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काश ऐसा टीचर हर गांव में होता, सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाने के लिए सहते हैं ये मुश्किलें

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 March 2018, 12:23 IST

टीचर की नौकरी को आराम का जरिया समझने वाले शिक्षकों के लिए महाराष्ट्र में एक शख्स प्रेरणा बन गया. ये शख्स भी एक टीचर है. इनका नाम है रजनीकांत मेंढे. रजनीकांत सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाने के लिए रोजाना 130 किलोमीटर का सफर करते हैं. सफर के दौरान रजनीकांत को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. बावजूद इसके रजनीकांत ने हार नहीं मानी और पिछले 8 साल से उनका सफर लगातार जारी है.

जी न्यूज की खबर के मुताबिक रजनीकांत मेंढे नागपुर के रहने वाले हैं और पेशे से एक सरकारी शिक्षक हैं. साल 2010 में उनकी पोस्टिंग पुणे से करीब 65 किलोमीटर दूर भोर के चंदर गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी. इस गांव तक पहुंचने के लिए ऊंची पहाड़ी और धूल मिट्टी से भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है. इस सफर को तय करने के लिए रजनीकांत बाइक का सहारा लेते हैं.

रजनीकांत रोजाना दोनों तरफ से 130 किलोमीटर का सफर तय करते हैं. ये गांव एक तरह से अति पिछ़ड़ा गांव है. यहां ना तो पीने को पानी है और ना ही कोई अस्पताल. गांव में करीब 60 लोग ही रहते हैं. मकान के नाम पर इस गांव में सिर्फ 15झोपड़ियां हैं. यहां के लोग इन्हीं झोपड़ियों में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं.

गांव के एक मात्र प्राथमिक स्कूल में सिर्फ एक ही बच्चा पढ़ता है. रजनीकांत इसी बच्चे को पढ़ाने के लिए रोजाना 130 किलोमीटर का मुश्किल सफर तय करते हैं. जी न्यूज की खबर के मुताबिक रजनीकांत ने बताया कि पिछले दो साल से स्कूल में सिर्फ आठ साल का युवराज पढ़ने आता है.

रजनीकांत बताते हैं कि गांव में और भी बच्चे हैं लेकिन वे पढ़ने नहीं आते. युवराज को भी उन्हें कभी-कभी ढूंढ कर लाना पड़ता है. वो कभी पेड़ तो कभी अपने घर में ही छुप जाता है. रजनीकांत कहते हैं कि अकेले स्कूल आना और वहां पढ़ना किसी भी बच्चे के लिए बोझ सा है. लेकिन वे अपने स्टूडेंट को पढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं.

गरीबी की वजह से बच्चों को करना पड़ता है काम

भारत सरकार भले ही गरीबी और बेरोजगारी को खत्म करने का दावा करती हो. पीएम मोदी को भले ही विकास पुरुष के रूप में देखा जाता हो लेकिन चंदर गांव को देखकर यकीन हो जाएगा कि इस गांव के लिए शायद किसी ने कुछ नहीं किया. इस गांव के लोग गरीबी से इस तरह तंग है कि उन्हें अपने बच्चे को भी काम पर लगाना पड़ता है. इसीलिए इस गांव के लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बजाए काम पर लगाना पसंद करते हैं.

स्कूल बंद करना चाहती है सरकार

स्कूल में बच्चों की संख्या को देखते हुए सरकार इस स्कूल को बंद करना चाहती है. रजनीकांत बताते हैं कि शुरुआत में स्कूल में 15-20 बच्चे पढ़ने आते थे, लेकिन अब सिर्फ युवराज ही बचा है. गरीबी के कारण कई माता-पिता अपने बच्चों को किसी न किसी काम में लगा चुके हैं. घर की लड़कियों को भी काम के लिए कई लोगों ने गुजरात भेज दिया है, जहां वे मजदूरी करती हैं. उन्होंने बताया कि पिछले आठ सालों में यहां के हालात ज्यादा नहीं बदले हैं.

12 किलोमीटर मुश्किल भरा पहाड़ी रास्ता और चंदर गांव का स्कूल

रजनीकांत चंदर गांव के स्कूल तक पहुंचने के लिए लगभग 12किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय करते हैं. इस पहाड़ी पर सड़क आज तक नहीं बनी. रजनीकांत इसे पार करके ही गांव तक पहुंच सकते हैं. वो भी सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाने के लिए.

आजादी के बाद नहीं बदले स्कूल और गांव के हालात

आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी इस गांव के हालात नहीं बदले. चंदर में गांव में साल 1985 में यह स्कूल बना था. यहां शुरुआत में सिर्फ चार दीवारें थी और छत नहीं थी. ऐसे में बारिश होने पर स्कूल में पानी भर जाता था.

कुछ समय पहले यहां टीन की छत लगवाई गई, लेकिन बारिश होने पर इसमें से पानी रिसता है. रजनीकांत बताते हैं कि उनके घरवालों को इस बात की जानकारी नहीं है कि वे इतनी दूर और इतने कठिन रास्तों से होते हुए आते हैं. उन्होंने कहां कि घरवालों को पता चला तो वे चिंता करेंगे, इसलिए उन्हें अभी तक इस बारे में नहीं बताया है.

चंदर गांव में ना बिजली है और ना ही रोजगार

इस गांव में ना तो बिजली है और ना ही रोजगार. ऐसे में लोगों को सिर्फ पत्थर तोड़ने का काम करना पड़ता है. इस गांव के बच्चों को भी पत्थर तोड़ने का काम करना पड़ता है. पहाड़ पर होने की वजह से इस गांव में सांपों की संख्या बहुत है. इस गांव कोई अस्पताल भी नहीं है. ऐसे में कोई हादसा हो जाने पर इस गांव के लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

First published: 31 March 2018, 11:45 IST
 
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