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अनंतनाग उपचुनाव: मई तक सरकाने से कश्मीर में इस गर्मी भी हिंसा भड़क सकती है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 April 2017, 10:40 IST


रविवार को श्रीनगर उपचुनाव में हिंसा भड़कने और 8 लोगों की मौत के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी शांतमनु ने अनंतनाग के उपचुनाव आगे सरकाने के संबंध में सोमवार दोपहर सभी राजनीतिक पार्टियों से सलाह की. लोग टेलीविजन और रेडियो के पास सांसें थामे बैठे थे कि क्या फैसला होगा. सरकार ने मोबाइल और ब्रॉडबैंड इंटरनेट बंद कर दिए थे. माहौल में काफी तनाव और अनिश्चितता थी. रविवार को श्रीनगर उपचुनाव में आठ लोगों की मौत ने कश्मीर को फिर से अशांति के कगार पर ला दिया था. कहीं बुधवार को होने वाले अनंननाग उपचुनाव में स्थितियां बेकाबू नहीं हो जाएं.


इसे देखते हुए चुनाव आयोग ने उपचुनाव स्थगित करने का देर रात फैसला लिया और घाटी ने राहत की सांस ली. अब आधा वसंत शांति से बीतेगा. एक दिन बाद तनाव कम हुआ और अनिश्चितता की स्थिति खत्म हुई, पर केवल कुछ समय के लिए. चुनावों को सिर्फ 25 मई तक सरकाया गया है. गर्मी का यह समय घाटी में पर्यटन और व्यवसाय के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होता है. थोड़े समय के लिए चुनावों के स्थगन से तनाव दूर नहीं होगा, बल्कि बना रहेगा. चुनाव के दिन नया बखेड़ा खड़ा होगा और ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका रहेगी.

 

इलाज बीमारी से खतरनाक



घाटी के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ग्रेटर कश्मीर ने अपने पहले पेज पर संपादकीय में लिखा है, ‘क्या डेढ़ माह के स्थगन से समस्या हल होगी? बिलकुल नहीं. उपचुनावों को गर्मियों के लिए सरका दिया गया है, जबकि इस समय पर्यटन और व्यवसाय शिखर पर होता है.’ ग्रेटर कश्मीर ने स्थगन के लिए कहा कि यह ‘इलाज बीमारी से ज्यादा खतरनाक है.’

‘इस तरह चुनाव कैंपेन और मतदान का दिन तनाव बनाए रखेगा, बल्कि बढ़ाएगा. इससे समधान नहीं होगा, बल्कि हाल की नाराजगी की वजह स्थाई रहेगी.’ इसलिए एक महीने आगे भी कश्मीर में वही तनाव रहेंगे. समाचार पत्र का सुझाव था कि ‘चुनाव अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दिया जाए’ या फिर ‘सर्दियों में रखा जाए.’


संपादकीय में आगे लिखा था, ‘कश्मीर के लिए गर्मियों के इस थोड़े से समय में शांत और स्थिरता से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं है. यह समय घाटी की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही अहम है. यदि किसी बात की अत्यधिक आवश्यकता है, तो वह है राजनीतिक गुटों तक एक ईमानदार राजनीतिक पहुंच की, ताकि राज्य में तनाव पैदा करने वाले मुद्दों का स्थाई हल हो सके.’ पिछले साल घाटी में 6 महीने तक रही हिंसा ने सौ के करीब लोगों की जानें लेने और सैकड़ों को अंधा करने के अलावा अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया.

 

चुनाव निपटाना ठीक रहता


स्तंभकार नसीर अहमद कहते हैं, ‘डेढ़ महीने स्थगन से हालात में बहुत कम फर्क पड़ेगा. लोगों की नाराजगी बमुश्किल दूर होगी. इसलिए 25 मई को सरकार के सामने फिर से अभी वाले हालात उभरेंगे. ज्यादा अच्च्छा होता यदि सरकार अनंतनाग में निश्चित समय पर चुनाव करा लेती. और काम निपटाती.’


अनंतनाग के उपचुनाव स्थगित करने के ईसीआई के फैसले की स्वतंत्र उम्मीदवारों ने भी आलोचना की. खासतर तब ज्यादा जब आयोग ने श्रीनगर निर्वाचन क्षेत्र में ३८ मतदान केंद्रों पर फिर से चुनाव करवाने का आदेश किया था. स्वतंत्र उम्मीदवार सजाद अहमद शेख कहते हैं, ‘यदि अनंतनाग लोकसभा सीट के उपचुनाव सुरक्षा के मद्देनजर स्थगित किए गए हैं, तो श्रीनगर निर्वाचन क्षेत्रों में 38 मतदान केंद्रों पर फिर से चुनाव क्यों नहीं रखे गए. क्या बडगाम में मौतें नहीं हुई? क्या पीडीपी-भाजपा सरकार कश्मीरियों का खून बहाना चाहती है?’


अनंतनाग में उपचुनाव स्थगित करने का सरकार का फैसला इंटलिजेंस की सूचनाओं पर किया गया है. बडगाम से भी ज्यादा यहां विरोध की आशंका को देखते हुए. जबकि पिछले दस सालों में इस जिले में बिलकुल आतंक नहीं रहा. हाल के सालों में दक्षिण कश्मीर, जहां अनंतनाग संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है, घाटी फिर से अलगाववाद की मुख्य शक्ति के रूप में उभरी है. मुठभेड़ स्थलों के करीब विरोध प्रदर्शन के कारण दक्षिण कश्मीर में काफी लोग मारे गए.

 

युवाओं की नाराजगी वाजिब


पीडीपी नेता वहीद ने कहा, ‘युवाओं में गुस्सा है, बहुत ही वाजिब नाराजगी. वे चुनाव नहीं चाहते. हम आगे बढऩे के लिए भागीदारी चाहते हैं और इसलिए हमें ज्यादा समय चाहिए.’ पर घाटी के हालात देखते हुए, अनंतनाग में उपचुनाव और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण होंगे. दक्षिण कश्मीर में हाल के चुनाव कैंपेन आंख खोल देने वाले रहे हैं. जहां भी राजनेता गए, उन्हें युवाओं की टोलियों का और दिनों से ज्यादा विरोध झेलना पड़ा. वे पत्थरबाजी कर रहे थे और आजादी के नारे लगा रहे थे.

युवाओं ने रैलियों को रोका और पार्टियों को इनडोर बैठकें करने को विवश किया. पिछले साल की 6 महीने की अशांति से थकावट हुई और मतदान में भागीदारी रही, उसे देखते हुए उपचुनावों के लिए विपरीत प्रतिक्रिया हैरान करती है. इसी तरह, पत्थरबाजी की जो घटनाएं श्रीनगर के केंद्र और बारामुल्ला, सोपोर, अनंतनाग जैसे कुछ शहरी क्षेत्रों तक सीमित थीं, छोटे, दूरदराज गावों में भी होने लगी हैं.


नसीर कहते हैं, ‘इस समय प्राथमिकता घाटी में राजनीतिक पहुंच की होनी चाहिए, ना कि चुनाव की. पराएपन का भाव राजनीतिक सुधार की मांग करता है, ना कि नाराजगी का.’

 

First published: 14 April 2017, 10:40 IST
 
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