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साधु-संतों का सम्मान...क्या वोट मिलेगा श्रीमान?

राजकुमार सोनी | Updated on: 20 June 2017, 9:57 IST
फोटो- राजकुमार सोनी

संतों का सम्मान तो अच्छी परम्परा है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले जब राजनीतिज्ञ संतों को याद करें और भोजन का न्यौता दें, तो जाहिर सी बात है कि 'भोजन और मुलाकात' के निहितार्थ तलाशे ही जाएंगे. अभी हाल के दिनों में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह छत्तीसगढ़ के दौरे पर पहुंचे और उन्होंने अलग-अलग समाज के अगुवा माने जाने वाले संतों के साथ भोजन ग्रहण किया तो राजनीतिक गलियारों में ज़ोरदार हलचल मची. इस हलचल की एक बड़ी वजह यह भी थी कि शाह से मुलाक़ात करने वालों में सतनामी समाज के एक प्रमुख गुरु बालदास भी थे, जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में सामान्य सीटों पर कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों को मैदान में उतारकर कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने में अहम भूमिका निभाई थी.

 

फाइल फोटो

हिन्दुत्व वोटों पर नज़र?

छत्तीसगढ़ की 90 सीटों में 51 सीटें सामान्य हैं, जबकि 29 सीटें अनुसूचित जनजाति और 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. फिलहाल सामान्य सीटों पर जीत का परचम फहराने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को साधुओं के शिष्टमंडल या संतों को रिझाने की ज़रूरत नहीं पड़ी है. इस वर्ग के वोट बैंक पर कब्जे के लिए ख़ास तरह के सभा-सम्मेलनों का आयोजन भी नहीं के बराबर होता रहा है.

प्रदेश में जब जोगी की सरकार थी, तब उनके निवास में पिछड़े वर्ग से जुड़ी 36 जातियों के प्रमुख भोज पर आमंत्रित किए जाते थे और इस समाज के सभा-सम्मेलनों के जरिए राजनीतिक भागीदारी की बातें भी खूब हुआ करती थीं. अब जबकि भाजपा काबिज है, तो भी स्थिति में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं आया है. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को बस्तर और सरगुजा जैसे इलाक़ों में अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिल पाई थी सो गांव-देहातों में जातिगत सभा-सम्मेलनों का सिलसिला चल पड़ा है, जबकि साधु-संतों से संवाद के ज़रिए यह बताने की कवायद चल रही है कि पार्टी धर्म-कर्म में आस्था रखने वाले लोगों के साथ-साथ हिन्दुत्व वोटों के ध्रुवीकरण के पक्ष में है.

अमित शाह ने जिन संतों के साथ भोजन ग्रहण किया, उनमें कबीर पंथ के गुरु प्रकाश मुनि साहेब, सिंधी समाज के धर्म गुरु युधिष्ठिर महाराज, गहिरा गुरु आश्रम जशपुर के बभ्रुबाहन, गुमरगुंडा आश्रम दंतेवाड़ा के विशुद्धानंद, विवेकानंद आश्रम नारायणपुर के स्वामी व्याप्तानंद, स्वामी सत्य स्वरूपानंद, भारत सेवा संघ के शिव रूपानंद, प्रजापति ब्रह्माकुमारी रायपुर की बहन कमला, चकरभाठा बिलासपुर के साईंलाल जी दास प्रमुख थे. गौर करने वाले बात यह थी कि शाह के साथ भोज में मुस्लिम समाज का एक भी धर्मगुरु शामिल नहीं था. हालांकि इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि मुस्लिम धर्मगुरु रोज़े से हैं.

 

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वोट का गणित

राजनीति के जानकार संतों से अमित शाह की मुलाक़ात को वोटों के गुणा-भाग से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन जानकारों की यह भी राय है कि छत्तीसगढ़ में सर्वधर्म समभाव कायम है, इसलिए किसी एक पार्टी के लिए फतवेबाजी कारगर नहीं होती है. शाह से मुलाक़ात करने वालों में सिंधी समाज के धर्म गुरु युधिष्ठिर महाराज भी थे. उन्हें नजदीक से जानने-समझने वाले सिंधी समाज के एक प्रमुख नेता रमेश वल्यानी कहते हैं, "प्रदेश में व्यापार के विकास में सिंधियों की अहम भूमिका है, लेकिन इस समाज के लोग किसी भी एक पार्टी की विचारधारा के साथ नहीं हैं."

सतनामी समाज के एक प्रमुख नेता और पूर्व विधायक शिव डहरिया की राय भी कमोबेश ऐसी ही है. उनका कहना है, "किसी भी समाज में अब कोई एक प्रमुख गुरु या संत नहीं है. छत्तीसगढ़ में अगर बाबा गुरुघासीदास जी का प्रभाव है तो उनके परिवार से ही 100 से ज़्यादा गुरु हैं. हर गुरु का अपना महत्व है. यदि भाजपा की यह सोच है कि वह साधु-संतों के सम्मान के ज़रिए ख़ास समाज के वोटों पर कब्जा जमा लेगी, तो यह बड़ी भूल होगी. जनता सरकार की जनविरोधी नीतियों से आहत है और इसका खामियाजा सरकार को भुगतना ही होगा."

बहरहाल भोज में शामिल ज़्यादातर संतों ने सम्मान के लिए अमित शाह को धन्यवाद दिया, लेकिन कबीरपंथ के एक प्रमुख गुरु प्रकाशमुनि साहेब ने भोजन के निमंत्रण का कारण पूछ डाला. शाह ने भी सधा हुआ जवाब दिया कि वे धार्मिक हैं और धर्म गुरुओं का सम्मान करते हैं. संतों के सत्संग से आनंद मिलता है.

First published: 20 June 2017, 9:57 IST
 
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