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बाबरी पर आडवाणी का ट्रायल: दोष साबित हो न हो, जीत भाजपा की होगी

चारू कार्तिकेय | Updated on: 20 April 2017, 10:29 IST


सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की याचिका को स्वीकार करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ लगे आपराधिक साजिश के आरोपों को बहाल कर दिया है. अब इनके खिलाफ रोज़ाना के आधार पर सुनवाई होगी. किसी को भी एक कदम पीछे की ओर देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को गहराई से देखना चाहिए.

 

यह बात गौर करनी चाहिए कि वास्तव में यह न्यायिक कार्रवाई का नतीजा नहीं है. गौर करने वाली बात तो यह है कि सीबीआई ने कोर्ट से अपील की थी कि लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार समेत अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र के आरोपों को दोबारा चलाया जाए.

यह वही सीबीआई है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चर्चित टिप्पणी में 'पालतू तोता' बताया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने, जब वह प्रधानमंत्री नहीं थे, सीबीआई को 'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन' कहा था. यह वही सीबीआई है जो प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले कार्मिक मंत्रालय, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के तहत काम करती है जिसने काफी सक्रियता से सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि नेताओं के खिलाफ षडयंत्र के आरोपों को बहाल किया जाना चाहिए.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह सब राजनीतिक आवश्यकता है या यूं कह लीजिए, राजनीतिक भविष्यवाणी है. इस आदेश के बाद जो सबसे ज्यादा प्रमुख प्रतिक्रियाएं आईं, उससे यह परिकल्पना बनती दिख रही है कि यह एनडीए के राष्ट्रति उम्मीदवार के रूप में आडवाणी की सम्भावनाओं को खारिज करने के लिए है. इस बिन्दु पर यह समय यह सवाल पूछने का है कि क्या मोदी को इस हद तक जाने की जरूरत है ताकि एनडीए की ओर से आडवाणी के राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने की संभावनाएं बिखेरी जा सकें?

 

पार्टी के इस पूज्य वृद्ध पुरुष के पास अपनी ही पार्टी में कोई मजबूती नहीं है और वह अपनी ताकत दिखाने की भी स्थिति में भी नहीं हैं. अगर मोदी उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाना चाहते होंगे तो वे उन्हें सभी संकट में डालते हुए सीबीआई को अपना काम करने देंगे.

 

 

सब कुछ खुल्लम खुल्ला

 

अन्य अनुमान या अटकलें जो लगाई जा रहीं हैं, वह ये हैं कि सीबीआई की कार्रवाई वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर की जा रही है. गणित यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना के आधार पर सुनवाई करने का आदेश दिया है और दो साल की समयसीमा तय की है तो यह ट्रायल तब खत्म होगा जब लोकसभा चुनाव होने को होंगे. अगर भाजपा नेता दोषी ठहराए जाते हैं तो पार्टी उनका परित्याग कर देगी और कानून के पक्ष में खड़े होने का दावा करेगी. अगर उन्हें दोषमुक्त कर दिया जाता है तब पार्टी को अपने नेताओं के खिलाफ अभियान चलाने का मौका मिल जाएगा जैसा कि लगभग तीन दशक पहले पार्टी के खिलाफ प्रोपेगंडा किया गया था.

निश्चित रूप से, रोज़ाना की सुनवाई से भाजपा और संघ परिवार को इस मुद्दे को धीरे-धीरे गरम रखे रहने का बहुत बड़ा मौका मिल जाएगा और वह आगे चलकर इसे अपने वोट आधार के रूप में उपयोग में लाएगी. उमा भारती ने पहले ही इसका संकेत दे दिया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा है कि उन्हें राममंदिर आन्दोलन में भाग लेने पर गर्व है. उन्होंने अपनी अक्खड़ और बागी शैली में कहा कि कोई 'षडयंत्र' नहीं किया गया था और सब कुछ 'खुल्लम खुल्ला' किया गया. यह मुखर स्वीकारोक्ति इरादों का संकेत ही है और साथ ही यह इशारा भी कि संघ परिवार का हर सदस्य इस पर गर्व करने का दावा करेगा और सहानुभूति लेने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देगा.

हालांकि, ट्रायल पर फैसले का समय और 2019 के लोकसभा चुनाव को आपस में जोड़ने का आंकलन करना बहुत ही जल्दबाजी होगी. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ट्रायल सुप्रीम कोर्ट की तय सीमा में पूरा हो ही जाए. यह सुनवाई पहले भी पूरी हो सकती है और इसमें आगे भी समय लग सकता है. केवल 105 गवाहों के ही बयान लिए जाने हैं और यदि लखनऊ की अदालत सुप्रीम कोर्ट के आदेश को वास्तव में अक्षरशः क्रियान्वित करने का निश्चय करती है तो यह सुनवाई बहुत जल्द ही पूरी हो जाएगी.

 

राजनीतिक चाल?


अगर सरकार न्यायिक प्रक्रिया में दखलंदाजी करना चाहती होगी और भाजपा नेताओं के लिए क्लीनचिट सुनिश्चित करना चाहती होगी तो वह इसे जल्द ही कर लेगी क्योंकि इतनी तो समझ होगी ही. वास्तव में, यदि सरकार इसे एक या दो माह में ही पूरा कर लेती है तो यह समय बिल्कुल ठीक होगा क्योंकि तब राष्ट्रपति चुनावों का समय होगा. (राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई को खत्म हो रहा है) तब आडवाणी को एनडीए गर्व के साथ राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतार सकता है.

इस तथ्य से यही अनुमान लगता है कि लखनऊ की अदालत का फैसला सरकार की पसन्द से जुड़ा होगा और यह केवल तभी सम्भव है जब केस को अदालत में कमजोर कर दिया जाए. हालात क्या होंगे, कोई नहीं जानता, पर कुछ तो होगा ही?

First published: 20 April 2017, 10:07 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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