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हुर्रियत के हड़ताली कैलेंडर से कश्मीरियों में उबाल

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 November 2016, 8:17 IST
(तौसीफ़ मुस्तफ़ा/एएफ़पी )
QUICK PILL
  • कश्मीर में हड़ताली कैलेंडर की शुरूआत 2010 की गर्मियों में हुर्रियत के मुखिया सय्यद अली शाह गिलानी ने की थी. 
  • मगर लंबी-लंबी हड़तालों का नतीजा कुछ नहीं निकला, उलटा इतनी लंबी बंदी के नाते अर्थव्यवस्था ज़रूर चौपट हो गई थी.
  • इसके बावजूद अब 2016 में हुर्रियत दोबारा उसी रास्ते पर चलने में बिल्कुल भी नहीं हिचक रहा है और हड़ताल के वीकली कैलेंडर जारी कर रहा है. 

हुर्रियत की हड़ताल का ताज़ा कैलेंडर आ गया है. यह बिल्कुल पिछले हफ़्ते की तरह है. वीकेंड में खुला रखने और बाकी दिनों में बंदी की अपील. हालांकि हुर्रियत ने पिछले प्रदर्शन के दौरान ही तय कर लिया था कि अब वीकेंड में हड़ताल नहीं करना है. इसी वजह से 19 नवंबर को 133 दिनों की रिकॉर्ड बंदी के बाद पहली बार घाटी में पूरा दिन काम करने की आज़ादी मिली और ज़िंदगी पटरी पर आती दिखी.

हुर्रियत हर बुधवार या गुरुवार को अगले हफ़्ते की हड़ताल के लिए कैलेंडर जारी करता है. इसमें विरोध प्रदर्शनों का पूरा ब्यौरा होता है. मसलन हड़ताल कहां करनी है, प्रदर्शन किस इलाक़े में होना है, दीवारों पर ग्रैफ़िटी बनाकर प्रतीकात्मक विरोध कहां करना है आदि.

इस शुक्रवार से शुरू हो रहे ताज़ा कैलेंडर के मुताबिक पहले दिन पूरी तरह से बंदी, शनिवार-रविवार को पूरे दिन काम, फिर सोमवार, मंगलवार को पूरी हड़ताल और आख़िर के दो दिन बुधवार, गुरुवार को शाम 4 बजे तक हड़ताल की अपील की गई है.  

कैलेंडर में क्या होता है?

कैलेंडर में कुछ आम दिशा-निर्देश भी हैं. जैसे कि हड़ताल पूरे जम्मू और कश्मीर के लिए है. रात के वक़्त सभी लोग अपनी-अपनी गली, मुहल्लों और गावों में घुसने के सभी दरवाज़े किसी भी तरह बंद कर दें ताकि भारतीय सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस की छापामार कार्रवाइयों और गिरफ़्तारियों से आम लोगों को बचाया जा सके, ख़ासकर कश्मीरी नौजवानों को.

इसके अलावा लोगों को मगरिब से इशा ( शाम से लेकर रात की नमाज तक ) तक इस्लामी और आज़ादी के तराने गुनगुनाने के लिए कहा गया है. यह अपील भी की गई है कि हड़ताली रोस्टर के पोस्टर को मस्जिदों के प्रवेश द्वार, बाज़ारों, मोहल्लों और स्थानीय चौराहों पर चिपका दिए जाएं. 

वीकली हड़ताल के इस अनोखे कैलेंडर की शुरुआत 2010 की गर्मियों में तब हुई, जब हुर्रियत के मुखिया सय्यद अली शाह गिलानी ने पांच महीने के बंद का आह्वान किया था. तब 15 दिनों की हड़ताल में एक या दो दिन की छूट मिलती थी. हालांकि उन लंबी-लंबी हड़तालों का नतीजा कुछ नहीं निकला, उलटा इतनी लंबी बंदी के नाते अर्थव्यवस्था ज़रूर चौपट हो गई थी. कश्मीर को इससे उबरने में बहुत वक़्त लगा. कश्मीर में बहुत सारे लोग तो यहां तक कहते हैं कि 2010 में चौपट हो गई अर्थव्यवस्था के नाते ही अगले पांच सालों तक यहां हालात सामान्य रहे. 

हुर्रियत नहीं ले रहा सबक

मगर अब 2016 में हुर्रियत दोबारा उसी रास्ते पर चलने में बिल्कुल भी नहीं हिचक रहा है. 8 जुलाई को हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की हत्या के बाद पूरा कश्मीर हिलने लगा था. इसके कुछ ही दिन के भीतर हुर्रियत ने लंबे-चौड़े दिशा-निर्देश के साथ बेमियादी हड़ताल का एलान कर दिया.

कश्मीर अब इस अलगाववादी विरोध के पांचवें महीने में पहुंच चुका है जहां आम ज़िंदगी बिल्कुल थम-सी गई है. बावजूद इसके, हुर्रियत हर हफ़्ते हड़ताली कैलेंडर जारी कर रहा है, एक या दो दिन की छूट के साथ. और लोगों को हिदायत दी जा रही है कि इस हड़ताल का सख़्ती से पालन करें. इस उम्मीद में कि नई दिल्ली उन्हें आज़ादी की तर्ज़ पर एक निरंकुश राजनीतिक मुक्ति दे देगी. 

घाटी में हर दिन दी जाने वाली कुर्बानी और विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल अब निजी हितों के लिए किया जा रहा है ना कि इसके किसी राजनीतिक अंत के लिए. कश्मीर यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर नहीं चाहते कि वह खुलकर इन मामलों की आलोचना करें. वह कहते हैं, 'नई दिल्ली ने 70 सालों में कश्मीर का मुद्दा नहीं सुलझाया. जब नब्बे के दशक में पूरी घाटी में जिहाद की लहर चल रही थी, तब ऐसा मुमकिन नहीं हुआ तो अब जबरन थोपी जा रही इन बेमियादी हड़तालों से क्या होगा?

उबाल की आशंका

हालांकि जबरन लागू होने वाली इन हड़तालों के ख़िलाफ़ अब लोगों का गुस्सा अंदर ही अंदर उबल रहा है लेकिन कोई इसे ज़ाहिर नहीं कर रहा. वजह यह है कि कोई नहीं चाहता कि उसपर पांच महीने से जारी बग़ावत को नाकाम कर देने का आरोप लग जाए. बग़ावत जिससे उम्मीद की जा रही है आज़ादी की.

हालांकि हाल ही में कुछ स्थानीय अख़बारों ने इस नीति में बदलाव लाने के लिए कहा है. कश्मीर ऑब्ज़र्वर ने अपने संपादकीय में लिखा है,  'हड़ताल की वजह से लोग तेज़ी से थक रहे हैं और उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया भी हाथ से निकलता जा रहा है. इस हालात से बाहर निकलना ही होगा. अख़बार आगे लिखता है, 'सख़्त ज़रूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने और कुछ अनूठे प्रयोग करने की मगर अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है. इसमें होने वाली देरी से आगे भी समस्या ही होगी ना कि कोई हल निकलेगा जिसे सुलझाने का दावा हुर्रियत करता है. 

मगर ऐसा नहीं है कि अलगाववादी इस सुझाव की प्रशंसा करेंगे. वे लगातार जन समर्थन का दावा कर रहे हैं. उन लोगों के भी समर्थन का दावा कर रहे हैं जो रोज़ाना की दिहाड़ी पर गुज़ारा करते हैं और इस हड़ताल से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. इससे भी बड़ी बात जिसका अलगाववादी दावा कर रहे हैं कि हम अपनी मंज़िल के बेहद क़रीब हैं. 

'देश को संबोधित' करते हुए गिलानी ने सितंबर में कहा, 'हम आज़ादी के इतने क़रीब कभी नहीं पहुंच सके जितना की आज आ गए हैं.' उन्होंने कश्मीरी आवाम से अपील भी कि वे अलगाववादियों के प्रोग्राम पूरी पाबंदी के साथ मानें. उन्होंने यह दावा भी किया कि कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली सहानुभूति लगातार बढ़ रही है जिसमें इतना दम ज़रूर है कि कश्मीर की आज़ादी की राह आसान कर दे. लिहाज़ा, लोगों को विद्रोह करते रहना चाहिए. 

इसी तरह का विचार कश्मीर यूनिवर्सिटी में कानून विभाग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर शेख़ शौक़त की तरफ़ से भी आया है. उन्होंने इस 'बग़ावत' को जारी रखने के लिए बैटिंग की है. एक स्थानीय अंग्रेज़ी अख़बार में उन्होंने इस विषय पर लिखते हुए कश्मीर के कुलीन वर्ग को मेल-मिलाप और समझौते करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है. 

उन्होंने लिखा है, 'आम लोगों ने अपने बल पर बग़ावत का यह चरण शुरू किया था. वो लगातार कुर्बानी दे रहे हैं और इस आंदोलन को बचाए रहने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. उन्होंने अपनी बुनियादी ज़रूरतें का इंतज़ाम किसी तरह कर लिया और इस संघर्ष में बने रहे.'

First published: 26 November 2016, 8:17 IST
 
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