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सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, CBI को लगा झटका

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 January 2018, 10:55 IST

सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले को खारिज कर दिया. बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में मीडिया रिपोर्टिंग पर लगे बैन को हटा दिया. सीबीआई अदालत ने 29 नवंबर 2017 को अपने एक आदेश में मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी थी.

सेशन ने कोर्ट के फैसले को मुंबई के 9 पत्रकारों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. बॉम्बे हाईकोर्ट की न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे का फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है. क्योंकि गाहे-बगाहे कोई ना कोई दलील देकर कभी अभियुक्त तो कभी अभियोजन पक्ष मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी लाने की कोशिश करते रहते हैं. ऐसे में ये फैसला अब नज़ीर साबित होगा.

29 नवंबर की सुनवाई में सीबीआई इस केस के पहले गवाह को पेश करने वाली थी, तभी यह बैन लगाया गया था. मीडिया रिपोर्टिंग पर लगे बैन को हटाने के लिए 9 पत्रकारों और बृहनमुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की थी.

रिपोर्टिंग पर बैन की अपील सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस के एक आरोपी पुलिसकर्मी अब्दुल रहमान ने की थी. इस पुलिसकर्मी और दूसरे आरोपियों के वकील ने पत्रकारों के बैन हटाने की अपील का विरोध भी किया. बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि बचाव पक्ष ऐसा कोई कानून बताने में असफल रहा, जिसके तहत निचली कोर्ट ने यह बैन लगाया था.

हाई कोर्ट ने पत्रकारों के वकील के इस तर्क से सहमति जताई कि मीडिया रिपोर्टिंग पर बैन लगाना निचली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. वकीलों का कहना था कि इस तरह का बैन हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही लगा सकते हैं. हाई कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि इस मामले की सुनवाई कर रहे जज इस केस की संवेदनशीलता से प्रभावित हो गए थे और उन्होंने अनचाही आशंका से ग्रस्त होकर मीडिया रिपोर्टिंग पर बैन लगा था.

मीडिया की रिपोर्टिंग पर पाबंदी को चुनौती देने वाले 9 पत्रकारों में एनडीटीवी इंडिया के एसोसिएट एडिटर सुनील सिंह, मुंबई मिरर के सुनील बघेल, शरमीन इंदौरवाला, फ्री प्रेस जर्नल की नीता कोल्हटकर, आज तक की विद्या कुमार, इंडियन एक्सप्रेस से सदफ मोडक और टाइम्स ऑफ इंडिया से रिबेका समेरवेल और अन्य शामिल थे.

हाई कोर्ट ने कहा है कि जबकि अदालत को यह देखना चाहिए था कि इस आशंका की वजह क्या थी. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि आरोपी स्पष्ट रूप से यह बताने में असमर्थ रहे कि रिपोर्टिंग से वकीलों, गवाहों या कोर्ट में मौजूद लोगों की जान को क्या खतरा था.

हाई कोर्ट ने कहा कि लोगों को यह जानने का हक है कि अदालतों में क्या चल रहा है. अदालत का कहना था कि संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार में मीडिया के अधिकार भी शामिल हैं और एक ओपन ट्रायल की रिपोर्टिंग के जरिए मीडिया न केवल अपने अधिकार का उपभोग करता है, बल्कि व्यापक जनहित में इसे लोगों तक भी पहुंचाता है.

अदालत ने यह टिप्पणी भी कि है कि अगर अभियोजन पक्ष को लगता है कि गवाहों की पहचान छिपानी है तो वह निचली अदालत से इस संबंध में आदेश जारी करने की मांग कर सकता है. हालांकि इसके साथ ही अदालत ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई में जनहित के साथ ही गवाहों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए.

First published: 25 January 2018, 10:55 IST
 
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