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तीन तलाक़ पर मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने के मोदी के बयान के मायने

सुधाकर सिंह | Updated on: 17 April 2017, 11:11 IST
(ट्विटर)

पिछले साल जब उत्तर प्रदेश चुनाव का एलान भी नहीं हुआ था, उस वक्त 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड के महोबा ज़िले में भाजपा की एक रैली में सवाल पूछा था कि क्या टेलीफ़ोन पर तीन तलाक़ देकर हमारी मुस्लिम बेटियों और महिलाओं की ज़िंदगी आगे चलेगी.

तकरीबन छह महीने बीत चुके हैं और यूपी में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिशन-2019 मोड में आ गए हैं. इसकी सबसे बड़ी नज़ीर भुवनेश्वर में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन नज़र आई, जब पीएम मोदी ने तीन तलाक़ पर सीधी चोट पहुंचाते हुए मुस्लिम महिलाओं के हक़ की बात की.  

तीन तलाक़ पर मोदी की सीधी चोट

वैसे तो मोदी सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में ही तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट को हलफ़नामा सौंपते हुए अपना रुख़ साफ़ कर दिया था. हलफ़नामे में कहा गया है कि भारतीय मुस्लिम समाज में चल रही तीन तलाक़ की व्यवस्था महिला अधिकारों के खिलाफ है और यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण है लिहाजा इसे ख़त्म किया जाना चाहिए.  

ख़ास बात ये है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भुवनेश्वर में भाजपा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने की बात कर रहे थे, उसी दिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक़ के मुद्दे पर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलान किया कि पांच करोड़ से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत के साथ रहने पर अपनी मंजूरी दी है.

शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक तरीके से तीन तलाक पर सीधा वार करते हुए पर्सनल लॉ बोर्ड के दावे को कठघरे में खड़ा कर दिया. तीन तलाक़ का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, "जब हम सामाजिक न्याय की बात करते हैं तो हमारी मुस्लिम बहनों को भी न्याय मिलना चाहिए. हम उन्हें कष्ट झेलते नहीं देख सकते हैं. इस तरह की चीजें सामाजिक जागरूकता के जरिए खत्म की जा सकती हैं." 

संघर्ष नहीं समाधान पर ज़ोर

पीएम मोदी ने इस दौरान कहा, "हम तीन तलाक़ की वैधता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन तीन तलाक से मुस्लिम बहनों को दिक्कत हो रही है और केंद्र सरकार इस मुद्दे का जल्द हल चाहती है. हमें समाज में संघर्ष की इजाजत नहीं देनी चाहिए. हम इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज में कोई संघर्ष नहीं चाहते है. हमें इन बुरी प्रथाओं को सामाजिक जागरूकता से खत्म करने की ज़रूरत है." 

ज़ाहिर है 2019 लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन तलाक़ को अपने एजेंडे में ऊपर रख रहे हैं. भुवनेश्वर में उन्होंने ये भी कहा कि हमें ज़िला स्तर पर इसका समाधान करने के लिए काम करना चाहिए. 

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच में 11 मई से सुनवाई होनी है. (कैच)

भाजपा तीन तलाक़ के मुद्दे पर लगातार मुखर है. यूपी चुनाव में भी ये अहम मुद्दा बना रहा. हालांकि ऐसे कोई साफ़ संकेत नहीं मिले हैं कि यूपी में मुस्लिम महिलाओं का वोट भाजपा को मिला फिर भी भाजपा इस मसले पर लगातार बयान देते हुए उन मुस्लिम महिलाओं के मर्म पर चोट पहुंचाने की फ़िराक में है, जो कहीं न कहीं ख़ुद को तीन तलाक़ की सामाजिक व्यवस्था का शिकार मानती हैं.

इलाहाबाद पश्चिम से चुनाव जीत चुके और वर्तमान में यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह का एक बयान काबिल-ए-गौर है. चुनाव के बाद अपनी सीट पर कम मतदान को लेकर उन्होंने कहा था कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि बहुत सी मुस्लिम महिलाओं को उनके घर में वोट डालने से इस वजह से रोका गया, क्योंकि पुरुष सदस्यों को अंदेशा था कि तीन तलाक़ को लेकर कहीं वे भाजपा को वोट न दे बैठें.  

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके जनता दरबार में भी लगातार दर्जनों मुस्लिम महिलाएं पहुंच रही हैं. तीन तलाक़ को लेकर कई मुस्लिम महिलाओं ने न्याय की गुहार लगाई है.

एजेंसी

योगी दरबार में तीन तलाक के मामले

कानपुर की महिला आलिया सिद्दीकी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ को लिखा है कि उसके पति बिजनौर में एक सरकारी अफसर हैं. वह यहां सहायक श्रम आयुक्त के पद पर हैं, उन्होंने दो शादियां कर रखी हैं और अब उसे स्पीड पोस्ट से तलाक दे दिया है कृपया मदद करें.

बांदा की आशिया ने योगी सरकार से इस मसले पर इंसाफ़ दिलाने की अपील करते हुए लिखा कि उसका पति से झगड़ा हो गया था और उसने सोचा कि दो-चार दिन में सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उसे तो फोन पर ही तलाक दे दिया गया.

सहारनपुर के थाना नानौता की शगुफ्ता ने प्रधामनंत्री और सीएम को खत में लिखा कि उसका निकाह पांच साल पहले गंगोह के बुड्ढाखेड़ा निवासी शमशाद के साथ हुआ था. दो बेटियों के पैदा होने से ससुराल के लोग नाराज हो गए. तीसरी बार गर्भवती होने पर शगुफ्ता का घर वालों ने गर्भपात कराना चाहा. मना करने पर मारपीट करके उसे घर से निकाल दिया गया और पति ने तलाक दे दिया.

मुरादनगर की एक महिला ने थाने में तीन बार तलाक बोलकर अपने पति को तलाक दे दिया. इस पर पति ने शरीयत का हवाला देते हुए तलाक नामंजूर कर दिया और धर्मगुरुओं से सलाह लेने को कहा. महिला का आरोप है कि उसका पति नशे में रोज उसको बुरी तरह पीटता था, इसलिए वह उससे छुटकारा पाना चाहती है.

कैच

11 मई से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

जाहिर है तीन तलाक का मसला 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी और भाजपा के एजेंडे में ऊपर है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले को पांच सदस्यों की संवैधानिक बेंच को सौंपा है, जहां 11 मई से सुनवाई होनी है. चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर यह तक कह चुके हैं कि इसकी सुनवाई के लिए अदालत शनिवार और रविवार को भी काम करने को तैयार है और अगर सरकार सहयोग करे, तो गर्मी की छुट्टियों में भी मामले की सुनवाई की जा सकती है. 

तीन तलाक़ के मुद्दे पर देशभर में छिड़ी बहस का असर तो दिख रहा है. रविवार को एआईएमपीएलबी ने इसका ग़लत इस्तेमाल करने वालों को सख्त संदेश देते हुए कहा, "शरीयत की जायज वजह के बजाए जो भी तीन तलाक देता है उसका मुस्लिम समाज को बहिष्कार करना चाहिए. जिससे ऐसे मामले भविष्य में सामने न आ सकें." 

लखनऊ में दारुल उलूम नदवातुल उलम की दो दिवसीय बैठक के बाद मुसलमानों के पर्सनल लॉ की सर्वोच्च संस्था एआईएमपीएलबी ने हालांकि यह भी जोड़ा कि देश में मुस्लिम पर्सनल लॉ को लागू कराने के लिए उसका सर्वाधिकार सुरक्षित है. ज़ाहिर है मोदी का भुवनेश्वर में तीन तलाक़ पर बयान और पर्सनल लॉ बोर्ड का एलान आने वाले दिनों में 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बड़ी लकीर खींचने के संकेत दे रहा है.

First published: 17 April 2017, 11:01 IST
 
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