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तीन नौजवानों की मौतों ने फिर सुलगाई कश्मीर घाटी

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 March 2017, 8:48 IST


इश्फाक अहमद वानी (24) श्रीनगर के एक इलाक़े में एक कुशल मोटर मैकेनिक था. मंगलवार सुबह वह बटमालू में एक वर्कशॉप में जाने वाला था. अभी वह सो रहा था कि अपने दोस्त के एक कॉल पर उसकी आंख खुल गई. उस दोस्त ने वानी को फोन पर बताया कि चडूरा में एक मुठभेड़ हो रही है. इसके थोड़ी देर बाद ही दोनों दोस्त घटनास्थल के लिए रवाना हो गए जो 10 किलोमीटर दूर था. उनका मकसद था दूसरे प्रदर्शनकारियों का साथ देकर मुठभेड़ में फंसे उग्रवादी को भागने में सहायता करना.


दो घंटे बाद वानी का शव श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल पहुंचाया गया. मुठभेड़ स्थल पर बाधा पहुंचाने वाले आम लोगों की हुई मौत में वानी का नंबर तीसरा था. बाकी दो की शिनाख्त चडूरावासी जाहिद रशीद गनाई (24) और फयाज अहमद वाजा (18) के रूप में हुई.

उग्रवादी तौसीफ अहमद (30) भी मुठभेड़ में मारे गए. सुरक्षा बलों ने तीन मंजिला मकान उड़ा दिया, जिसमें उन्हें बंधक बना कर रखा गया था. इस मुठभेड़ में हुई मौतों ने कश्मीर को एक बार फिर सुलगा दिया है. आम नागरिक और उग्रवादी दोनों ही के अंतिम संसकार के वक्त काफी भीड़ उमड़ी. श्रीगर का औद्योगिक केंद्र माने जाने वाले रणग्रेथ में लोगों की भीड़ के चलते सड़कें जाम हो गईं. युवाओं के एक झुंड ने वहां से गुजर रहे वाहनों पर पथराव भी किया.


मारे गए उग्रवादी के गांव यारीपोरा कुलगाम में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला. आस-पास के इलाकों से हजारों लोग गांव में आ गए और देर रात तक वहां रुके. गांव के एंट्री पॉइंट से लेकर वागेय के घर तक लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. लोग घरों की छत और खिड़कियों से नजारा देख रहे थे. बहुत से लोग हाथ में रिचार्जेबल लालटेन ले कर चल रहे थे जिससे शोक का माहौल गहरा गया. सुबह के वक्त हजारों और लोग इस भीड़ में जुड़ गए.

 

हुर्रियत की हड़ताल


हुर्रियत ने तो तुरंत ही एक दिन के बंद का आह्वान कर दिया. इस पर प्राइवेट स्कूलों ने छुट्टी घोषित कर दी और यूनिवर्सिटी में परीक्षाएं स्थगित कर दी गईं. घाटी फिलहाल इन तीन मौतों का हिसाब मांग रही है. लोगों का मानना है ये मौतें टाली जा सकती थीं. क्या सुरक्षा बलों ने आदर्श ऑपरेशन प्रक्रिया अपनाई थी?


हालात उस वक्त और बिगड़ गए, जब श्रीनगर में पुलिस टीम ने मृतक जाहिद का शव उसके घर ले जा रही एम्बुलेंस को रोक कर परिजनों के विरोध के बावजूद शव अपने कब्जे में ले लिया. मृतक के भाई ने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया और वह वायरल हो गया. उसका भाई कहता है ‘‘देखो ये मरे हुए आदमी तक को नहीं छोड़ रहे. हम पुलिस को अपने भाई का शव क्यों ले जाने देते.’’ आस-पास से गुजर रहे लोगों ने जब पुलिस और परिजनों को आपस में उलझते देखा तो उन्होंने नारे लगाने शुरू कर दिए. इस पर पुलिस को मजबूर होकर आंसू गैस के गोले दागने पड़े.


फारुक शाह ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर पूछा है कि ‘‘आप हर मुठभेड़ में 2-3 लोगों की जान ले लेते हो. इस तरह तो अगर साल में 50 मुठभेड़ होगी तो क्या आप हर साल 100-150 लोगों को मौत के घाट उतार दोगे. इस तरह धीमी गति से किए नरसंहार से आपको क्या हासिल होगा? क्या आपके पास कश्मीर को लेकर कोई नीति है? क्या आप आम शासकों की तरह इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाओगे या कश्मीर हिंसा की समस्या को हल करोगे जो बार-बार सामने आ खड़ी होती है.’’

 

महबूबा की अपील

 

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने एक बार फिर नियंत्रण व शांति बनाए रखने की अपील करते हुए इन तीनों मौत पर शोक व्यक्त किया है. उन्होंने अपने एक बयान में कहा, ‘‘बहुत से मसले ऐसे हैं, जिन्हें हल किया जाना जरूरी है लेकिन जब हिंसा आम बात हो जाए तो कोई कुछ कर ही नहीं सकता. सभी पक्षों को आत्म नियंत्रण में रहने की जरूरत है ताकि शांतिपूर्ण माहौल बनाया जा सके और असंतोष को गरिमापूर्ण तरीके से व्यक्त किया जा सके.’’


हालांकि पिछले साल के घाटी के बिगड़े हालात और उस दौरान कश्मीर में सैंकड़ों लोगों की मौत व पैलेट गन के शिकार हुए लोगों के अंधे होने के बाद से मुख्यमंत्री के बयान बस लोगों के बीच और रोष ही पैदा करते हैं. सोशल मीडिया पर भी मेहबूबा के नियंत्रण बनाए रखने के बयान का खूब मखौल उड़ाया जा रहा है.


मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सुहैल बुखारी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किए गए उनके बयान के जवाब में पर्यटन सलाहकार कैरिन जोधा फिशर ने फेसबुक पर कहा, ‘‘अगर गठबंधन की सरकार नहीं होती तो महबूबा खुद सड़कों पर उतर कर लोगों का साथ देतीं और इस मुद्दे के राजनीतिक समाधान की मांग करती.’’ वे कहती हैं इस पोस्ट से मैं हैरान हूं. यह वही महबूबा तो नहीं हैं, जिन्हें मैं करीब से जानती थी. अब वे एक एकीकृत सरकार की नेता हैं.’’


इस बीच, इन मौतों पर विरोध प्रदर्शन बारामूला से काफी आगे तक फैल गया है. श्रीनगर में निर्दलीय विधायक अभियंता अब्दुर राशिद को पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया जब वे दर्जनों समर्थकों के साथ मुख्यमंत्री निवास की ओर जा रहे थे. अर खुर्दवानी कुलगाम में उग्रवादियों ने एक बार फिर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का घर लूट लिया. पिछले सात दिनों यह तीसरी ऐसी घटना घटी है.

 

यह गांव यारीपोरा के निकट है, जो कि हाल ही मुठभेड़ में मारे गए तौसीफ का गांव है. एक दिन पहले उग्रवादियों ने शोपियां जिले के दैरू गांव में एक सहायक सब इंस्पेक्टर के घर लूट की थी. इससे पहले उग्रवादियों ने बडगाम जिले में जम्मू कश्मीर के जेल विभाग के एक अधिकारी की कार जला दी थी. इन सभी घटनाओं के वक्त पुलिस अधिकारी अपने घरों में मौजूद नहीं थे.


एक स्थानीय स्तंभकार नसीर अहमद के अनुसार, उग्रवादियों के बजाय सरकार को सावधानी और सतर्कता बरतने की जरूरत है. अगर सरकार अपने सुरक्षा बलों को ताकीद कर दे कि उन्हें पूरी जवाबदेही और व्यावसायिक दृष्टिकोण से अपने ऑपरेशनों को अंजाम देना है तो ऐसा संभव है. इस पर अमल करने की जरूरत है. कुछ और ऐसी मौतें हो गई तो घाटी में हालात पहले की ही तरह बदतर होते देर नहीं लगेगी.’’

 

First published: 31 March 2017, 8:48 IST
 
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