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ज़ायरा वसीम का माफ़ी मांगना कश्मीरियों के लिए सम्मान की बात है

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 23 January 2017, 9:28 IST
(कैच न्यूज़)

जब ‘दंगल’ रिलीज हुई और ब्लॉकबस्टर फिल्म बनी, गीता फोगट का किरदार कर रहीं बाल कलाकार जायरा वसीम सुर्खियों में थी. वजह थी, उनकी कश्मीरी पृष्ठभूमि. उन्हें कश्मीर के कुछ लोकप्रिय और परंपरागत रूपकों में बड़ी आसानी से रखा गया: उनमें से एक में निश्चित रूप से हौसला पैदा करने वाला संदेश है. यह संदेश उनकी शानदार सफलता की कहानी और लंबे समय से तनाव से जूझ रही उनकी ज़मीन के बीच गंभीर विरोधाभास है. उनकी मातृभूमि हाल ही में अशांति के दौर से उबरी है. 

और उस परंपरा में एक और आघात: यह घाटी से अपने ही लोगों के विरोध में सफलता की कहानियां खड़ी करती है. बंधनमुक्त और उनके आरोपित पिछड़े आलोचकों के बीच एक काल्पनिक रस्साकशी कायम करने के लिए. हालांकि निसंदेह इन आलोचकों में घाटी से कोई भी हो सकता है. 

यह लंबे समय से है, जब से मीडिया के एक वर्ग ने, खासकर कुछ चैनलों ने कुछ आलोचकों और बड़े पैमाने पर लोगों के बीच अंतर करना बंद कर दिया था. और शायद समझ में आने लायक ढंग से. क्योंकि यह काम में एक गहरे वैचारिक टकराव के बहाने बदनाम करेगा-एक, आधुनिकता और उसके कथित मध्ययुगीन विरोधियों के बीच-और नतीजतन स्टोरी की न्यूज वेल्यू.

  

जैसा कि हम सब जानते हैं, आलोचना एक विश्वव्यापी घटना है और कश्मीर अपवाद नहीं है. और भारतीयों को आलोचना में महारत हासिल है. वे इस काम में दुनिया में सबसे आगे हैं. आप यह अल जजीरा के मेंहदी हसन से पूछें. 

और उन्हें जिन्हें निशाना बनाना है, वे उनमें कोई भेद नहीं करते, बल्कि अमुक दिन की भावना, दर्द या विचारों से प्रेरित और कभी-कभी महज सनक या व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक कारणों से अपमान करने की अविवेकपूर्ण इच्छा से. इसलिए समझने में विफल रह जाते हैं कि देश के एक राज्य के आलोचकों को क्यों उच्चतम दर्जा दिया जाए.

ज़ायरा आसान शिकार

जायरा बाद वाले रूपक में सुरक्षित फिट होती है: कश्मीर की उम्दा स्टोरी के लिए ललचाने वाले सभी तत्व हैं. स्टोरी की मोटी रूपरेखा यह है: जायरा 16 साल की लडक़ी है, जिन्होंने आमिर खान की ब्लॉकबस्टर में अपने काम से हमें प्रभावित किया है. उन्होंने राज्य की एक काबिल किशोरी की ही हममें छवि बनाई है. उनकी सोशल मीडिया पर बुरी तरह से आलोचना की गई. उसके बाद उन्होंने बहुत ही मर्मभेदी माफी मांगी. 

निसंदेह यह स्टोरी है. पर समस्या तब शुरू होती है, जब एक किशोरी को कश्मीर की सुविधाजनक प्रगतिशील छवि का जबर्दस्ती प्रतीक बताया जाए. और उसके आलोचक, जो उनके लिए गलत है, उसे सभी बाशिंदों के लिए बता देते हैं. बेशक, हमारे चुने हुए कुछ अपवादों के अलावा, जिनकी विभिन्न क्षेत्रों में सफलता अनावश्यक रूप से घाटी के दोहरे विचारों के एक पक्ष को मजबूत करने के लिए अपनाई गई. 

जब तक जायरा परिदृश्य में नहीं आई थी, वे सिविल सर्विस में शीर्ष पर रहने वाले और खेलों में उपलब्धियां हासिल करने वाले थे. 2009 के आईएएस टॉपर शाह फैसल इस आरोपित निंदा के सबसे बड़े शिकार थे. जब घाटी में 5 महीने लंबी अशांति चरम पर थी, कुछ टेलीविजन चैनलों ने बुरहान वानी के साथ उनकी तस्वीर लगाई, ताकि कश्मीर के दो भिन्न विचारों के संघर्ष में नाटकीयता लाई जा सके. उन्हें बाध्य किया गया कि वे द इंडियन एक्सप्रेस में अपने विचार रखकर उसे सार्वजनिक रूप से खत्म करने की मांग करें. 

जायरा उनकी नई-नई पकड़ में आई हैं. कश्मीर में कई विवादास्पद घटनाक्रमों की तरह , आप केवल उनकी स्टोरी की यथासंभव मोटे तौर पर विस्तृत रूपरेखा की उम्मीद कर सकते हैं, उसका सुनिश्चित वर्णन और विस्तार नहीं. इस घटनाक्रम के कुछ बुनियादी सवालों से सभी को बातें स्पष्ट हो जानी चाहिए.

सवाल

क्या लोग जायरा के ‘दंगल’ में काम करने से खुश नहीं हैं? किसी ने भी सार्वजनिक रूप से आपत्ति नहीं जताई है, फतवा मुफ्तियों ने भी नहीं, जिन्हें टेलीविजन चैनलों ने स्टोरी में धर्म का पुट डालने के लिए बुलाया. यानि जब तक आप सोशल मीडिया पर कुछ अपरिचित पागलों को पूरे कश्मीर के लिए नहीं बोलने दें तो.

इसमें कोई संदेह नहीं कि जायरा की आलोचना की गई. पर फिर वही सवाल, क्या उनकी ‘दंगल’ में काम करने और एक मुस्लिम लडक़ी द्वारा परंपरा की अवहेलना करने के लिए आलोचना की गई? बिलकुल नहीं. फिर वही बात, हम सब पर पागलों की मंडली के विस्फोट को प्रोजेक्ट नहीं करें. 

इस आवश्यक स्पष्टीकरण से इस्लामिक और बंधनमुक्त लोगों के बीच अंतर्निहित और कड़ी मेहनत से की गई मिथ्या बहस इस तरह समाप्त होनी चाहिए. वह बहस जिसने हमारे टेलीविजन के कई खबरों के कक्षों को उत्तेजना में भर दिया और हमेशा करता है.

क्यों हुई आलोचना

क्या जायरा अब कश्मीर के लिए रोल मॉडल हैं? हां हैं. कई युवा उन्हें देखते हैं और उन जैसा बनना चाहते हैं. पिछले साल, जब जायरा ‘दंगल’ के लिए शूट कर ही रहीं थीं, उन्हें श्रीनगर में युवाओं के कई कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया. उनमें एक कहवा टॉक था. यह घाटी में ‘विमर्श का संस्कृति’ को प्रोत्साहित करने और ‘खोए हुई सामाजिक और वैचारिक मंच’ को फिर से लाने की पहल थी.

तो फिर जायरा की आालोचना क्यों की गई? उन्हें मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मिलने के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. क्यों? क्योंकि सीएम महबूबा की सरकार के राज में जो 96 लोग मारे गए, उनमें ज्यादातर युवा और किशोर थे. सैकड़ों अंधे कर दिए गए, उनमें भी ज्यादा संख्या युवाओं और किशोरों की थी. इसके अलावा सैकड़ों घायल होने की रिपोर्ट है. और सार्वजनिक शख्सियत और यूथ आइकन होने के नाते जायरा को एक महीने पहले ही कश्मीर पर हुए भयावह अत्याचार पर स्तब्ध हो जाना चाहिए था. 

एक व्यक्ति, जिसने जायरा की आलोचना की, लिखा, ‘वाव हैट्स ऑफ डूड..लगता है इस लडक़ी को कश्मीर में इन 6 महीनों में जो हुआ, उसकी जानकारी नहीं है...अपनी रोजमर्रा जिंदगी में व्यस्त है??? हम सबको मरना होगा.’ इस नाराजगी पर ही जायरा ने क्षमायाचना पोस्ट की: ‘मैं जानती हूं, मेरी हाल की गतिविधियों से या जिन लोगों से मैं हाल ही में मिली हूं, उससे कई लोग नाराज और नाखुश हैं. मैं इसके पीछे की भावना समझती हूं, खासकर पिछले 6 महीनों में जो घटा है, उसे देखते हुए.’

मीडिया के लिए नसीहत

और जब मीडिया का एक वर्ग बेहद उत्तेजित हो गया, दावा करते हुए कि उन्हें क्षमा मांगने के लिए बाध्य किया गया, तो जायरा ने इससे इनकार करते हुए एक और पोस्ट डाली: ‘मेरे आखिरी पोस्ट के संदर्भ में , मुझे नहीं मालूम कि यह इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया है...मैं लोगों से बार-बार कह रही हूं कि मुझे किसी ने भी किसी बात के लिए बाध्य नहीं किया है...मीडिया से लेकर हर कोई, आप प्लीज इसे इतना तूल नहीं दें. मुझे ना तो बाध्य किया गया था और ना ही मैं किसी के विरोध में हूं.’

पर मीडिया ने एक ना मानी. फिर नहीं समझने के कारण. उनके पसंदीदा रूपक बुरी तरह विफल हो गए होंगे. परेशान ना हों, यदि ऐसा करने में, वे जायरा को अपनी एजेंसी के लिए मना करते हैं, उसकी तरफ से उसके अवरोध की कल्पना करते हैं और फिर उनकी तरफ से उसकी दुर्दशा को साफ-साफ कहना तय करते हैं. यानि तब भी जायरा ने जोर देकर कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से क्षमा मांगी है. यह कल्पना से परे है, जैसा कि स्क्रॉल डॉट इन पर लिखा गया है, ‘मध्ययुगीन यूरोप में न्यायिक जांच के अधीन विधर्मियों द्वारा विवश किए गए सार्वजनिक इनकार की निंदा.’

पर जब रूपक खुद लक्ष्य हो, तो मामले का विस्तार मायने नहीं रखता. यहां तक कि कई सम्मानित बुद्धिजीवी और लेखक, जिनका काम खुद के परे जाकर सोचना है, वे भी टेलीविजन सर्कस में खरीदने को काफी तैयार थे और इसे सही मान रहे थे. इसीलिए जायरा की घटना और उसकी इतिहास से तुरंत तुलना में प्रबल विषमता थी: जायरा विधर्मी है, उनके आलोचक न्यायिक जांच और कश्मीर मध्ययुगीन यूरोप. ना तो इतिहास में और ना ही समकालीन विश्व में राज्य में होने वाले ऐसे नरसंहार और लोगों को अंधा करने के अत्याचार की किसी के साथ तुलना है.

इसके अलावा, हम मान भी नहीं सकते कि नेता, जिसने इस अत्याचार को अनदेखा किया है, उसने परोक्ष रूप से भी कोई गलती की है. यह दुनिया का नैतिक नजरिया है, जो कइयों की क्रोधित सच्चाई को मजबूत करता है. यह कमेंटरी थी कश्मीर के आज के हालात पर नई दिल्ली से. इसलिए इस आलोचना में अविवेकपूर्ण विषमता, और नरसंहार पर सुविधाजनक चुप्पी. 

पर जायरा इसके लिए अंधी नहीं थीं. घाटी के अन्य बाशिंदों की तरह वह भी पिछले साल जो कश्मीर में हुआ उसकी लाचार दर्शक थी. इसलिए उन्होंने उनके गुस्से और दर्द को समझा, जिसकी वजह से उनकी सीएम से मिलने के बाद आलोचना हुई थी. सीएम का मकसद राजनीतिक हलकों में निरंतर चल रही बहस में उनकी सफलता को हथियार बनाना था. इसलिए जायरा ने सहजता से माफी मांग ली. मैं और कश्मीर उसके लिए उनका सम्मान करते हैं, और ऐसा ही सभी ईमानदार भारतीयों को करना चाहिए. 

First published: 23 January 2017, 9:28 IST
 
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