुछ सालों के मुकाबले आसान हो गई है?

पिछले सालों में भारी हिंसा और उथल-पुथल के दौर के बीच, कश्मीर का बहुसंख्यक भी आज उस स्थिति में नहीं हैं, जहां वह तब था, जब हमने घाटी छोड़ी थी. उन्हें लगता है उस वक्त हमारे घाटी से विस्थापन की वजह तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की साजिश थी. कश्मीरी बहुसंख्यक अब भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि उस वक्त कश्मीरी पंडितों को घाटी में खतरा था. हमारा पक्ष तो किसी ने सुना ही नहीं है.

घाटी और देश की जनता आज तक यह नहीं मानते हैं कि उस वक्त कानून-व्यवस्था के हालात बिगड़ गए थे. घाटी में 1989 से 90 के दौरान कश्मीरी पंडितों का घाटी में जीना दूभर हो चुका था. एक तरह से यह लोकतंत्र का लिटमस टेस्ट था, जो विफल रहा. 

क्या नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह प्रस्ताव इसके मतदाताओं की मांग पर आया है?

मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता. कश्मीर ने बहुत उठा-पटक के हालात देखे हैं. 2008 में अमरनाथ जमीन विवाद हुआ था. फिर 2010 में तुफैल मट्टू विवाद में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी. बाद में भी कुछ ऐसी ही घटनाएं घटी. जन प्रतिनिधि हालात पर काबू पाने में नाकाम रहे. पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने एजेंडा तय किया है.

अगर यही बात है तो क्या इसका मतलब यह है कि इस बार पार्टी नेताओं ने कोई ठोस कदम उठाया है और उम्मीद है जनता उनकी बात मानेगी?

मुझे इस बारे में थोड़ा संदेह है क्योंकि प्रस्ताव के संबंध में जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. अगर पीडीपी इस बारे में गंभीर है तो उसने अपने समर्थकों को साथ लाने की कोशिश क्यों नहीं की? इसके नेता और कार्यकर्ता जनता के बीच जाकर इस बारे में कोई राय कायम क्यों नहीं कर रहे?

नेशनल कॉन्फ्रेंस भी इस बारे में कोई काम क्यों नहीं कर रही? पार्टी को हमारे विस्थापन पर रैलियां निकालनी चाहिए. इस बारे में बात करनी चाहिए. क्या उमर अब्दुल्ला अपने विधानसभा क्षेत्र के कश्मीरी पंडित परिवारों के घर जा कर इस मुद्दे पर प्रचार करेंगे? हाल फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि इस  प्रस्ताव से कुछ बदलाव आएगा. मैं नहीं कह सकता कि इससे हमारे विस्थापन को लेकर जुड़ी कहानियां बदल जाएंगी. 

उन्हें जुमे की नमाज़ों में इस संबंध में प्रचार शुरू कर देना चाहिए. अलगाववादियों का समर्थन हासिल करने दीजिए तभी हम उमर अब्दुल्ला को इस बारे में गंभीर मानेंगे.

First published: 24 January 2017, 7:55 IST
 
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