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भोपाल गैस त्रासदी के 32 साल: आज भी इंसाफ़ की दरकार बरक़रार

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 December 2016, 11:36 IST
(रघु राय)

भोपाल गैस त्रासदी को आज पूरे 32 साल गुज़र गए, लेकिन पीड़ितों को अब क इंसाफ नहीं मिल पाया है. मध्य प्रदेश की तत्कालीन अर्जुन सिंह सरकार और केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने घटना के बाद जो प्रयास किये, वो नाकाफ़ी साबित हुए हैं.

मदद के नाम पर आज भी पीड़ितों की आंख पथराई हैं, कि उन्हें कभी तो इंसाफ मिलेगा. 2 दिसंबर 1984 की रात भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड प्लांट से टनों मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) गैस का रिसाव हुआ.

इस त्रासदी में हज़ारों बेगुनाह दम घुटने और हार्ट अटैक से मारे गये. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 3787 लोगों को इस दर्दनाक त्रासदी में जान गंवानी पड़ी. इसके अलावा आज भी कई लोगों को सांस की बीमारी, अंधेपन और कैंसर की समस्या सामने आ रही है.

3,787 लोगों ने गंवाई जान

2 दिसंबर 1984 को भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कारखाने के 610 नंबर के टैंक में खतरनाक मिथाइल आइसोसाइनाइट रसायन रखा था. उसमें पानी भर गया. जिसके कारण तापमान 200 डिग्री तक पहुंच गया. उसकी वजह से धमाका हुआ और टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया. उस समय 42 टन जहरीली गैस का रिसाव हुआ था.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 3,787 लोगों की मौत हुई. वहीं कई एनजीओ का दावा है कि मौत का आंकड़ा 10 से 15 हजार के बीच था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गैस से करीब 5,58,125 लोग प्रभावित हुए थे. इनमें से करीब 4000 लोग ऐसे थे जो गैस के प्रभाव से परमानेंट डिसेबल हो गए थे, जबकि 38,478 को सांस से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था.

नहीं हाथ आया एंडरसन

भोपाल गैस त्रासदी का मुख्य आरोपी एंडरसन था, जिसकी मौत 29 सितंबर को अमेरिका के फ्लोरिडा में हो गई. दिसंबर 1984 में हुआ भोपाल गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी. उस वक्त एंडरसन यूनियन कार्बाइड का प्रमुख था.

एंडरसन को घटना के चार दिन बाद गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जमानत मिलने के बाद वह छुपकर अमेरिका भाग गया. उसके बाद वह कभी भी भारतीय कानून के शिकंजे में नहीं आया.

भारत की कोर्ट के द्वारा एंडरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया गया. भारत ने अमेरिका से एंडरसन के प्रत्यर्पण के काफी प्रयास किये, लेकिन भारत इस मामले में असफल रहा.

10 गुना ज्यादा कैंसर का खतरा

बताया जा रहा है कि वर्तमान में भोपाल गैस पीड़ितों की बस्ती में रहने वालों को दूसरे इलाकों में रहने वालों की तुलना में किडनी, गले तथा फेफड़े का कैंसर 10 गुना ज्यादा तेजी से हो रहा है.

इतना ही नहीं भोपाल गैस पीड़ितों की बस्ती में टीबी तथा पक्षाघात भी तेजी से पनप रहा है, लेकिन उनकी सहायता और पुनर्वास के लिए सरकारी मदद ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है.

First published: 2 December 2016, 11:36 IST
 
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