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भारत की विरासत को बचाने की पहल कर रहे हैं ये पति-पत्नी, जानिए कैसे

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 April 2019, 0:19 IST

हर देश की अपनी एक पहचान होती है. जिसे पुराने मूल्यों और विरासत के लिए जाना जाता है. एक जमाना था जब भारत का हस्तकला या हथकरघा उद्योग पूरी दुनिया में मशहूर था, भारत में हाथ के बने कपड़े और तमाम तरह के वस्त्रों का विदेशों में निर्यात किया जाता था, लेकिन 21वीं सदी में बदले बदलती दुनिया का असर भारतीय बाजार और समाज पर भी पड़ा और हम सब अपनी विरासत यानि हथकरघा को भूलते चले गए. इसकी जगह पश्चिमी देशों की सभ्यता ने ले ली और फैशन का मूल्य भी बदल गया.

बावजूद इसके कुछ लोग हैं जो आज भी भारत की इसी तरह की विरासतों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. तमिलनाडु का एक दंपति भी इसी तरह की पहल में लगा है. इस दंपति ने एक बार फिर से भारतीय बाजार में हथकरघा उद्योग या हस्तकला को बचाने की पहल की है. इस दंपति का नाम है मणिचिन्नास्वामी और विजयलक्ष्मी नचायर.

दोनों ने मिलकर साल 2009 में 'एथिकस' नाम की एक कंपनी की शुरु की. जो हाथों से निर्मित ओर्गेनिक या जैविक वस्त्रों का निर्माण करती है. बता दें आज पूरी दुनिया में ऑर्गेनिक यानि जैविक वस्तुओं के प्रति लोगों का तेजी से रुझान बढ़ा है ऐसे में हथकरघा उद्योग में भी जैविक वस्त्रों का निर्माण नई क्रांति लाएगा.

हस्तकला या हथकरघा उद्योग को बचाने की पहल

बता दें कि भारत में अधिकतर निम्नवर्गीय परिवार के लोग ही हस्तकरघा के काम से जुड़े होते हैं ऐसे में उन्हें अपनी गरीबी बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पाता क्योंकि भारत में हथकरघा उद्योग एकदम हासिए पर चला गया है, लेकिन मणिचिन्नास्वामी और विजयलक्ष्मी नचायर की पहले ने एक बार फिर से हथकरघा उद्योग को सींचना संवारना शुरु कर दिया. अब गरीब परिवार के लोगों के लिए ये पैसा कमाने का अच्छा जरिया भी बन गया है. हथकरघा गरीब पिछड़े परिवार के लिए काफी मदद मिल जाती है. भारत के कई हिस्सों में गांव के लोग हमारी हथकरघा परंपरा को आज भी जीवित रखे हैं.

यही वजह है कि मशीन द्वारा बने हुए कपड़े और हाथ द्वारा बने हुए कपड़े हमारी हथकरघा ने अलग पहचान बनाई है. बता दें कि भारत में आय के साधन में कृषि के बाद दूसरे नंबर पर हथकरघा का ही रहा है. हथकरघा कला में लोगों के बीच खादी के सूती कपड़ों कि ज्यादा मांग है. हाथ से डिज़ाइन की हुई साड़ी सूट महिलाओं को काफी पसंद आते हैं.

साल 2009-10 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 43 लाख से ज्यादा बुनकर हथकरघा कला से जुड़े है. जिनमें 77 प्रतिशत बुनकर औरत और 23 प्रतिशत पुरुष शामिल हैंबता दें कि करीब 23.77 लाख हथकरघा की डिज़ाइन अलग-अलग बुनकर द्वारा इस्तेमाल की जाती है. भारत में हथकरघा से 2014 -2015 में करीबन 72 लाख वर्ग स्वायर मीटर कपड़े का निर्माण किया गया है और 2246 करोड़ निर्यात किया गया है.

भारत में हस्तकरघा के क्षेत्र में लोगों को काफी रोजगार भी प्राप्त हुआ है. हस्तकरघा से बनी चीज की मांग से लोगों में व्यापार की भी काफी बढ़ोतरी हुई हैआजकल इंटरनेट के जमाने में ई-कॉमर्स का व्यापार के लिए अच्छा प्लेटफार्म है. -कॉमस इंटरनेट पर व्यापार से हर महीने हज़ार बुनकर जुड़ रहे है.

देश विदेश में ई-कॉमर्स द्वारा व्यापार से बुनकर को काफी फायदा हुआ है. एक ऐसा ही एथिकस नाम नाम का ब्रांड है जो बुनकर को उनकी गुणवत्ता और हथकरघा को आगे बढ़ाने में मदद करती है. यह एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो जैविक वस्त्रों से जुड़े कपड़ों का निर्माण करता है. एथिकस हाथों से बने कपड़ों का बड़ा प्लेटफॉर्म है. एथिक्स अपाची ईको का अपाची ईको-लॉजिक कॉटन कंपनी की ब्रांड है जो तमिलनाडु पोल्लाची में स्थित है.

बता दें कि इससे हथकरघा के काम में लगे बुनकरों को नई पहचान मिली है.आज के दौरा में एथिक्स द्वारा बुनकरों को एक नाम और पहचान मिली है. जहां उन्हें मजदूर की जगह आर्टिस्ट के नाम से जाना जाता है. यही नहींं ये सभी चीजें उनके खेत से उगाई हुई चीजों के बनती हैं.

एथिक्स इस हफ्ते दिल्ली में अपनी प्रदर्शनी लगा रहा है. ये प्रदर्शनी 5-6 अप्रैल को दिल्ली के हौज खास में स्थित इंडि कॉलेज में लगेगी. जहां खूबसूरत हथकरघा से बनी चीजों का प्रदर्शन किया जाएगा. इस प्रदर्शनी का नाम क्रॉसरोड रखा है. जिसका मकसद अलग-अलग पक्षियों के डिजायन को देखकर साड़ी पर उतारा गया है. उनकी साड़ियों में इस बार मद्रास चेक और अलग-अलग पक्षियों के डिजायन की साड़ियां नजर आएंगी.

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First published: 5 April 2019, 0:19 IST
 
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