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कान्हा में एक और बाघ मरा, इस साल अब तक 21 मौतें

शैलेंद्र तिवारी | Updated on: 25 October 2016, 8:06 IST
(पत्रिका )
QUICK PILL
  • कान्हा रिज़र्व फॉरेस्ट के बफ़र ज़ोन में 22 अक्टूबर को फिर एक बाघ मरा हुआ पाया गया है. माना जा रहा है कि शिकारी बाघ की हत्या के बाद उसके चारों पैर काट के ले गए. हालांकि कान्हा प्रबंधन इस मौत को शिकार मानने को तैयार नहीं है. 
  • कैग की आपत्ति के बावजूद नहीं हट रहे अवैध रूप से चल रहे हैं पर्यटन विभाग के होटल और वन विभाग के पेट्रोल पंप

मध्य प्रदेश के रिज़र्व फॉरेस्ट में सैलानियों को सुविधाएं मुहैया कराना बाघों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर रहा है. यह साल बाघों के लिए सबसे बुरा साल साबित होने जा रहा है क्योंकि अभी तक 21 बाघ अपनी जान गवां चुके हैं. इनमें ज्यादातर बाघों की मौत शिकारियों ने ली है लेकिन कुछ मामलों को छोड़कर वन विभाग बाकी की मौतों को सामान्य मान रहा है. हालांकि सरकारी आंकड़ों और रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के वनों में शिकारी सक्रिय हैं. 

राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) के आंकड़े कहते हैं कि जनवरी 2009 से मई 2014 के भीतर मध्यप्रदेश में 69 बाघों की मौत हुई है. कारणों में बीमारी, क्षेत्रीय लड़ाई समेत कई कारण गिनाए गए हैं. इनमें एक बाघ का शिकार हुआ, तीन को जहर देकर मारा गया, सात बाघों को करंट देकर मारा गया और चार हादसे का शिकार हुए. 

सोशल एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि टाइगर रिजर्व में लगातार सैलानियों की भीड़ बढ़ती जा रही है. खुद सरकार पर्यटन और दूसरी सुविधाओं के नाम पर लोगों को कोर एरिया में आकर्षित कर रही है. इसी आवाजाही का फायदा शिकारी भी उठा रहे हैं. 

कैग की रिपोर्ट

हाल में विधानसभा में पेश कैग की रिपोर्ट कहती है कि कोर एरिया में सरकारी घुसपैठ खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में सरकारी निर्माण कार्य हो रहे हैं जबकि नेशनल टाइगर कन्जरवेशन अथॉरिटी के नियम ऐसे किसी निर्माण और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों की इजाज़त नहीं देते. 

इसी तरह कान्हा टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में वन विभाग का पेट्रोल पंप चल रहा है. जबकि कान्हा रिजर्व की टीसीपी में साफ कहा गया है कि इस तरह के पेट्रोल पंप का संचालन जानवरों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. बघीरा हट के नाम पर मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम होटल संचालित कर रहा है जबकि वन विभाग ने कर्मचारियों के आवास और कार्यालय के नाम पर बहुत-सा निर्माण कर रखा है. 

रातापानी अभ्यारण्य में भी मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम एक जंगल कैंप आयोजित करता आ रहा है. जबकि कूनो अभ्यारण्य में वन विभाग कोर एरिया के अंदर दो विश्रामगृह कमर्शियल उपयोग कर रहा है. दोनों ही एनटीसीए के हिसाब से अवैध संचालित हो रहे हैं. 

इन निर्माण पर कैग ने अपनी 2015 की रिपोर्ट में सीधी आपत्ति दर्ज कराई है. रिपोर्ट में लिखा है कि संरक्षित क्षेत्र से इस तरह की कमर्शियल गतिविधियों को खत्म किया जाना तत्काल जरूरी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वन्य प्राणियों के लिए संकट खड़ा कर रही हैं. अजय दुबे कहते हैं, सरकार जब खुद नियमों को ताक पर रखेगी तो फिर किससे उम्मीद की जाएगी.

First published: 25 October 2016, 8:06 IST
 
शैलेंद्र तिवारी @catchhindi

लेखक पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं.

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