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जब वाजपेयी ने कहा नेहरू बेस्ट डेमोक्रेट, शास्त्री कमज़ोर नेता

सुधाकर सिंह | Updated on: 10 February 2017, 1:38 IST

पंडित जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी. यह दो नाम ऐसे हैं जिनको आज़ाद भारत के सबसे बड़े स्टेट्समैन के रूप में गिना जाता है. दो ऐसे नेता जिनके बिना आज़ाद भारत की सियासत की कल्पना नामुमकिन है. नेहरू ही थे जिन्होंने काफी पहले अटल की प्रतिभा को पहचाते हुए कहा था कि यह युवक एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा. 

हाल ही में संसद का शीतकालीन सत्र नोटबंदी के मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया. दोनों नेताओं से जुड़े कुछ ऐसे रोचक प्रसंग हैं, जिनसे आज की राजनीति को सीख लेने की जरूरत है. यह समझने की जरूरत है कि परस्पर विरोधी विचार के साथ भी कैसे आम सहमति से सियासत को आगे बढ़ाया जा सकता है. 

हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन पर एक किताब लिखी है. 'हार नहीं मानूंगा: एक अटल जीवन गाथा' नाम की इस किताब में इन दोनों नेताओं से जुड़े रोचक प्रसंग साझा किए गए हैं. एक नजर अटलजी और पंडित नेहरू से जुड़े कुछ दिलचस्प प्रसंगों पर:

'नेहरू से बड़ा डेमोक्रेट देखा नहीं'

इमरजेंसी के तुरंत बाद जेल से निकल वाजपेयी स्वास्थ्य लाभ लेने हेतु एम्स दिल्ली में भर्ती हुए. एम्स में वाजपेयी और डीपी त्रिपाठी के कमरे आसपास ही थे. 

देवीप्रसाद त्रिपाठी उस वक्त के वार्तालाप को याद कर बताते हैं कि एक शाम वाजपेयी ने कहा कि "नेहरू से बड़ा डेमोक्रेट मैंने देखा नहीं." उसी दौरान वाजपेयी ने शास्त्री का मूल्यांकन करते हुए कहा कि शास्त्री ईमानदार और कर्मठ थे लेकिन कमजोर नेता थे. वाजपेयी के मुताबिक शास्त्रीजी की न तो पार्टी पर पकड़ थी और न ही पार्टी के बाहर, न संसद में न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर.

फाइल फोटो

नेहरू ने विपक्ष की इच्छा पर मथाई को हटाया

17 अगस्त 1994 को अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान दिया गया. वाजपेयी ने इस अवसर पर दिए गए अपने भाषण में नेहरू के एक भाषण का जिक्र किया था. उसमें नेहरू ने संसद में विपक्ष की मांग पर अपने सहायक एमओ मथाई को हटा दिया था, जबकि नेहरू मानते थे कि यह इमप्रोप्राइटी का मामला है. तब नेहरू ने कहा था ,"जब सदन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह महसूस करता हो कि कुछ न कुछ किया ही जाना चाहिए तब बहुमत के लिए यह कतई उचित नहीं है कि सदन की इच्छा को दरकिनार कर दिया जाए."

नेहरू की 16 फीट ऊंची प्रतिमा का किस्सा

किस्सा 1993 का है. शिवराज पाटिल लोकसभा अध्यक्ष थे. पाटिल ने लोकसभा में गांधी और नेहरू की प्रतिमा लगाने का फैसला लिया. नेहरू की प्रतिमा के लिए संसद भवन के गेट नं 1 के अंदर वाले चौक पर स्थान तय हुआ. 

नेहरू की सोलह फीट ऊंची प्रतिमा पहले एयरपोर्ट के लिए बनाई गई थी, लेकिन बाद में उसे ही संसद भवन में लगाने का फैसला हुआ. इस प्रतिमा में  नेहरू नीचे की ओर देख रहे थे. वाजपेयी चाहते थे कि प्रतिमा को ऊंचे स्टैंड पर लगाया जाए ताकि देखने वाले को ऐसा लगे जैसे कि नेहरू उसे ही देख रहे हैं. 

हालांकि आखिरकार तय यही हुआ कि प्रतिमा को नीचे ही रखा जाए. नेहरू के प्रति वाजपेयी का सम्मान ताउम्र बना रहा.

'पंडित जी तस्वीर उलटी न देखें'

नेहरू भी वाजपेयी की हिंदी से काफ़ी प्रभावित थे. वह उनके सवालों के जवाब संसद में हिंदी में दिया करते थे. विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा. एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा ,"मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं. वह शीर्षासन करे मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी न देखें." इतना सुनना था कि नेहरू जी भी ठहाका मार कर हंस पड़े.

जनसंघ के भीतर भी लोग कहा करते थे कि वरिष्ठ नेता बलराज मधोक, सरदार पटेल की लाइन पर चलते हैं और वाजपेयी , नेहरू की लाइन पर. इसको लेकर भी संघ में नाराजगी रहती थी,लेकिन वाजपेयी हमेशा नेहरू की रीति और नीति पर चलते रहे. 

फ़ाइल फोटो

'लीडर चला गया, सूर्यास्त हो गया'

मई1964 में नेहरू के निधन के बाद वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दी, उसे भी अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जा सकता है. वाजपेयी ने कहा, "एक सपना अधूरा रह गया, एक गीत मौन हो गया और एक लौ बुझ गई. दुनिया भर को भूख और भय से मुक्त कराने का सपना, गुलाब की खुशबू और गीता के ज्ञान से भरा गीत,और रास्ता दिखाने वाली लौ कुछ भी नहीं रहा."

वाजपेयी ने आगे कहा, "यह एक परिवार,समाज या पार्टी का नुकसान भर नहीं है. भारत माता शोक में है क्योंकि उसका सबसे प्रिय राजकुमार सो गया. मानवता शोक में है क्योंकि उसे पूजने वाला चला गया. दुनिया के मंच का मुख्य कलाकार अपना आखिरी एक्ट पूरा करके चला गया. उसकी जगह कोई नहीं ले सकता."

वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा, "लीडर चला गया है, लेकिन उसे मानने वाले अभी हैं. सूर्यास्त हो गया है, लेकिन तारों की छाया में हम रास्ता ढूंढ़ लेंगे. यह इम्तिहान की घड़ी है लेकिन उनको असली श्रद्धांजलि भारत को मजबूत बना कर ही दी जा सकती है.

साभार: 'हार नहीं मानूंगा: एक अटल जीवन गाथा'

लेखक: विजय त्रिवेदी

प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स

First published: 24 December 2016, 5:23 IST
 
सुधाकर सिंह @sudhakarsingh10

कैच हिंदी, अवध के बलरामपुर से ज़िंदगी के सफ़र की शुरुआत. पत्रकारिता की यात्रा दिल्ली में जारी.

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