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ग्राउंड रिपोर्ट: जब कश्मीर में सेना और सरकार से ज़्यादा भरोसा चरमपंथियों और जिहाद पर हो जाए

रेयाज़ उर रहमान | Updated on: 27 February 2017, 9:53 IST


13 फरवरी को कुलगाम के फ्रिजल में हुए उस मुठभेड़ स्थल पर चिनार का वह पत्ते वाल पेड़ अब भी अपने तने पर एक भारी सुराख के साथ तनकर खड़ा हुआ है जहां चार चरमपंथियों समेत दो सैनिक तथा दो नागरिकों की मौत हो गई थी. इसके बगल में बना वह घर और जिसमें चरमपंथी छिपे हुए थे, वह अब ढह चुका है. अब इस जगह पर तमाशबीनों का आना—जाना लगा रहता है जिसमें से कुछ लोग कुछ देर रुककर गांव वालों से बात भी करते हैं.


यहां चर्चा उस मुठभेड़ के बारे में ही होती है और दर्शक उस गोलीबारी के बारे में प्रत्यक्षदर्शियों से उनका ब्योरा जानना चाहते हैं. और जब यह चर्चा इस मुठभेड़ की राजनीति की ओर मुड़ती है तब एक अलग किस्म की राहत की तरह नये कश्मीर का विमर्श भी उभरता है. इस विमर्श में चरमपंथी जाहिर तौर पर हीरो की तरह उभरते हैं, सुरक्षा बल द्वेष और घृणा के पात्र की तरह और हालिया हो रहे "अन्यायों" से लड़ने के लिए जिहाद का मार्ग ही एक मात्र रास्ता.

नौजवानों के ख़तरनाक जज़्बात


बीस की उम्र के पड़ाव पर खड़े एक दुबले पतले युवा मुदस्सिर अहमद का कहना है कि दमन के खात्मे के लिए जिहाद ही अब एक मात्र रास्ता है. मुदस्सिर का कहना है क्या आप भूल सकते हैं कि पिछल साल कितने लोग अंधे हो गए और कितने लोगों को मार दिया गया. ग्रामीणों के अनुसार फ्रिजल का मुठभेड़ आधी रात को शुरू हुआ था और जब तक सुबह हुई तब तक दो सुरक्षा बल के लोग और दो नागरिक मारे जा चुके थे.

तब जाकर आसपास के ग्रामीण विरोध में उठ खड़े हुए. इसके बाद आसपास के गांव से और भी युवा आ गए और पेड़ों से खाली की दी गईं पहाड़ियों के पीछे से आकर नारेबाजी के साथ पत्थर फेंकने लगे. इसमें ध्यान देने की बात यह है कि वे सभी पास से पास आ रहे थे जिससे मुठभेड़ स्थल का घेराव कर चरमपंथियों को बचकर निकलने में आसानी हो.


अपने को घिरता देख सुरक्षा बलों ने इन आगे बढ़ते लोगों की भीड़ पर बुलेट और पैलेट से निशाना साधा जिसमें पास के गांव हटीगाम के मुश्ताक अहमद इलटू नाम के एक 22 वर्षीय नौजवान की मौत हो गई. 15 लोग बुलेट से जख्मी हो गए, कई अन्य पैलेट यानी छर्रों की मार से घायल हो गए जिसमें से दो की आंखों में चोट लगी है.


दोपहर में जाकर चरमपंथियों को मारा जा सका और उस घर को डायनामाइट से उड़ा दिया गया, जिससे इसका वहां पर कोई निशान बाकी न रहे. सेना ने घटनास्थल की ठीक से सफाई की और फिर वहां से चली गई. लेकिन अपने तने में बड़े सुराख के साथ खड़ा चिनार का वह पुराना पेड़ अब भी उस स्थल पर मौजूद है मानो उस हिंसा को नकार रहा हो जो कि उस पेड़ की फैली शाखाओं के बीच हुई थी.

सेना की सख़्ती


फ्रिजल की मुठभेड़ के बाद हुई उत्तरी कश्मीर के हाजिन और हंदवाड़ा की मुठभेड़ में ही दरअसल सेना के 4 जवान मारे गए जिसके बाद सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत को मुठभेड़ स्थल पर विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों को चेतावनी जारी करनी पड़ी.


बताया जाता है कि हाजिन मुठभेड़ में विरोध करने वालों ने चार में से तीन चरमपंथियों को निकल जाने में मदद की. इसके दो दिन बाद पुलवामा जिले की उरविन बस्ती में सेना को स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के बाद एक ऑपरेशन ही छोड़कर जाना पड़ा. यहां लोग सैकड़ों की संख्या में सड़क पर आ गए थे और पत्थरबाजी कर रहे थे.

फ्रिजल में युवाओं ने फंसे हुए चरमपंथियों तक पहुंचने में जो निडरता दिखाई तथा सेना की जो नाफरमानी की उसको याद करते हुए 70 वर्षीय गुलाम रसूल कहते हैं कि अब हमारा राष्ट्र मुक्त हो जाएगा, अब हमारा देश आजाद हो जाएगा.

वह आज के चरमपंथियों और 90 के दशक के चरमपंथियों के अगुवाओं में अंतर की भी सराहना करते हैं. वह कहते हैं पहले के चरमपंथी आजादी के बजाय अपने कुछ निजी हितों के लिए लड़ते थे. रसूल कहते हैं कि नब्बे के दशक में जब चरमपंथी घरों में घुसते थे तो वे गोश्त और चिकन खाने के लिए मांगते थे.

 

चरमपंथियों पर भरोसा

 

आज के चरमपंथी ऐसा नहीं करते. वे खाने के लिए भुगतान करते हैं और मिल-जुलकर खाना खाते हैं. रसूल के अनुसार आज के आतंकवादी अल्लाह का आशीर्वाद चाहने के लिए जिहाद में आए हैं न कि जमीन और लोगों के मालिक बनने के लिए. इसी कारण से उनका समर्थन करते हैं और उनकी रक्षा में मरने को भी तैयार रहते हैं.


रसूल जो सामान्य सी बातें कह रहे हैं वो आज इस इलाके में हर जगह सुनी जा सकती हैं, यहां तक कि उन परिवारों में भी जिनके यहां से कोई चरमपंथी मर चुका है या जहां अब भी कोई सक्रिय चरमपंथी है. यह देखा जा रहा है कि जवान बेटा जुल्म से लड़ने, ख़ुदा की ख्वाहिश पूरी करने और आजादी हासिल करने के लिए बंदूक हाथ में ले रहे हैं. इनके मुताबिक जिहाद तो अपने आप मिलता है और यह जीने का एक तरीका है तथा अगर चीजों को बेहतरी की ओर ले जाना है, बदलावा लाना है तो यही एक तरीका है. सिस्टम में भरोसा खो देना ही सबसे बड़ी निराशा है.


मोहम्मद शफी का कहना है कि मेरे भाई को सुरक्षा बलों ने टॉर्चर कर मार दिया था. शफी एक और नागरिक इश्हाक रेशी के भाई हैं जिनकी फ्रिजल मुठभेड़ में मौत हो गई थी. शफी का कहना है कि हमने जरूर न्याय पाने के लिए कोशिश की होती, पर हमारे पहले किसी को न्याय मिला है क्या ?

 

यहां के लोग स्थानीय चरमपंथियों को दिल से जोड़ते हैं, उसकी हीरो की तरह इबादत करते हैं.

पड़ोस के गांव में लोगों की राय थोड़ी अलग है. यहां के लोग स्थानीय चरमपंथियों को दिल से जोड़ते हैं, उसकी हीरो की तरह इबादत करते हैं और हर वह कोशिश करते हैं कि वे उसके नक्शे कदम पर चल सकें. यहां जिहाद के लिए आह्वान हर जगह देखे जा सकते हैं — वे दीवारों पर हैं और यहां तक कि घरों की दीवारों और दरवाजों पर भी हैं. यहां बुरहान पार्क हैं, बुरहान बाजार हैं और बुरहान खेल के मैदान हैं.


यहां चरमपंथियों के परिवार अपने बेटों के बिना किसी कारण के अचानक गायब हो जाने की बात करते हैं जो कि फिर कुछ दिन बाद सोशल मीडिया पर क्लाशिकोनोव के साथ नजर आते हैं. इन्हीं में से एक हैं 22 साल ब्लॉगर अब्दुल बासित जो कि एक बैंक कर्मी गुलाम रसूल डार के बेटे हैं. 11 अक्टूबर की शाम को बासित मस्जिद में अपनी नमाज पढ़ने के लिए गया था पर उसके बाद नहीं लौटा.

कई दिनों तक की गई दिन—रात की खोज के बाद पुलिस ने डार को बताया कि बासित तो हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो चुका है. 53 दिनों बाद बासित को मरहमा के मुठभेड़ में मार दिया गया. लेकिन इन दिनों में बासित ने अपने परिवार को और यहां तक कि अपनी मां को भी एक बार भी फोन नहीं किया.

डार ने नम आंखों से कैच न्यूज को बताया कि उन्हें नहीं पता कि क्या हुआ था. वह एक मामूली बच्चा था. उसने कभी ऐसा कोई इशारा नहीं दिया कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है. उसने कभी राजनीति या आजादी का ज़िक्र भी नहीं किया कि जिससे कि वे सावधान हो जाते. पर मुझे और मेरे जैसे दूसरे बाप और उनकी माओं को इस बीच जो अनुभव हुआ है हम नहीं चाहते कि कोई दूसरे मां-बाप इससे गुजरें. अपने बच्चे को खोना बहुत तकलीफदेह होता है. ख़ुदा के लिए कश्मीर की इस मुसीबत के लिए कुछ करो.

First published: 27 February 2017, 9:53 IST
 
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