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सिमी एनकाउंटर: यह मध्य प्रदेश मॉडल है

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 November 2016, 8:27 IST
QUICK PILL
  • भोपाल सेंट्रल जेल से कथित तौर पर फरार आठ विचाराधीन कैदियों की मौत पर सवाल उठने लाजिमी हैं. जिस तरह से फरारी के 12 घंटे के भीतर ही दस किलोमीटर के दायरे में आठो को मार गिराया गया, उससे मुठभेड़ पर कई सवाल खड़े हुए हैं. 
  • जेल तोड़ने, फरार होने और हथियार आदि रखने के मामले में मध्यप्रदेश के अलग-अलग अधिकारियों के बयानों में जबरदस्त विरोधाभास देखने को मिला.

भोपाल सेंट्रल जेल से कथित तौर पर फरार आठ विचाराधीन कैदियों की मौत पर सवाल उठने लाजिमी हैं. जिस तरह से फरारी के 12 घंटे के भीतर ही दस किलोमीटर के दायरे में आठो को मार गिराया गया, उससे मुठभेड़ पर कई सवाल खड़े हुए हैं. जेल तोड़ने, फरार होने और हथियार आदि रखने के मामले में मध्यप्रदेश के अलग-अलग अधिकारियों के बयानों में जबरदस्त विरोधाभास देखने को मिला.

घटना से जुड़े फोटो, वीडियो, मृतकों के शरीर पर मौजूद ने कपड़े और जूते मुठभेड़ की पूरी कहानी पर सवालिया निशान लगाते हैं. पुलिस के बयान पर भरोसा करें तो जेल से निकलने के बाद आठो आरोपित वहां से अलग-अलग समूहों में दूर भागने की बजाय कपड़े, देशी हथियार, सूटकेस और जूते आदि के जुगाड़ में ही समय बर्बाद करते रहे.

मध्य प्रदेश पुलिस और प्रशासन ने उन तमाम सवालों को नजरअंदाज कर दिया जो कि उनके अधिकारियों के विरोधाभासी बयानों से पैदा हुए थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि एनआईए जेल ब्रेक की घटना की जांच करेगा. लेकिन मुठभेड़ की जांच कौन करेगा? इस पर चुप्पी छायी हुई है. 

अतीत का अनुभव बताता है कि इस तरह की मुठभेड़ के मामले में एफआईआर मृतक के खिलाफ ही दर्ज होता है न कि पुलिस के खिलाफ. लिहाजा मारे गए आठ लोगों की एफआईआर हर हाल में सार्वजनिक होनी चाहिए ताकि यह मामला कानूनी दांवपेंच में उलझ कर दम न तोड़ दे.

कुछ लोग इस हत्या को मृतकों के सिमी से जुड़ाव की आड़ में जायज ठहराने की कोशिश करेंगे. एक मंत्री ने इस घटना को मनोबल बढ़ाने वाली घटना करार देकर इसकी शुरुआत भी कर दी है.

लेकिन कानून का राज बिल्कुल अलग मसला है. इसकी पहली शर्त है कि पुलिस को साबित करना होगा कि जिन लोगों को मारा गया है वह जायज था और इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था.

जिस लापरवाह तरीके से पुलिसवाले मृत शरीरों के ऊपर गोली दाग रहे थे वह पूरे मामले को समझने में मदद कर सकता है और साथ ही यह बात भी समझ में आती है कि कैसे मध्य प्रदेश में सिमी के नाम पर पुलिस मनमानी कर रही है.

पुरानी वारदात पर भी सवाल

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है कि बीते कई सालों में मध्य प्रदेश में कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई है. पिछली घटना आज से सात साल पहले खांडवा जिले के तीन पुलिया इलाके में हुई थी 28 नवंबर, 2009 को. इस घटना में एटीएस के एक सिपाही सीताराम बाथम समेत तीन लोगो की मौत हुई थी.

स्थानीय पुलिस का दावा था कि यह घटना प्रतिबंधित सिमी के सदस्यों ने अंजाम दिया है. इस घटना के अलावा मध्य प्रदेश में अन्य कोई आतंकी वारदात नहीं हुई है. इस मामले में भी सिमी के शामिल होने का दावा पुलिस ने ही किया था, इसमें आतंकवाद का लिंक कभी स्थापित नहीं हो सका.

इस तरह के रिकॉर्ड वाले मध्य प्रदेश में यूएपीए के तहत गैर कानूनी गतिविधियों में शामिल लोगों की गिरफ्तारी की दर बहुत ऊंची है. हमारी पिछली रिपोर्ट में यह बात साबित हुई थी. इसमें हमने पाया था कि सिमी के पूर्व सदस्यों, उनके रिश्तेदारों के खिलाफ इंदौर, स्यौनी, भोपाल, खंडवा, बुरहानपुर, उज्जैन, नीमच, गुना आदि जिलो में मामले दर्ज किए गए.

मध्य प्रदेश मॉडल

इन सभी मामलों की एफआईआर कमोबेश एक जैसी थी मसलन, प्रतिबंधित सिमी के पक्ष में नारेबाजी, पर्चे बांटना, सदस्यता स्लिप, उर्दू पोस्टर आदि. कई मामलों में तो आरोपी, आरोप और दिन-तारीख भी एक ही है. इसी तरह कई मामलों में सबूत भी एक जैसे पाए गए. राज्य के चार अलग हिस्सों में चल रहे चार मामलों में एक ही पत्रिका की प्रति को सबूत के तौर पर पेश किया गया.

इसी तरह एक मामले में दैनिक जागरण अखबार में सफदर नागौरी के नार्को टेस्ट से जुड़ी खबर को सबूत के तौर पर पेश किया गया. धार जिले के पीतमपुरा का मामला सिमी के खिलाफ खड़े किए गए मामलों को समझने का सबसे बेहतर तरीका है.

27 मार्च 2008 को सिमी के 13 अहम कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया. धार के एसएसपी ने 29 मार्च को मध्य प्रदेश के अन्य जिलों के प्रशासन को पत्र लिखकर उनसे इस मामले में केस दर्ज करने के लिए कहा. नतीजन महीने भर के भीतर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में उनके खिलाफ 18 मामले दर्ज हो गए. अगले छह महीने के दौरान चार और मामले दर्ज हुए. यह अपने आप में रिकॉर्ड है.

आरोपी राज्य भर में दर्ज अलग-अलग मामलों में पेश होते रहे. इस बीच उनके ऊपर देश के अलग अलग हिस्सों में आतंक और धमाके के अन्य मामले भी दर्ज होते गए. मारे गए लोगों में एक अकील खिलजी के ऊपर 2001 के बाद से लगातार मामले दर्ज हुए.

खंडवा ट्रायल

जून 2011 में खांडवा पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने आधी रात को खिलजी के घर में छापा मारकर खिलजी और अन्य सिमी सदस्यों की बैठक करते हुए पकड़ा. वे आतंकी हमले की साजिश रच रहे थे. इस छापे में गिरफ्तार खलील और अमजद भी कल के मुठभेड़ में मारे गए.

पुलिस का दावा था कि खलील और अमजद को 13-14 तारीख की रात गिरफ्तार किया गया था जबकि उनके परिजनों ने सीजेएम को पत्र लिखकर बताया कि उनके बेटे को 10-12 जून के बीच गिरफ्तार किया गया था और 24 घंटे के भीतर उन्हें कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया.

खांडवा सिटी कोतवाली ने सीजेएम कोर्ट को बताया कि दस तारिख को खलील को बुलाया गया था लेकिन उसे हिरासत में नहीं लिया गया था. जबकि अमजद लंबे समय से फरार था. इतने खतरनाक सिमी कार्यकर्ता 13 तारीख को पुलिस की पकड़ में आ गए, वह भी उसी घर में मीटिंग करते हुए.

मध्य प्रदेश पुलिस की सिमी की यही कहानी है. मुठभेड़ को सही साबित करने की होड़ में वे खुद को बार-बार गलत साबित कर रहे हैं. हालिया आठ मौतों को इस रोशनी में देखा जाना चाहिए तब समझ आएगा कि किस तरह से सिमी की आड़ में पूरे राज्य में असंख्य मुस्लिम युवाओं को सुनियोजित तरीके से आरोपी बनाया जा रहा है. एक मामले में दो युवतियां भी आरोपित हैं.

सोमवार को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सिमी कार्यकर्ताओं के एनकाउंटर पर यह जामिया टीचर्स सॉलिडैरिटी एसोसिएशन का पक्ष है. यहां दिए गए विचार और तथ्य निजी हैं. इनमें किसी तरह की त्रुटि के लिए कैच हिंदी जिम्मेदार नहीं होगा.

First published: 2 November 2016, 8:27 IST
 
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