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देश के सबसे बड़े 'इंजीनियर' जिन्होंने बिना सीमेंट और मशीनों के किया ये अद्भुत निर्माण

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 September 2018, 14:05 IST

आज हमारे देश के इंजीनियर देश-विदेश में इंजीनियरिंग का एक से बढ़कर एक नमूना पेश कर ख्याति प्राप्त कर रहे हैं. लेकिन 100 साल से भी पहले जब बेहतर इंजीनियरिंग तकनीक और सुविधाएं नहीं थी तब एक इंजीनियर ने ऐसे विशाल बांध का निर्माण करवाया जो भारत में इंजीनियरिंग की अद्भुत मिसाल बन गया.

इस असंभव से लगने वाले निर्माण को अंजाम तक पहुंचाया "इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैय्या" ने.  एम. विश्वेश्वरैय्या का जन्म आज के दिन ही 15 सितंबर 1860 में हुआ था. आज हमारे देश में उनके जन्मदिन को 'इंजीनियर्स डे' के रूप में मनाया जाता है. सर्च इंजन गूगल ने डूडल बनाकर  इस महान इंजीनियर को याद किया है. उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ''भारत रत्न'' से सम्मानित किया गया.

विश्वेश्वरैय्या के जीवन की कुछ बातें

एम. विश्वेश्वरैय्या का जन्म मैसूर ( कर्नाटक) के कोलार जिले में हुआ था. उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकटलक्षम्मा था.
उनकी उच्च शिक्षा बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज में हुई. विश्वेश्वरैय्या के घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. वो ट्यूशन पढ़ाकर अपने पढ़ाई का खर्च निकालते थे. फिर उन्होंने स्कॉलरशिप की मदद से पुणे के साइंस कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की.

बिना मशीनों और उन्नत तकनीक के अद्भुत निर्माण

विश्वेश्वरैय्या ने संसाधनों के आभाव वाले उस दौर में कृष्ण राज सागर' बांध, मैसूर सैंडल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण करवाया था. तब कंप्यूटर से डिज़ाइन नहीं बनाया जाता था और न ही तकनीकों से लैश मशीनें थी. उस दौर में उन्‍होंने पानी रोकने वाले ऑटोमेटिक फ्लडगेट का डिजाइन तैयार कर पेटेंट कराया था, जो 1903 में पहली बार पुणे के खड़कवासला डैम में इस्‍तेमाल किया गया था. सबसे अनोखी बात ये है कि उनके बनाये बांध, डैम और अन्य निर्माण आज भी चट्टान की तरह अविरल देश को फायदा दे रहा है.

बिना सीमेंट बना कृष्ण राजा सागर' बांध

साल 1932 में 'कृष्ण राजा सागर' बांध के प्रोजेक्ट में वो चीफ इंजीनियर थे. तब इस बांध को बनाना इतना आसान नहीं था क्योंकि 'कृष्ण राज सागर' बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट तैयार नहीं होता था. विश्वेश्वरैय्या ने परिस्थितियों से हार नहीं मानी और इंजीनियर्स के साथ मिलकर 'मोर्टार' तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था. यह बांध आज भी कर्नाटक में मौजूद है. उस समय इसे एशिया का सबसे बड़ा बांध कहा गया था.

First published: 15 September 2018, 14:05 IST
 
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