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हाशिम चचा के बिना कैसा है अयोध्या का हाल इस 6 दिसंबर को

अनूप कुमार | Updated on: 10 February 2017, 1:37 IST
QUICK PILL
  • अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के 24 साल बाद यह पहली 6 दिसंबर है जब बाबरी मामले के मुख्य मुद्दई हाशिम अंसारी अयोध्या में नहीं होंगे.
  • हाशिम अंसारी की दुनियाभर में पहचान का सबसे बड़ा आधार यही है कि वो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे पुराने पक्षकार थे.
  • हाशिम अंसारी कभी कभार मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते थे. लिहाजा 1949 में मूर्तियां रखे जाने पर उन्होंने ही पहली रपट पुलिस में दर्ज कराई और बाबरी मस्जिद विवाद में पैरोकार बन गए.

6 दिसंबर, 1992, वो तारीख जिस दिन अयोध्या में विवादित स्थल पर मौजूद मस्जिद को कारसेवकों ने ढहा दिया था. उस तारीख ने दुनिया भर में हिंदू-मुसलमानों के बीच जो खाई पैदा की है वो दिनोंदिन बढ़ती गई है. उस घटना को हुए 24 साल का वक्त गुजर चुका है लेकिन दोनों समुदायों के बीच भरोसे और आपसी समझ की जो खाई पैदा हुई है वह समय के मल्हम से भी भर नहीं पाई है.

हर 6 दिसंबर को प्रतीकात्मक रुप से इस मसले से जुड़े पक्ष अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करते हैं. राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग शौर्य दिवस, गौरव दिवस, विजय दिवस आदि कार्यक्रम आयोजित करते हैं वही मुस्लिम समुदाय के लोग इस तारीख को काला दिवस, यौमें ग़म, स्याह दिवस जैसे नामों से याद करते हैं.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के 24 साल बाद यह पहली 6 दिसंबर है जब बाबरी मामले के मुख्य मुद्दई हाशिम अंसारी अयोध्या में नहीं होंगे. उनके बगैर मुस्लिम समुदाय के लोग यौमें ग़म मनाएंगे. हाशिम अंसारी इसी साल 20 जुलाई की सुबह लंबी बीमारी के बाद चल बसे. हालांकि बाबरी मस्जिद मुकदमे की पैरवी के लिए अन्य पक्षकार भी मौजूद है लेकिन इस मुकदमे के सबसे पुराने और बुजुर्ग पक्षकार हाशिम अंसारी ही थे. इस साल भी 6 दिसंबर को उनके आवास पर लोगों की भीड़ इकट्ठा होगी लेकिन हर साल की तरह मुस्लिम कौम के लोगों को इंसाफ मिलने तक इंतजार करने की ताईद करने वाले हाशिम अंसारी नहीं होंगे.

हर 6 दिसंबर को प्रतीकात्मक रुप से इस मसले से जुड़े पक्ष अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करते हैं

हाशिम अंसारी की दुनियाभर में पहचान का सबसे बड़ा आधार यही है कि वो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे पुराने पक्षकार थे. साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि और आर्थिक स्थिति वाले हाशिम अंसारी को शायद इतनी शोहरत नहीं मिलती अगर वे इस ऐतिहासिक विवाद से न जुड़े होते.

1949 में विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गई तो अयोध्या और फैजाबाद का माहौल बिगड़ गया. उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें हाशिम अंसारी भी शामिल थे.

वे बाबरी मस्जिद विवाद में पैरोकार कैसे बने इसकी कहानी भी दिलचस्प है. अंसारी बताते थे कि उनका सभी लोगों के साथ सामाजिक मेलजोल था. जब यह बात आई कि मस्जिद में मूर्ति रख दी गई है और इसका विरोध होना चाहिए. तो लोगों ने उनसे मुकदमा करने के लिए कहा. इसकी एक वजह यह भी थी कि उनका घर उन कुछेक मुसलिम परिवारों में था जो विवादित परिसर के आस पास ही रहता था और कभी कभार मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था. लिहाजा उन्होंने पहली रपट दर्ज कराई और बाबरी मस्जिद विवाद में पैरोकार बन गए.

बाद में 1961 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड मुस्लिमों की तरफ से इस मामले को देखने लगा. लेकिन उसने हाशिम अंसारी को इसमें मुख्य मुद्दई बनाए रखा.

दंगा पीड़ित भी रहे अंसारी

6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में हुए बलवे में लोगों ने अंसारी का भी घर फूंक दिया था. जिंदा रहते तक अंसारी हमेशा कहते थे वो फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहे हैं और मौत का भी, लेकिन वो चाहते थे कि मौत से पहले अयोध्या का फैसला देख लें. लेकिन नियति को ये मंजूर नहीं था.

अयोध्या में विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर बीते चार दशक से अधिक समय से आंदोलन चला रहे विश्व हिंदू परिषद के नेता इस वर्ष भी परंपरागत रूप से अपने प्रांतीय कार्यालय कारसेवकपुरम में शौर्य दिवस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं. इस कार्यक्रम में राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री चंपत राय सहित बड़ी तादात में अयोध्या के संत समुदाय, संघ और बजरंग दल के लोग शामिल होंगे.

हाजी महबूब कहते हैं, हाशिम अंसारी के रहने, न रहने से बाबरी मस्जिद की लड़ाई को कोई फर्क नहीं पड़ता

आज जब हाशिम अंसारी नहीं हैं तब 6 दिसंबर के मौके विश्व हिंदू परिषद क्या सोचता है? विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, 'जिस तरह से हम विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन कर रहे हैं उसी प्रकार से हाशिम अंसारी भी उस स्थान पर बाबरी मस्जिद के लिए लड़ाई लड़ रहे थे. आज भले ही अंसारी आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन बाबरी मस्जिद के लिए लड़ने वाले अपना कार्यक्रम करेंगे और हम अपना कार्यक्रम पूरी भव्यता से करेंगे. हमें उनके कार्यक्रम से कोई लेना देना नहीं है.'

बाबरी मस्जिद मामले के एक अन्य पैरोकार और मरहूम हाशिम अंसारी के खिलाफ माने जाने वाले हाजी महबूब बीते दो दशक से अधिक समय से 6 दिसंबर पर यौमे ग़म कार्यक्रम का आयोजन करते आ रहे हैं. इस कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ वकील ज़फरयाब जिलानी सहित मुस्लिम समुदाय के तमाम नेता शामिल होते हैं. इस बार भी हाजी महबूब ने यौमें ग़म कार्यक्रम का आयोजन किया है.

पहली बार हाशिम अंसारी की गैरमौजूदगी के सवाल पर हाजी महबूब कहते हैं, 'वैसे भी हाशिम अंसारी अपने घर पर हमेशा अलग तरीके से 6 तारीख पर विरोध जताते थे. हम हमेशा से मस्जिद की शहादत पर इंसाफ की मांग करते आ रहे हैं और करते रहेंगे. हाशिम अंसारी के रहने, न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

अंसारी के लिए यह हक़ और इंसाफ की लड़ाई थी, रामलला का विरोध नहीं

हाशिम अंसारी सिर्फ बाबरी मस्जिद के सबसे पुराने पैरोकार भर नहीं थे. वे एक पूरी तहजीब, जिसे हम गंगा-जमुनी आदि नामों से जानते हैं, की जीती-जागती मिसाल थे. उन्होंने ज़िन्दगी के आखिरी लम्हे तक बाबरी को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ी लेकिन उन्होंने अयोध्या में रामलला के अस्तित्व को कभी चुनौती नहीं दी, न ही उन्हें कभी अपशब्द कहे. उनकी लड़ाई एक मस्जिद के लिए थी जो उनके होश संभालने के समय से मौजूद थी और जिसे उनकी आंखों के सामने कुछ धर्मांध लोगों ने ढहा दिया था.

अंसारी भले ही अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन अयोध्या में उनके चाहने वालों की तादाद कम नहीं है. अपनी जिंदगी के आखिरी महीनों में हाशिम अंसारी ने तो यहां तक कह दिया था कि अब वह बाबरी मस्जिद का मुकदमा नहीं लड़ेंगे और वह रामलला को आजाद देखना चाहते हैं क्योंकि सियासत के लोग इस पर अपनी रोटियां सेक रहे हैं.

हाशिम अंसारी ने अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत ज्ञानदास के साथ मिलकर सुलह समझौते के जरिए इस विवाद के हल के लिए अथक प्रयास किया लेकिन दोनों पक्षों के सियासी दखल के कारण योजना कभी जमीन पर उतर नहीं सकी.

अंसारी भले ही अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन अयोध्या में उनके चाहने वाले हिंदू-मुसलमानों की तादाद कम नहीं है

अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत ज्ञान दास बताते हैं, 'अंसारी की कमी उनके जीवन में हमेशा खलेगी, उसकी भरपाई हो पाना संभव नही है. अगर वे कुछ दिन और जिंदा रहते तो मंदिर-मस्जिद के मामले का कुछ न कुछ सकारात्मक हल ज़रूर निकल आता. बीते कई वर्षों से तो उन्होंने 6 दिसम्बर के दिन किसी तरह का कार्यक्रम करना भी बंद कर दिया था और सुलह-समझौते की मुहिम चला रहे थे.'

इस मामले के कानूनी पक्षकारों की हाशिम अंसारी के प्रति चाहे जो भी राय हो लेकिन अयोध्या की अमन पसंद जनता उन्हें बेहद आदर और सम्मान से याद करती है. उनसके मुताबिक हाशिम चाचा ने हमेशा दोनों समुदायों को साथ लेकर चलने की कोशिश की. यही वजह है की पूरी जिंदगी बाबरी मस्जिद की पैरवी करने के बावजूद उन्हें हिंदू समुदाय के लोग भी उतनी ही इज्जत देते हैं जितना कि मुस्लिम कौम के लोग.

अंसारी के निधन पर उनके आवास पर सबसे पहले पहुंचने वालों में अयोध्या के साधु संत थे. अयोध्या के पांजी टोला मोहल्ले में रहने वाले रमेश पांडे बताते हैं, 'हम लोग पूजा पाठ का काम करते हैं. भगवान राम के नाम पर हमारी रोजी रोटी चलती है, लेकिन जब 6  दिसंबर आता है तो हाशिम चाचा के साथ बैठकर फोटो भी खिंचवा लेते हैं क्योंकि हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं है. हाशिम चाचा खुद भी चाहते थे कि भगवान राम को उनका समुचित सम्मान मिले.'

अयोध्या के एक व्यापारी बालकृष्ण वैश्य का कहना है की हाशिम अंसारी ने जिंदगी भर भले ही बाबरी मस्जिद के लिए लड़ाई लड़ी हो लेकिन अयोध्या के आम लोगों में उनकी छवि अच्छी थी इसी वजह से उनके जनाजे में शामिल होने के लिए अयोध्या के तमाम लोग गए. कभी भी उन्होंने हिंदू मुस्लिम को लड़ाने वाली बात नहीं कही. पहली बार 6 दिसंबर उनके बिना होगा लिहाजा हम सबको उनकी कमी जरूर खलेगी.'

हाशिम अंसारी के पड़ोसी रईस अंसारी के मुताबिक हाशिम चाचा ने इंसाफ की लड़ाई लड़ी. बाबरी मस्जिद के हक की लड़ाई के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी. यहां लोगों ने बाबरी मस्जिद के नाम पर अपनी बिल्डिंगें बनवा ली लेकिन हाशिम चाचा ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में भी सरकारी मदद से ही अपना इलाज कराया. उनकी ईमानदारी किसी के लिए भी मिसाल हो सकती है, वरना इस मामले से जुड़े लोग रसूखदार हो गए. उनकी कमी अयोध्या के हर नागरिक को महसूस होगी. सभी को यह विश्वास था कि जब तक वह इस शहर में है तब तक यहां पर कोई विवाद नहीं होगा.

First published: 6 December 2016, 8:03 IST
 
अनूप कुमार @catchhindi

संवाददाता, पत्रिका, उत्तर प्रदेश

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