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फिटनेस के मामले में सिंधु, फेडरर, नडाल और जोकोविच जैसे दिग्गजों से हैं बेहतर, मात्र 30 सेंकेड में दूर होती है थकान

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 August 2019, 17:25 IST

भारत की टेनिस सनसनी पी वी सिंधु ने साल 2013 में पहली बार बीडब्ल्यूएफ विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में कांस्य पदक अपने नाम किया था. इसके बाद साल 2014 में भी उनके हिस्से में कांस्य ही आया. इसके बाद सिंधु ने अगले तीन साल तक जमकर तैयारी की और फिर साल 2017 में वो फाइनल मुकाबले तक पहुंची लेकिन इस बार भी वो स्वर्ण पदक नहीं जीत पाई और उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. साल 2018 में एक बार फिर उन्हें मौका मिला स्वर्ण जीतने का लेकिन इस बार भी उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. वहीं साल 2019 में वो अपनी हार के क्रम को तोड़ने में सफल हुई और उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम किया.

ओलपिंक में भारत को रजत पदक दिलवाने वाली पी वी सिंधु के लिए विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप से पहले यह साल कुछ अच्छा नहींं रहा था. उन्हें प्रतिष्ठित ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप के पहले राउंड में ही हार का सामना करना पड़ा था. सिंधु ने इस हार को सामान्य बताया था. लेकिन इस हार के सिंधु का मनोबल काफी गिर गया था. सिंधु के पिता रमन्ना को इसका अंदाजा हो गया था. 

रमन्ना ने इसके बाद अपने मित्र पूर्व शटलर प्रदीप राजू से मुलाकात की जो सिकंदराबाद स्थित सुचित्रा बैडमिंटन अकैडमी को संचालित करते है. इसके बाद सिंधु भी सुचित्रा बैडमिंटन अकैडमी गई जहां उनकी मुलाकात स्ट्रेंथ ट्रेनर श्रीकांत वर्मा से हुआ. श्रीकांत ने सिंधु की कमजोरियों को पहचाना और फिर उस पर काम किया.

प्रदीप ने बताया कि,'हमने सिंधु का अध्ययन किया. यह सब कुछ वैज्ञानिक तरीकों से हुआ. उनके खेल को देखा तो पाया कि वह पिछले कुछ समय से अपने अटैकिंग खेल की बजाए रैलियों में ज्यादा व्यस्त हो रही थीं.'

प्रदीप राजू ने बताया कि आखिर सिंधु ने अपने आप को ऐसी परिस्थिति में कैसे ढाला. उन्होंने बताया,'सिंधु के ऐबडोमनल मसल्स (पेट की मांसपेशियां) भी कमजोर थीं और फ्रंट कोर्ट मूवमेंट पर इसका असर पड़ रहा था. मानसिक मजबूती के लिए सिंधु को मेडिटेशन भी कराया. वह प्रति दिन आधे घंटे अकेले बंद कमरे में मेडिटेशन करती हैं. इसका बहुत प्रभाव पड़ा है. सिंधु मानसिक रूप से और मजबूत हुई हैं.'

सिंधु के पिता रमन्ना के दोस्त और पूर्व शटलर प्रदीप ने बताया कि,'सिंधु के शरीर में ऐसी खूबियां हैं जो बहुत ही कम ऐथलिटों में होती हैं. कड़ी मेहनत करने या किसी काम में पूरी ऊर्जा डालने के बाद उनके दिल की धड़कन जब बहुत तेज हो जाती है तो उसे सामान्य होने में महज 30-35 सेकंड का समय लगता है. ऐसा बहुत कम ऐथलिटों में देखने को मिलता है. टेनिस की त्रिमूर्ति रोजर फेडरर, राफेल नडाल और नोवाक जोकोविच के साथ भी कुछ ऐसा ही है. इनके दिल की धड़कन को भी सामान्य होने में 30 से 35 सेकंड का समय लगता है. यानी अन्य प्लेयर की तुलना में ये अपनी थकावट से जल्दी उबर जाते हैं.'

पी.वी. सिंधु ने विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीत रचा इतिहास, आज तक कोई भारतीय नहीं कर पाया ऐसा

First published: 27 August 2019, 17:12 IST
 
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