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चुनावी साल में पार्टियों को जमकर मिला चंदा, इलेक्टोरल बांड की बिक्री में 62 % की बढ़ोतरी

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 April 2019, 17:11 IST

पिछले साल की तुलना में लोक सभा चुनाव वाले साल में इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री में 62 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इस साल में एसबीआई ने 1700 करोड़ के बांड की बिक्री की है. पुणे स्थित एक आरटीआई के जवाब में, एसबीआई ने कहा है कि 2018 में उसने मार्च, अप्रैल, मई, जुलाई, अक्टूबर, नवंबर के महीनों में 1056.73 करोड़ रुपये के बांड बेचे. इस साल जनवरी और मार्च में बैंक ने 1716.05 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बांड बेचे हैं.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार बिक्री 2018 के दौरान की बिक्री से 62 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है. चुनावी बांड की बिक्री एसबीआई शाखाओं में खुलती है जब वित्त मंत्रालय किसी निश्चित अवधि के लिए बिक्री की अधिसूचना जारी करता है. एसबीआई द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2019 के लिए मुंबई से चुनावी बांड की सबसे अधिक खरीद की गई थी, जहां 495.60 करोड़ रुपये के बांड बेचे गए. इसके बाद कोलकाता ने 370.07 करोड़, हैदराबाद 290.50 करोड़, दिल्ली 205.92 करोड़ रुपये और भुवनेश्वर में 194 करोड़ की बिक्री की गई.

 

केंद्र सरकार द्वारा 2018 में अधिसूचित चुनावी बांड की योजना को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है. केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 29A के तहत पंजीकृत राजनीतिक दल और जिसने पिछले आम चुनाव में जन सभा या विधान सभा के चुनावों में एक प्रतिशत से कम मत हासिल किए थे राज्य के, बांड प्राप्त करने के लिए पात्र होंगे. बांड उस व्यक्ति द्वारा खरीदे जा सकते हैं जो भारत का नागरिक है. बांड 15 दिनों के लिए वैध रहते हैं और केवल एक योग्य राजनीतिक दल द्वारा उस अवधि के भीतर अधिकृत बैंक के साथ एक बैंक खाते के माध्यम से एन्कोड किया जा सकता है.

चुनावी सुधारों के क्षेत्र में काम करने वाले एक स्वैच्छिक समूह, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने बिक्री पर रोक लगाने की मांग की है, जबकि सीपीआई-एम ने इसे अलग-अलग याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी है. एडीआर ने हाल ही में शीर्ष अदालत में एक आवेदन दायर कर चुनावी बॉन्ड योजना 2018 पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसे केंद्र ने पिछले साल जनवरी में अधिसूचित किया था.

इसमें कहा गया है कि संबंधित अधिनियमों में किए गए संशोधनों ने राजनीतिक दलों के लिए असीमित कॉर्पोरेट दान के लिए बाढ़ और भारतीय के साथ-साथ विदेशी कंपनियों द्वारा बेनामी वित्तपोषण को खोल दिया है. जो भारतीय लोकतंत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं. आवेदन में आगे कहा गया है: "चुनावी बांड तीन महीने में बड़ी संख्या में उपलब्ध कराए जा रहे हैं जिससे देश में आम चुनाव होने हैं. अप्रैल-मई 2019 में 17 वीं लोकसभा का गठन होगा.

यह उम्मीद की जाती है कि अप्रैल और मई में राजनीतिक दलों द्वारा भारी मात्रा में कॉर्पोरेट फंड प्राप्त किया जाएगा और यह चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. 2017-18 की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि सत्ताधारी बीजेपी चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त धन का सबसे बड़ा हिस्सा मिला. भाजपा ने 2017-18 में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है और चुनाव आयोग को जमा किए गए अपने वार्षिक रिटर्न के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में राजनीतिक फंडिंग का अधिकतम लाभ पाया.

इस मुद्दे पर सीपीएम द्वारा एक अलग याचिका की सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि उसने केंद्र को यह कहते हुए लिखा था कि राजनीतिक फंडिंग से संबंधित कई कानूनों में किए गए बदलावों में पारदर्शिता पर गंभीर नतीजे होंगे. हालही में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नया राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले कानून से पारदर्शिता में कमी आयी है.

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First published: 1 April 2019, 17:11 IST
 
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