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EXCLUSIVE: मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत को शिवराज सरकार ने दिया बड़ा तोहफा

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 April 2018, 16:05 IST

23 जनवरी 2018 को पूर्व चुनाव आयुक्त एके ज्योति के रिटायरमेंट के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अफसर ओपी रावत को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया. रावत ने अपना कार्यभार संभालते ही चुनावों में होने वाली गड़बड़ियों को लेकर कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए. हालांकि मध्यप्रदेश सरकार ने उन पर 9 साल पहले उनकी सेवा के दौरान के एक मामले में चल रही जांच बंद कर दी.

गौर करने वाली बात यह है कि रावत के खिलाफ इस मामले में चल रही जांच बंद करने की तारीख शिवराज सरकार ने बड़ी दिलचस्प चुनी. पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार इसी साल 24 फ़रवरी को सरकार ने फाइल को बंद करने का फैसला लिया. जबकि 24 फ़रवरी को ही मध्य प्रदेश की मुंगावली और कोलारस सीटों पर उप चुनाव थे. जांच की फाइल को कार्मिक विभाग ने मुख्य सचिव बीपी सिंह को भेजा गया और उन्होंने इसे हरी झंडी दे दी.

इस मामले में चल रही जांच को बंद करने के पीछे कारण भी बड़ा दिलचस्प है. इसमें कहा गया है कि शिकायत करने वाले ने अपना पूरा नाम और पता नहीं लिखा था. कार्मिक विभाग ने रावत के खिलाफ जांच बंद करने के पीछे एक कारण यह भी बताया है कि रावत 31 दिसंबर 2013 को सेवा निवृत्त हो चुके हैं, ऐसे में पेंशन नियमों के तहत उन पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है.

चुनाव आयोग ने दिखाई थी सख्ती

24 फरवरी को मुंगवाली-कोलारस उपचुनाव में चुनाव आयोग की सख्ती देखने लायक थी. हालांकि इस चुनाव में बीजेपी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा. आयोग ने सीएम को संभलकर बोलने की नसीहत दी. जबकि मंत्री यशोधरा राजे को वोटरों को धमकाने का दोषी मानते हुए उन्हें चेतावनी दी. मंत्री माया सिंह को नोटिस भी दिया गया था. 

मुंगावली से कांग्रेस उम्मीदवार बृजेंद्र सिंह यादव ने भाजपा की प्रत्याशी बाई साहब यादव को 2,124 मतों के अंतर से पराजित किया. कांग्रेस उम्मीदवार बृजेंद्र सिंह यादव को कुल 70,808 वोट मिले जबकि भाजपा की उम्मीदवार बाई साहब यादव को 68,684 मत मिले. 

रावत के खिलाफ इस मामले में चल रही थी जांच

मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अफसर रावत पर आरोप लगा था कि उन्होने आदिम कल्याण विभाग के प्रमुख के पद पर रहते हुए अनुसूचित जाति का गलत फायदा कुछ बाहर से आये लोगों को दिया. यह लिखित शिकायत सिवनी में अजाक्स संगठन के सदस्य ब्राम्हणे के नाम से मई 2009 में मुख्य सचिव को दी गई थी.

इस शिकायत में ओपी रावत और उनके अधीनस्थ अधिकारी सुरेन्द्र सिंह भण्डारी पर आरोप थे कि 14 सितंबर 2008 को बघेल-बागड़ी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल नहीं करने का फैसला हुआ, लेकिन इन्होंने आदेश जारी नहीं किए. जिसके परिणाम स्वरुप उन्हें आरक्षित वर्ग का फायदा मिलता रहा. यह भी शिकायत की गई थी कि यूपी में बांदा से रीवा एवं पन्ना में आए कुम्हार प्रजापति के लोगों को अनुसूचित जाति का लाभ दे दिया गया जो यह केन्द्र की गाइडलाइन का उल्लंघन था.

इस मामले में पीएस,जीएडी रश्मि अरुण शमी ने बताया कि शिकायतकर्ता का नाम और पता पूरा नहीं होने के कारण शिकायत बंद कर दी गई है और निर्णय मेरिट के आधार पर हुआ. मंत्रालय में इ-फाइलिंग सिस्टम लागू हो रहा है. पेडिंग फाइलें, जो आधारहीन है, उन्हें नस्तीबद्ध किया जा रहा है. इनमें यह फाइल भी शामिल है.

दूसरी ओर मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कहना है कि ''मुझे कोई जानकारी नहीं कि मेरे बारे में शिकायत हुई थी. जब शिकायत के बारे में पता नहीं तो फाइल बंद पर कैसे कहूं.'' 

क्या कहते हैं जांच के नियम

नियमों के अनुसार यदि कोई गुमनाम शिकायत आती है तो उसका निपटारा तत्काल जरूरी है. शिकायत में यदि महत्वपूर्ण तथ्य हैं और शिकायतकर्ता लिखता है कि वह जान का खतरा होने के कारण अपनी पहचान नहीं दे रहा है तो उसे जांच में लिया जाता है. साथ ही शिकायत के साथ शपथपत्र भी देखा जाता है. अगर शपथपत्र नहीं है तो उस शिकायत को भी तत्काल बंद किया जा सकता है. रिटायरमेंट के चार साल तक सरकार आरोपी अधिकारी पर पेंशन नियमों के के अनुसार कार्रवाई कर सकती है.

First published: 9 April 2018, 15:48 IST
 
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