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जम्मू-कश्मीर में मुस्लिमों को अल्पसंख्यक दर्जे पर पीआईएल

चारू कार्तिकेय | Updated on: 30 March 2017, 8:28 IST

अगर मुस्लिम देश की आबादी का 14 प्रतिशत और जम्मू-कश्मीर की आबादी का 68 प्रतिशत हैं तो क्या मुस्लिमों को जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए? तो क्या केंद्र सरकार की राज्य में चलाई जा रही योजनाओं में मुस्लिमों को अल्पसंख्यक मानकर दी जानी वाली सुविधाएं और फायदे बंद हो जाना चाहिए. जम्मू-कश्मीर में “धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए” सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई एक जनहित याचिका में इसी तरह के मुद्दे उठाए गए हैं.

यह पीआईएल अंकुर शर्मा ने दाखिल की है. सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार से इस पर विचार करने को कहा है और चर्चा करने के बाद चार सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने के लिए कहा है. यह सचमुच में एक जटिल मुद्दा है क्योंकि इस याचिका में उठाए कुछ सवाल तो वैध हैं तो कुछ चतुराई भरे. इसलिए इस याचिका की एक पूर्ण न्यायिक समीक्षा जरूरी हो जाती है.

 

जटिलता


1. संविधान में अल्पसंख्यक की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है.
2. जम्मू—कश्मीर में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम लागू नहीं होता है.
3. 19 दूसरे राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों समेत जम्मू—कश्मीर द्वारा राज्य में प्रदेश स्तरीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना न किया जाना.
4. अधिकांश स्कॉलरशिप और योजनाएं मुस्लिमों के लिए


शर्मा का कहना है कि इन कमियों के कारण पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कुछ विसंगतियां पैदा हो गई हैं और इस कारण से राज्य में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा पर नकारात्मक असर पड़ा है. उदाहरण के लिए वे 2007-2008 के दौरान लगभग 20 हजार रुपए की ऐसी स्कॉलरशिप का उदाहरण देते हैं जो कि राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक के रूप में पहचाने जाने वाले मुस्लिम, ईसाई, सिख, बुद्ध, पारसी और जैनों को तकनीकी व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में दी गईं.

शर्मा का कहना है कि जम्मू-कश्मीर की आबादी में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं पर उन्हें राज्य में 752 स्कॉलरशिप में से 717 स्कॉलरशिप दी गईं. शर्मा का कहना है कि अनेक समुदायों को प्रदेश में अल्पसंख्यक की तरह अधिसूचित किया जा सकता है, पर उनको उनके हिस्से की स्कॉलरशिप आदि का लाभ इसलिए नहीं मिल सका कि उनका अब तक अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया गया है. शर्मा का इशारा हिंदू आबादी की तरफ प्रतीत होता है. शर्मा का कहना है कि इससे प्रदेश की अल्पसंख्यक आबादी को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा है और यह राज्य की तरफ से भेदभाव और कर्तव्य निवर्हन में खोट की तरह है.


एक और उदाहरण देते हुए शर्मा कहते हैं कि 2011 में नेशनल माइनॉरिटीज डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कॉरपोरेशन यानी एनएमडीएफसी ने जम्मू-कश्मीर एन्ट्रप्रन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट यानी जेकईडी के साथ मिलकर पुरुष आवेदकों के लिए अनेक लोन देने की स्कीमें शुरू की थीं. शर्मा का आरोप है कि जेकेईडी सिर्फ मुस्लिम, सिख, बौद्ध और ईसाईयों को ही राज्य का अल्पसंख्यक मानकर उन्हें ही लोन दे रही है. शर्मा का इशारा यह है कि इसमें हिंदुओं को इस लोन स्कीम से वंचित किया जा रहा है.

 

दिशा—निर्देशों का उल्लंघन

 

इस याचिका को अगर ईमानदारी से देखा जाए तो यह किसी बहुत बड़ी चूक की ओर इशारा नहीं करती. अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के नए 15 बिंदु कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार के जारी नए निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे राज्यों में जहां नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी के सेक्शन 2 सी में अधिसूचित कोई अल्पसंख्यक समुदाय राज्य के स्तर पर बहुसंख्यक है तो ऐसे में विभिन्न स्कीमों के अंतर्गत अनुदान और सुविधाओं आदि का बंटवारा राज्य के अन्य अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों को किया जाएगा.

इन दिशा-निर्देशों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर एक ऐसा राज्य है जिसमें मुस्लिमों को इस प्रकार की योजनाओं के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए था और इसके फायदे राज्य की अन्य अधिसूचित समुदायों को दिए जाने थे. ऐसा नहीं हुआ इसको निश्चित रूप से दिशा निर्देशों को उल्लंघन माना जाना चाहिए और इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए था. इसलिए भी यह जरूरी है कि राज्य में एक अल्पसंख्यक आयोग हो जो कि राज्य में अल्पसंख्यकों की जरूरत और उनकी शिकायतों को संबोधित कर सके.

 

प्रस्तावित हल

 

इसके हल के लिए शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह किया है

1. राज्य में उचित विधायी प्रक्रिया के जरिए राज्य अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की जाए, जो कि राज्य की ओर से समयबद्ध तरीके से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान और उनकी अधिसूचना जारी कर सके.
2. या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक एक्सपर्ट की कमेटी गठित की जाए जो कि राज्य में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान करे.
3. राज्य सरकार को आदेश दे कि वह धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को सभी फायदे उपलब्ध कराना शुरू करे.
4. दोनों सरकारों को निर्देश दे कि अधिसूचित अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले फायदे उन समुदायों को देना बंद करे जिन्हें की अल्पसंख्यक अधिसूचित नहीं किया गया है. ऐसा तब तक हो जब तक उन्हें अधिसूचित नहीं कर दिया जाए.
5. प्रधानमंत्री 15 बिंदु कार्यक्रम के राज्य में क्रियान्वयन का एक ऑडिट किया जाए
6. हाईकोर्ट के वर्तमान या पूर्व जज की अध्यक्षता में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित की जाए जो कि इस बात की जांच करे कि राज्य में किस तरह से इस कार्यक्रम के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले फायदे मनमाने तरीके से बांटे गए.
7. या इस तरह बनाई गई कमेटी को सीएजी की ऑडिट के आधार पर अपनी जांच करने के निर्देश दिए जाएं
8. प्रधानमंत्री 15 बिंदु कार्यक्रम और अल्पसंख्यकों के लिए चलाईं जा रही अन्य योजनाओं में हो रहे इस प्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक एफआईआर कर उसकी जांच की जाए.

 

First published: 30 March 2017, 8:28 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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