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जम्मू-कश्मीर: 30 सालों के चरमपंथ के इतिहास में पहली बार बैंक क्यों लूटे जा रहे हैं?

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 May 2017, 10:43 IST

दो मई को साउथ कश्मीर के कुलगाम जिले में उस समय पांच पुलिस कर्मी और दो सिक्योरिटी गार्ड को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, जब हथियारबंद चरमपंथियों ने जम्मू-कश्मीर बैंक की एक नकदी ले जा रही वैन पर हमला कर दिया और पुलिसकर्मी से उसकी राइफल छीन ली. लेकिन इसे उनकी खोटी तकदीर ही कहिए कि वे कोई कैश लूटने में सफल नहीं हो सके.

इस वारदात के बाद घाटी में तीन और बैंक लूट को अंज़ाम दिया गया. पहली वारदात में एक गनमैन कुलगाम जिले की एक शाखा में गेट तोड़कर घुस गया और ग्रामीण बैंक की शाखा से 65 हजार रुपये लूट लिए. दूसरी घटना में तीन संदिग्ध चरमपंथियों ने ऐलाकुई देहाती बैंक के वैबग शाखा से 5 लाख रुपये लूट लिए. कुछ घंटों बाद ही उग्रवादियों ने जम्मू-कश्मीर बैंक की नेहमा शाखा को निशाना बनाया और वहां से 1.33 लाख रुपये लूट लिए.

नया चलन

कश्मीर में चरमपंथ के तेजी से बदलते स्वरूप में नया ट्रेंड में है लूट की बढ़ती घटनाएं. लेकिन यह एक ऐसा ट्रेंड है जिसको समझने-समझाने में सुरक्षा विशेषज्ञ और कश्मीर के जानकारों दोनों को ही मुश्किल हो रही है, क्योंकि कश्मीर के 30 सालों के चरमपंथ के इतिहास में इन्होंने शायद ही इसके पहले कभी बैंक लूटने की वारदात को अंजाम दिया हो.

बार-बार की जा रही लूट की ये वारदातें बताती हैं कि इन दिनों चरमपंथी गतिविधियों के लिए फंड की बहुत कमी महसूस की जा रही है, जिससे कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि शायद पाकिस्तान से होने वाली फंडिंग पर रोक लग गई है.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, "चरमपंथी गतिविधियों की फंडिंग के लिए अरबी के दो कोड ‘फ्लूस’ और ‘मशाहिर’ का इस्तेमाल होता है, जिसका आशय है कि पैसा और पारितोषिक. इन चरमपंथियों को हर महीने ‘फ्लूस’ के रूप में 5000 से 7000 रुपये मिलते हैं, जो कि कोई बहुत बड़ी मात्रा नहीं है. इसलिए “यह मानना कठिन है कि फंड का अभाव लूट की इन घटनाओं के पीछे कोई मोटिवेशन हो सकता है."

लश्कर का हाथ?

पुलिस के मुताबिक लूट की इन वारदातों के पीछे पुलवामा जिले के काकोपारा के लहर गांव के लश्कर-ए-तैयबा के उग्रवादी आरिफ डार उर्फ रेहान उर्फ आरिफ मैनेजर का हाथ है. डार इसके पहले मध्य कश्मीर में हुईं लूट की कई वारदातों में शामिल रह चुका है. ऐसा ही एक वीडियो जिसमें विदेशी चरमपंथी अबू अली उसके साथ है, वायरल भी हो चुका है. अली को बाद में हंडूरा में एनकाउंटर में मार दिया गया था.

लश्कर की लूट में शामिल होने को लेकर कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने इसको पाकिस्तान सरकार और जिहादी संगठन में चल रहे तनावपूर्ण संबंध से भी जोड़ कर देखा है. इस्लामाबाद पहले ही लश्कर के संस्थापक हाफिज सईद और उसके चार सहयोगियों को कारावास में डाल चुका है.

क्या इसका यह मतलब है कि पाकिस्तान इस संगठन के लिए फंडिंग बंद कर चुका है? एक पुलिस अफ़सर के मुताबिक यह सब अभी अनुमान और अटकलबाजियों के दौर में ही है, इस पर अभी गारंटी से कुछ भी नहीं कहा जा सकता.

अटकलबाजी

पर दक्षिण कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन की तुलना में लश्कर के बहुत कम चरमपंथी हैं. दक्षिण कश्मीर में 2014 में जहां 15 लड़ाके थे लेकिन अब संख्या बढ़कर 104 हो चुकी है और इनमें से भी अधिकांश का संबंध हिजबुल से है. जब तक कि कोई और प्रमाण पुष्ट करने के लिए नहीं मिल जाता तब तक इसकी कई व्याख्याएं इन दिनों चर्चा में हैं. इनमें से एक निश्चित रूप से पाकिस्तान से फंडिंग का रुकना है.

कुछ लोग इसको डिमोनेटाइजेशन के एक परिणाम के रूप में भी देखना चाहते हैं, लेकिन इस तर्क में कोई ज्यादा दम इसलिए नजर नहीं आता क्योंकि यह पिछले साल हुआ था और इसके जो नतीजे होने थे वो पहले ही सामने आ चुके हैं. दूसरा यह कि अलग हुए चरमपंथी समूह अब पाकिस्तान के बिना सहयोग के स्वतंत्र रूप से काम करने का प्रयास कर रहे हैं.

अप्रैल की शुरुआत में नकाबबंद चरमपंथियों के एक समूह ने करीमाबाद में लोगों के सामने यह घोषणा की थी कि उनकी लड़ाई किसी राष्ट्र के लिए नहीं बल्कि इस्लाम और शरीया के लिए है. इन्होंने उग्रवादियों के अंतिम संस्कार के दौरान पाकिस्तान के झंडे लहराने के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा था कि इसके बजाय लोगों को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाना चाहिए क्योंकि ये पाकिस्तान में इस्लामिक प्रणाली लागू करने की लड़ाई लड़ रहा है.

कहीं इसे नोटबंदी का असर माना जा रहा है तो कहीं पाकिस्तान से फंडिंग बंद होने की वजह बताया जा रहा है.

इस समूह के नेता ने लोगों से कहा कि “हमारी लड़ाई किसी संगठन या देश के लिए नहीं, बल्कि इस्लाम के लिए है. कल हमें भारत भी जाना होगा और वहां इस्लामिक निज़ाम को लागू करना होगा. पाकिस्तान में कोई इस्लामिक निज़ाम नहीं है और हमें यहां भी उसी व्यवस्था को लागू करना होगा.”

इस नेता ने आगे कहा, "पाकिस्तान का झंडा मत फहराओ. मेरे प्यारे युवाओं सावधानी से सुनो, यह सब शरिया और शहादत के बारे में है. हम शरिया चाहते हैं. पाकिस्तान के झंडे में कलीमाह (अल्लाह के एक होने और पैगंबर मुहम्मद के पैगंबर होने की पुष्टि) अंकित नहीं है."

लेकिन इसके अगले दिन पाकिस्तान स्थित एकीकृत जिहाद काउंसिल ने एक बयान जारी कर चेतावनी दे डाली कि पाकिस्तान और इसके झंडे का विरोध करने वाले इसके भयानक परिणामों को भुगतने के लिए तैयार रहें. काउंसिल के प्रवक्ता ने कहा कि "पाकिस्तान के झंडे और देश का विरोध करना और तहरीक-ए-तालिबान का समर्थन करने के पीछे इस इस सशस्त्र समूह की मंशा नसीर की कब्र पर मुजाहिदीन का स्वांग करने की है." इस प्रवक्ता के अनुसार ये सशक्त लोग चरमपंथ और लोगों के बीच भ्रम पैदा कर रहे हैं.

पुराने अनुभव का ताज़ा होना

इस तरह की स्थितियों के कारण इन दिनों घाटी में कुछ पुरानी यादें लोगों के मन में ताज़ी हो रही हैं. कई लोग इसको इस तरह समझाते हैं कि उग्रवादियों में पाकिस्तान विराधी स्वर नारेबाजी ही अधिक है, जमीनी हकीकत पर ऐसा नहीं है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक विशेषज्ञ ने बताया कि "उग्रवादियों का एक समूह इस्लामिक कलेवर धारण कर चुका है और यह अपने आप ही हमला करने को तैयार बैठा है. इसलिए इसको फंड की जरूरत है. पर चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों का ही विरोध करके कश्मीर में रहना संभव नहीं है. कोई राजनीतिक या उग्रवादी संगठन अब तक ऐसा कर पाने में सफल नहीं रहा है."

लिहाज़ा यह हो सकता है कि हम कश्मीर में नई जवाबी कार्रवाई यानी बगावत के विरोध के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जैसा कि पाकिस्तान की जिहादी काउंसिल ने संकेत दिया है. चरमपंथियों के लिए यह बहुत ही असामान्य बात है कि वे पाकिस्तान का विरोध करें.

First published: 6 May 2017, 10:43 IST
 
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