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कश्मीरियों ने अपने नेताओं के जनाज़े में जाना क्यों छोड़ दिया?

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 12 December 2016, 8:07 IST
QUICK PILL
  • कश्मीर में किसी नेता का आखिरी सबसे बड़ा जनाज़ा शेख़ अब्दुल्लाह का था जिसमें 10 लाख से ज़्यादा लोग शामिल हुए थे. 
  • इसके बाद से कश्मीरी नेताओं के जनाज़ों में भीड़ घटने लगी. दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद के जनाज़े में भी भीड़ नहीं दिखी.

हाल ही में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता के अंतिम संस्कार के मौके पर चेन्नई के मरीना बीच पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा. इसके उलट देखा जाए तो इसी साल जनवरी में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के अंतिम संस्कार के वक्त इतनी जनता मौजूद नहीं थी. मुफ्ती के नमाज-ए-जनाजा में करीब 1000 लोग ही शामिल हुए. इनमें से भी अधिकतर पीडीपी कार्यकर्ता थे. 

और तो और कश्मीर में उस दिन भी माहौल आम दिनों जैसा ही था. यहां तक कि मुफ्ती के गृहनगर बिजबेहड़ा में बाजारों में दुकानें भी खुली हुई थीं. यहां लोगों में वैसा शोक नहीं देखा गया, जैसा तमिलनाडु में जयललिता की मौत पर था. यहां न तो लोग छाती पीट रहे थे, न आंसू बहा रहे थे.

एक और बात गौर करने लायक है कि उस वक्त उनकी बेटी मेहबूबा मुफ्ती को सांत्वना देने प्रधानमंत्री श्रीनगर नहीं पहुंचे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में ही मुफ्ती को श्रद्धांजलि दे दी थी. शायद इसीलिए महबूबा तुरंत राज्य की कमान संभालने के लिए राजी नहीं हुईं थीं.

मुफ़्ती का क़द

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की गैर मौजूदगी तो अलग बात है लेकिन आम जनता की भीड़ न होना कश्मीर में राजनीति और राजनेताओं की हालत बयां करने के लिए काफी है. मुफ्ती कोई छोटे-मोटे नेता नहीं थे. पांच दशकों तक कश्मीर की राजनीति में सक्रिय रहने के अलावा वे केंद्र में पर्यटन एवं गृह मंत्री रहे.

शेख अब्दुल्लाह के बाद कश्मीर की राजनीति में मुफ्ती का नाम सबसे पहले आता है. खास तौर पर उनके अंतिम 15 वर्ष कश्मीर की राजनीति में अहम कहे जा सकते हैं. वे कश्मीर के हक में खड़े हुए. उन्होंने कश्मीर को हिंदुस्तान में मिलने की वकालत की. अलगाववाद और मुख्य धारा की राजनीति के बीच का रास्ता अपनाया.

उनकी पार्टी पीडीपी 2002 में सत्ता में आई थी. तीन साल पहले ही गठित पार्टी के सत्ता में आने से मुफ्ती राज्य के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद अगले दस साल तक मुफ्ती की अगुवाई में पीडीपी राज्य की राजनीतिक धुरी बनी रही. मुफ्ती कश्मीर में दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता से दिल्ली में कश्मीर का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता बने.

उनकी पार्टी राज्य में प्रभावशाली नेशनल कॉन्फ्रेंस को किनारे लगाने में कामयाब रही और जनता ने पीडीपी के पक्ष में मतदान किया लेकिन यही जनता मुफ्ती के अंतिम सफर में दिखाई नहीं दी. उसी दिन मुफ्ती के गृहनगर बिजबहेड़ा में ही एक उग्रवादी की मुठभेड़ में मौत हो गई थी, उनके जनाजे में ही हजारों लोग शामिल हुए थे. 

भीड़ जुट पाना मुश्किल

बात केवल मुफ्ती की ही नहीं है; कश्मीर में मुख्य धारा के राजनेताओं की अंतिम यात्रा में लोगों का शामिल न होना केवल उनकी साख में कमी होना ही नहीं दर्शाता बल्कि केंद्र सरकार भी उनके साथ नहीं है; यह भी एक वजह है. इससे एक बात तो जाहिर है कि कश्मीर में एक राजनेता वोट तो बटोर सकता है लेकिन जनता का समर्थन हासिल करना इतना आसान नहीं है. 

कश्मीर की राजनीति के बारे में एक और बात गौरतलब है, वह यह कि केंद्र कश्मीर पर तो हक जताता है लेकिन जनता की समस्याओं की तरफ से बेखबर ही रहता है. जनता भी बस वोट डालकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती है. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. गुल वानी कहते हैं, 'मुफ्ती ने हालांकि अपनी राजनीति करने की जगह भी बदली लेकिन वे बरसों चली आ रही अपनी छवि को बदलने में नाकाम ही रहे.'

शेख के जनाज़े में उमड़ी थी भीड़

1982 में शेख अब्दुल्लाह का अंतिम संस्कार सबसे बड़ा था. इसमें दस लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे. उनका जनाजा निकाला जा रहा था तब लोग डल लेक के पास इकठ्ठे हो गए थे. पर यह सब केवल कुछ समय तक ही रहा, कुछ दिनों बाद ही शेख पर लोकल जनता ने आरोप लगाया कि शेख ने कश्मीर को दिल्ली के हाथों बेच दिया था. इसीलिए आज तक उनकी मजार पर 24 घंटे पहरा रहता है. 

इसके बाद शेख की पत्नी और बेगम अकबर जहां का निधन 1999 में हुआ और उनके दामाद का 2009 में. इस बार भी बहुत ज्यादा लोग शोक जताने नहीं आए थे. 2004 में कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री मीर कासिम के जनाजे में भी बहुत ही कम लोग शामिल हुए.

बेगम जहां के देहान्त पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी श्रीनगर गए थे लेकिन मुफ्ती के निधन पर मोदी श्रीनगर नहीं गए.

बहरहाल, पीडीपी के एक नेता ने कहा ‘यह सही है कि राज्य की राजनीति में उथल-पुथल बनी रहने के कारण यहां नेताओं के जनाजे में लोगों का भावनात्मक ज्वार नहीं उमड़ता. एक बार राजनीतिक स्थिरता आ जाएगी तो हर चीज सामान्य हो जाएगी. लोग दिल से लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होंगे और नेताओं से भी खुद को भावनात्मक तौर पर जोड़ पाएंगे.

First published: 12 December 2016, 8:07 IST
 
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