Home » राजनीति » Akhilesh become National president of Samajwadi Party
 

मुलायम सिंह यादव: ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे, कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

आशीष कुमार पाण्डेय | Updated on: 1 January 2017, 14:18 IST
(कैच)

उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी जिसे मुलायम सिंह यादव ने 60 सालों के दौरान गांव-गांव, बाजार-बाजार घूमकर खड़ा किया था. पार्टी का काडर तैयार किया. जिस पार्टी को कभी मुलायम सिंह के साथ जनेश्वर मिश्रा और मोहन सिंह जैसे दिग्गज समाजवादियों ने मिलकर मजबूत बनाया था वो एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद एक झटके में समाजवादी से अखिलेशवादी हो गई.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आज उस मुलायम सिंह से पार्टी की सर्वोच्च गद्दी छीन ली, जिनकी ऊंगली पकड़ कर उन्होंने राजनीति सीखी थी, शायद यही कारण है कि कहा जाता है राजनीति में कोई सगा और सौतेला नहीं होता है.

राजनीति को नजदीक से समझने वाले भी इस पूरे घटनाक्रम से हतप्रभ हैं कि मुलायम सिंह के रहते हुए उनका समाजवादी कुनबा आज ताश के पत्तों की तरह बिखर चुका है.

सभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर मुलायम से चूक कहां पर हुई. क्या शिवपाल पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करके वो गच्चा खा गये या फिर रामगोपाल पर संदेह करके. कहीं न कहीं मुलायम से भी चूक तो हुई ही है.

पार्टी में मुलायम के समकक्ष नेताओं के तौर पर बचे हुए हैं तो वो हैं बेनी प्रसाद वर्मा. बेनी बाबू के साथ एक ही दिक्कत है कि वो कई घाट का पानी चुके हैं.

समाजवादी से कांग्रेसी और फिर समाजवादी बने बेनी प्रसाद वर्मा की वैचारिक धार बिल्कुल कुंद हो चुकी है, नहीं तो वो नेताजी (मुलायम सिंह) को इस विवाद में सकारात्मक सलाह देते, लेकिन उन्हें तो बेटे के लिए टिकट का जुगाड़ करना था. लिहाजा उन्होंने वो ही कहा, किया जो अमर सिंह और शिवपाल कहलवाना और करवाना चाहते थे.

अब बात अमर सिंह की, वो शुरू से पक्के घाघ नेता माने जाते हैं. दूसरे उनका कोई राजनीतिक धरातल नहीं है. हमेशा राज्यसभा के जरिए नेता बने रहे हैं. उस पर आजम खान के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा और अखिलेश की नापसंदगी. ये और बात है कि अमर सिंह कहते हैं कि अखिलेश की शादी नेताजी के न चाहते हुए, उन्होंने ही करवाई.

पूरे घटनाक्रम को देखते हुए लगता है कि वो इस बार सपा में आये ही थे कि पार्टी में कोहराम मचाकर शिवपाल का कद बढ़वा देंगे और आजम खान से अपना बदला साध लेंगे. आजम खान हमेशा ही सार्वजनिक तौर पर अमर सिंह को 'दल्ला' कह कर संबोधित करते हैं.

मुलायम सिंह ने अमर सिंह की जब सपा में वापसी कराई और उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाने के साथ राज्यसभा भेजा तो उसी समय दिल्ली के एक पंचतारा होटल में एक टीवी चैनल के मालिक और वर्तमान राज्यसभा के सांसद के साथ बैठक की.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को खबर मिली कि इस बैठक में उनकी सरकार को गिराने और समाजवादी पार्टी को बर्बाद करने की साजिश रची गई. अखिलेश का आरोप था कि अमर सिंह परोक्ष तौर पर भाजपा के मिलकर सपा को कमजोर करने में लगे हुए थे.

अखिलेश ने कहा कि अमर सिंह, जिस भी परिवार के दोस्त बने, उस परिवार में बंटवारा करवाके अपनी रोटी सेंकते हैं. 

वहीं अखिलेश के आरोप पर उनके पिता मुलायम सिंह ने खुब फटकार लगाई और कहा, "अमर सिंह मेरे लिए भाई जैसे हैं, आप उन्हें दलाल कह रहे हैं. आप नहीं जानते अमर सिंह के बारे में, अमर सिंह ने मुझे जेल जाने से बचाया. जब तक मैं हूं, अमर सिंह मेरे साथ रहेंगे. आप मांफी मागिये उनसे.

इसके अलावा मुलायम सिंह को लगा कि रामगोपाल उनके खिलाफ अखिलेश को भड़का रहे हैं. रामगोपाल की त्रासदी ये है कि उन्हें इस बात का आभास हो रहा था कि शिवपाल और अमर, मुलायम सिंह के हर निर्णय को प्रभावित कर रहे हैं.

वहीं शिवपाल को भी लग रहा था कि सपा के प्रोफेसर साब (रामगोपाल यादव) उनका खेल बिगाड़ देंगे. उन्होंने नेताजी से कहना शुरू किया कि साधुसिंह के मामले में नाम आने के बाद से प्रोफेसर बीजेपी के लिए डमी के तौर पर काम कर रहे हैं. वो पार्टी के लिए बड़ा खतरा हैं.

रामगोपाल यादव ने बिहार चुनाव में महागठबंधन में शामिल होने का विरोध किया था और उसके बाद वो अंसारी बंधुओं की कौमी एकता दल के भी समा में विलय के खिलाफ थे. सो वो शिवपाल की नजर में कांटे की तरह खटक रहे थे.

मुलायम से रामगोपाल की शिकायत करके शिवपाल ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन मुलायम को अखिलेश के विरोध के कारण उस फैसले को पलटना पड़ा.

आखिरकार सपा की लड़ाई उस हद तक पहुंच गई, जहां आज मुलायम को अपनी ही पार्टी में अपनी ही गद्दी से हाथ धोना पड़ा है. वहीं अमर सिंह चाय में गिरे मक्खी सरीखे होकर पार्टी से बाहर फेंके जा चुके हैं और शिवपाल की गाड़ी को शंटिग में डाल दिया गया है.

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू है कि कलयुग की इस सियासत में आज एक पुत्र ने अपने पिता को आजीवन बनवास की ओर धकेल दिया है, जबकि उस पिता ने कई बार ये इच्छा जाहिर की, कि उसे जब भी मौका मिले, इस हिंदुस्तान के तख्त पर बैठना है. आज उसी पिता को उसके पुत्र ने अपनी गद्दी की खातिर पार्टी की गद्दी से उतार कर सारी उम्मीदों पर कुहासे की चादर डाल दी है.

मुलायम के साथी और गीतकार कवि नीरज ने एक कविता लिखी है, जो आज मुलायम सिंह पर पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है...

नीरज की कविता

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे.

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पांव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई

पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई, चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए, साथ के सभी दिऐ धुआं पहन पहन गए

और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके, उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे.

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे.

हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर, वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर

और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे, ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे.

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे...

First published: 1 January 2017, 14:18 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी