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'हॉकी के जादूगर' को आज तक किसी भी सरकार ने क्यों नहीं दिया 'भारत रत्न'

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 January 2018, 15:16 IST

देश के 69वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट सेवाओं और उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई. इस साल 85 लोगों को पद्म अवार्ड दिए जाएंगे. तीन लोगों को पद्म विभूषण, नौ लोगों को पद्म भूषण और 73 लोगों को पद्म श्री से नवाजा जाएगा. देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न के लिए इस बार भी किसी के नाम पर सहमति नहीं बनी.

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और 16 बार के वर्ल्ड चैंपियन पंकज आडवाणी को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण के लिए चुना गया. भारत सरकार ने बृहस्पतिवार की रात दोनों को पद्म भूषण से सम्मानित किए जाने की घोषणा की. लेकिन 'हॉकी के जादूगर' दद्दा ध्यानचंद को एक बार फिर भुला दिया गया.

 

खेल मंत्रालय की ओर से उनके नाम की सिफारिश किए जाने के बाद भी उन्हें एक बार फिर देश के सर्वोच्च सम्मान के लिए नहीं चुना गया. पिछले काफी लंबे समय से भारतीय हॉकी के दिग्गज ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग चल रही है. लेकिन इस साल भी हॉकी के जादूगर को भारत रत्न के लायक नहीं समझा गया.

तीन-तीन ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलवाए फिर भी हुई अनदेखी

अपने खेल जीवन में 1000 से ज्यादा गोल करने वाले महान खिलाड़ी ध्यानचंद की अगुआई में भारत ने 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. जब खेलों में भारत रत्न देने की शुरुआत की मांग की जा रही थी तो पहला भारत रत्न ध्यानचंद को मिलना चाहिए था लेकिन उनके साथ सही न्याय नहीं हुआ. साल 2014 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को पहला भारत रत्न दे दिया गया.

 

2014 में हॉकी खिलाड़ियों ने मार्च निकालकर तत्कालीन प्रधानमंत्री से मांग भी की थी. इसके बाद 2011 में 82 सांसदों ने युवा एवं खेल मंत्रालय से ध्यानचंद को भारत रत्न देने की अपील की. 2016 में राज्यसभा सदस्य दिलीप टर्की ने भी संसद में ध्यानचंद को भारत रत्न न देने के सवाल को उठाया था. लेकिन अब तक सरकार ने इस अपील को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है.

सचिन तेंदुलकर को महज़ 24 घंटे के अंदर भारत रत्न देने का फैसला लेने वाली सरकारें पांच बार सिफारिश के बावजूद मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने का मन अब तक नहीं बना पाई हैं.

देश में क्रिकेट जब अपने शैशवकाल में था तब भारत हॉकी में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुका था. वर्ष 1928, 1932 और 1936 ओलंपिक जीत में मेजर ध्यानचंद भारत के वो तुरूप के इक्के साबित हुए थे जिसका तोड़ किसी भी विपक्षी टीम के पास नहीं था.

 

mid day

क्रिकेट में जो मुकाम सर डॉन ब्रेडमैन का रहा, उस दौर में वही मुकाम ध्यानचंद का था. ब्रेडमैन भी उनके खेल की प्रशंसा किए बग़ैर नहीं रह सके थे. यहां तक कि जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने जब ध्यानचंद को खेलते देखा तो वे उनके ऐसे मुरीद हुए कि अपने देश से खेलने का ही न्योता दे दिया. उनके बनाए कई रिकॉर्ड आज तक टूटे नहीं हैं. यह ध्यानचंद के खेल की ही जादूगरी थी कि उनकी हॉकी स्टिक की जांच तक की नौबत आ गई थी.

इसलिए जब खिलाड़ियों को भारत रत्न देने का रास्ता खुला तो ध्यानचंद का दावा किसी भी दृष्टि में सचिन से कम नहीं था. लेकिन कई नाटकीय घटनाक्रम के बाद 2013 में सचिन को तो भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया लेकिन ध्यानचंद का इंतज़ार अब भी जारी है.

उनकी याद में हर साल उनके जन्मदिवस (29 अगस्त) को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है. इस दिन खिलाड़ियों को खेल पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है. उनके नाम पर खेल में आजीवन उपलब्धि के लिए खेल मंत्रालय द्वारा मेजर ध्यानचंद पुरस्कार दिया जाता है. उनके नाम पर पुरस्कार बांटे जा रहे हैं लेकिन जिस पुरस्कार और सम्मान के वे हक़दार हैं, उन्हें वह नहीं दिया जा रहा है.

 

प्रारम्भ में इस सम्मान को मरणोपरांत देने का प्रावधान नहीं था, यह प्रावधान 1955 में बाद में जोड़ा गया. तत्पश्चात् 13 व्यक्तियों को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया. सुभाष चन्द्र बोस को घोषित सम्मान वापस लिए जाने के उपरान्त मरणोपरान्त सम्मान पाने वालों की संख्या 12 मानी जा सकती है. एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है.

प्रारम्भ में इस सम्मान को मरणोपरांत देने का प्रावधान नहीं था, यह प्रावधान 1955 में बाद में जोड़ा गया. तत्पश्चात् 13 व्यक्तियों को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया. सुभाष चन्द्र बोस को घोषित सम्मान वापस लिए जाने के उपरान्त मरणोपरान्त सम्मान पाने वालों की संख्या 12 मानी जा सकती है. एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है.

First published: 26 January 2018, 15:16 IST
 
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