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जम्मू-कश्मीर: पत्थरबाज़ों की बजाए वायरल वीडियो नई दिल्ली के लिए अब बड़ी चुनौती

रेयाज़ उर रहमान | Updated on: 18 April 2017, 11:10 IST

 

कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा अत्याचार करने के दर्जनों वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. ये सभी वीडियो उस आक्रोश की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आए हैं जिसमें कश्मीरी युवक सीआरपीएफ के जवानों के साथ बदतमीजी की हद पार करते नजर आ रहे हैं. सुरक्षा बल संयम दिखाते दिख रहे हैं. आदि आदि.

इसका वीडियो का मकसद इस समझ को मज़बूत करना है कि राज्य में चल रहे टकराव के वास्तविक पीड़ित कश्मीरी हैं और सुरक्षा बल पलटकर कुछ भी नहीं कर रहे हैं. वीडियो के चलते रहने का सिलसिला जारी रहता हैः उनमें से दो वीडियो में कश्मीर के गांव वाले और पत्थरबाज सीआरपीएफ के जवानों को जाने के लिए सुरक्षित रास्ता बताते नजर आते हैं. एक वीडियो में एक सुनसान जगह पर सीआरपीएफ के जवान को सुरक्षित रास्ता दिया जाता है.

वीडियो में एक युवक को सीआरपीएफ के जवान से यह कहते सुना जाता है- जाओ भाई जाओ. एक अन्य वीडियो में गांव के उम्रदराज लोगों का समूह सुरक्षा के लिए जवानों के साथ दिखाई देता है.

ऐसा वीडियो भी सामने आया है जिसमें सुरक्षा बल अटूट साहस के साथ धैर्य का परिचय देते नजर आते हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार है. हर दिन इसमें नए-नए वीडियो और जुड़ जाते हैं. इनमें से प्रत्येक में उनकी हिंसा का भी ग्राफिक होता है. ऐसा ही एक वीडियो है जिसमें सेना के लोग पत्थर फेंकने वालों के खिलाफ एक कश्मीरी युवा को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

 

नए-नए वीडियो


यह वीडियो सेना की उदारता दिखाने वाले वीडियो के उलट है और उसके प्रभावों को लगभग निष्प्रभावी कर देता है. इसी तरह का एक अन्य वीडियो वायरल हुआ है जिसमें सेना मानव ढाल के रूप में एक कश्मीरी युवा का इस्तेमाल कर रही है. सेना कश्मीरी युवक फारुक डार को जीप के बोनट से बांधे हुए हैं ताकि जीप पर पत्थर न फेंके जाएं और सुरक्षा बल पत्थर फेंकने वालों से बचे रहें. वीडियो कथित तौर पर उस जगह का है जहां कुछ शरारती तत्वों ने श्रीनगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव को पथराव कर बाधित कर दिया था और सुरक्षा बल गांवों में जा रहा था.

एक अन्य वीडियो में सुरक्षा बल के जवान किशोर लड़कों को थप्पड़ मारते और पीटते दिखाई पड़ रहे हैं. वीडियो में सुरक्षा बल किशोरों से जबरन पाकिस्तान विरोधी नारे भी लगाने को मजबूर करते दिखाई पड़ रहे हैं. एक वीडियो में एक लड़के का चेहरा खून से लथपथ दिखाई दे रहा है. साफ दिख रहा है कि उसे पीटा गया है. अन्य वीडियो भी इसी तरह के हैं. एक में सेना के जवान तीन कश्मीरी युवकों को पीटते और उनसे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाते दिख रहे हैं. इसी तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं जिसमें सेना की करतूत दिखाई दे रही है.

 

कहना ग़लत ना होगा कि इन घटनाओं के वीडियो ना बनें, इसके लिए सरकार ने श्रीनगर और अनंतनाग उप-चुनाव के लिए होने वाले मतदान के दिन मोबाइल और ब्रॉडबैंड इंटरनेट बंद कर दिया था. ये चुनाव 9 अप्रैल और 12 अप्रैल को प्रस्तावित थे. उम्मीद थी कि हजारों युवाओं का नेटवर्क काट दिए जाने से युवा अलग-थलग पड़ जाएंगे और वोटिंग में सुविधा होगी. लेकिन ये सभी अनुमान गलत और प्रतिकूल निकले. श्रीनगर उप चुनाव के दौरान जब बेखौफ युवाओं ने मतदान केन्द्रों की तरफ मार्च किया तब भीषण हिंसा हुई और सुरक्षाबलों की गोलीबारी में आठ लोगों की जान चली गई. इसके चलते सरकार को अनन्तनाग उप चुनाव मुल्तवी करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

 

सेवा बहाल होते ही वीडियो वायरल


लेकिन जैसे ही इंटरनेट सुविधा बहाल हुई, फेसबुक और ट्वीटर पर वीडियो लबालब हो गए. इन्हें व्हाट्सएप पर सर्कुलेट भी किया गया. सबसे पहले जो वीडियो अपलोड किए गए, उनमें से एक सीआरपीएफ कर्मियों के साथ बुरा बर्ताव किया जाने वाला वीडियो था. इस वीडियो को एक अज्ञात युवक ने फिल्माया था जो भीड़ का हिस्सा था. इस वीडियो को जल्द ही नेशनल मीडिया, विशेष रूप से टेलीविजन चैनलों ने उठा लिया गया. कुछ चैनलों ने सैनिकों के साथ बुरा बर्ताव, उनका अपमान किए जाने पर उन्मादी और भड़काऊ चर्चाएं भी कीं.

अखबारों में कॉलम लिखने वाले कॉलमिस्ट नसीर गनी कहते हैं कि वीडियो को जाहिरा तौर पर युवाओं द्वारा ऑनलाइन दिखाया गया था ताकि वे धमकी दे सके, कुछ साहस का प्रदर्शन कर सकें कि वे पत्थरों के साथ बंदूक चलाने वाले सैनिकों को हरा सकते हैं और फिर उन्हें जाने भी दे सकते हैं लेकिन कुछ चैनलों ने तुरन्त ही इस वीडियो को अपने तरीके से इस्तेमाल कर लिया. सिर्फ एक युवक के, जिसने सीआरपीएफ जवान के स्लीपिंग बैग पर ठोकर मारी है, बाकी सभी एक-दूसरे से यह कहते सुने जा सकते हैं कि उन्हें मारों मत और जाने दो क्योंकि वे बेचारे और तरस खाने योग्य हैं.

हालांकि, कुछ भी हो, सोशल मीडिया के वीडियो घाटी में सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरे हैं. कैमरा लगे और इंटरनेट से जुडे एन्ड्रॉयड फोन के जरिए लोग सिक्यूरिटी ऑपरेशन्स को रिकॉर्ड करने में सक्षम और समर्थ हैं और तत्काल सोशल मीडिया पर इसे अपलोड कर देते हैं. कुछ मिनटों में ही ये वीडियो वायरल हो जाते हैं और जन आक्रोश पैदा कर देते हैं.

 

इन वीडियो में सुरक्षा बल के लोग युवाओं को उत्पीड़ित करते दिखाई देते हैं और विजय की भावना के अर्थ में भी कि जहां सुरक्षाकर्मी पत्थरबाजों से बचने के लिए युवाओं का सहारा लेते दिख रहे हैं. पत्थर फेंकने या विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले युवा की गतिविधियां फिल्माई जा रही हैं. इन वीडियो में से अधिकांश न केवल सेना के लिए शर्मिंदगी का सबब बनते हैं बल्कि जमीनी स्तर पर अलगाव को भी गहराते हैं.

 

दुनिया में फैल जाता है वीडियो


पीडीपी के नेता अब्दुल वाहिद कहते हैं कि इन वीडियो का देखा जाना सिर्फ घाटी तक ही सीमित नहीं रहता. इन्हें पूरे भारत और पाकिस्तान में देखा जाता है. इसके अलावा कश्मीरी और पाकिस्तानी प्रवासी इसे पूरे संसार में सर्कुलेट कर देते हैं. वह आगे कहते हैं कि कश्मीर के रिमोट एरिया में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ घटना के प्रत्यक्ष गवाहों को ही नहीं
होती, वरन लाखों लोग इसके प्रत्यक्ष गवाह बन जाते हैं. एक बच्चे का निरादर, अपमान और उत्पीड़न सभी कश्मीरियों की अवमानना बन जाती है.

 

ठीक इसी तरह से, एक सुरक्षा कर्मी को पीटने की घटना पूरे भारत के एक बड़े वर्ग को विचलित कर देती है. इसके चलते टीवी चैनलों पर उन्मत्त और उन्मुक्त बहसें होती हैं जो घाटी में बड़े गुस्से का कारण बनती हैं. जहां लोग इसे अपने खिलाफ स्वाभाविक रूप से पक्षपातपूर्ण मानते हैं.

 

नसीर साहब आगे कहते हैं कि इस तरह से सोशल मीडिया कश्मीर में संघर्ष के नए हथियार के रूप में उभरा है. और समस्या तो यह है कि इससे बचाव का रास्ता ज्यादा कुछ नहीं है. इसका केवल एक ही रास्ता मौजूद है और वह रास्ता इंटरनेट को पूरी तरह से बंद करने का है.

First published: 18 April 2017, 11:10 IST
 
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