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रक्षा मंत्री पर्रिकर और भाजपा पर हावी होते कैप्टन अमरिंदर सिंह

राजीव खन्ना | Updated on: 8 November 2016, 7:26 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • एक तरफ रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर भाजपा के हाइपर-राष्ट्रवादी समर्थकों और पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ाने वाले विचारों के नाते एक ख़ास किस्म के लोगों के चहेते बने हुए हैं. 
  • दूसरी तरफ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने रक्षा सम्बंधी मुद्दों पर पर्रिकर को घेरने की कमान संभाल रखी है.

पिछले कुछ महीनों से अमरिन्दर अपने पूर्व सैनिक होने के रुतबे का इस्तेमाल भाजपा के ख़िलाफ़ जमकर कर रहे हैं. उन्होंने नियंत्रण रेखा पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर कथित युद्धोन्माद पैदा करने और उसका राजनीतिकरण करने के लिए मोदी सरकार को घेरा है. वह बार-बार सेना के अधिकारियों के मुद्दों पर भी सरकार को निशाने पर ले रहे हैं.

अमरिन्दर देश के सीमावर्ती जिले अमृतसर से लोकसभा सदस्य हैं. रक्षा मामलों की जानकारी होने के नाते तमाम मुद्दों पर उनके आक्रामक रवैये ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर के कांग्रेसी नेताओं की कतार में ला खड़ा किया है. माना जा रहा है कि चुनाव वाले राज्यों पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, जहां बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों के परिवार हैं, वहां भाजपा को चुनावी फायदा उठाने से बेदख़ल करने के लिए कांग्रेस को एक नेता मिल गया है.

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पंजाब के सीमाई गांवों को खाली कराए जाने और वन रैंक वन पेंशन योजना पर भी कैप्टन सरकार को सफलतापूर्वक घेरने में कामयाब हुए हैं. सिखों के इतिहास पर किताब लिखने के अलावा उन्होंने भारतीय सेना और युद्धों पर लेखन किया है.

साल 2014 में उनकी किताब 'ऑनर एंड फिडेलिटीः इंडियाज मिलिट्री कन्ट्रीब्यूशन टू दि ग्रेट वार' आई है. इसके अलावा उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध पर 'दि मानसून वारः यंग ऑफीसर्स' भी लिखी है. इसमें 1965 के भारत-पाक युद्ध का उनका संस्मरण है. सेना मामलों में गहरी समझ के नाते वह ऐसी स्थिति में हैं कि मोदी सरकार के निर्णयों को चुनौती देने में सक्षम हैं.

पर्रिकर पर निशाना

कैप्टन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पर्रिकर को हटाने की मांग कर चुके हैं. उन्होंने कहा है कि पर्रिकर रक्षा मंत्रालय जैसे अहम विभाग के लायक नहीं है और उनकी फौरन विदाई कर देनी चाहिए. उन्होंने रक्षा मंत्री को बौद्धिक रूप से दिवालिया और बेकार जोकर की संज्ञा देते हुए कहा कि सैन्य और असैन्य अधिकारियों के वेतनमानों में कथित भेदभाव के कारण रक्षा सेनाओं में बड़ी नाराजगी है. मंत्रालय का अपने आदेशों पर कायम रहने का फैसला देश की रक्षा सेनाओं के लिए बड़ा झटका है.

उन्होंने कहा कि वह सशस्त्र बलों के साथ दोहरा खेल खेल रहे हैं और इस बात का आकलन किए बिना कि देश की

सुरक्षा और एकता पर इसका क्या असर पडेगा, भारतीय सेना का मनोबल घटा रहे हैं. वह इतने दिमागहीन हो गए हैं कि देख ही नहीं सकते हैं कि सशस्त्र बलों के साथ वह क्या कर रहे हैं. उन्हें रक्षा मंत्री जैसे संवेदनशील पर रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

मूकदर्शकों पर सवाल

अमरिन्दर ने इस बात पर भी दुख जताया है कि संसद में भाजपा के तीन सांसद भारतीय सेना से आए हुए हैं. इनमें पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, कर्नल राज्यवर्द्धन सिंह राठौर (दोनों मंत्री हैं) और कर्नल सोनाराम. ये लोग इस अन्याय पर मूकदर्शक बने हुए हैं.

अमरिन्दर ने वीके सिंह पर निशाना साधते हुए कहा है कि वह भारतीय सेना के प्रमुख रहे हैं. उनकी निष्ठा निश्चित रूप से सेना के साथ होनी चाहिए. लेकिन लगता है कि सांसद और मंत्री बन जाने के बाद वह अपने राजनीतिक आकाओं को इस बारे में समझा नहीं पा रहे हैं और इस राष्ट्रविरोधी और असंगत निर्णय के खिलाफ बोलते रहते हैं.

उन्होंने कहा कि एक ओर तो सरकार पाकिस्तान को सीमा पर मुहंतोड़ जवाब देने और सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर सेना को गौरवान्वित करती है तो दूसरी ओर रक्षा मंत्रालय व्यवस्थित तरीके से सेना का नैतिक बल क्षीण करती है.

सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिकरण कर रही है. वह सेना का मनोबल नष्ट कर रही है-कैप्टन

सिंह ने कहा है कि निदेशक रैंक के असैन्य अधिकारी को ब्रिगेडियर के समकक्ष ला दिया गया है. एक कर्नल जो अब तक निदेशक के समकक्ष हुआ करता था, अब उसका रैंक घटाकर उसे संयुक्त निदेशक के बराबर कर दिया गया है. उन्होंने कहा कि जब मैं सेना में था, उस समय कम्पनी कमांडर की हैसियत से असैन्य नागरिक अधिकारियों जैसे कि उपायुक्तों और पुलिस प्रमुखों को विभिन्न मुद्दों पर लिखा करता था. उनसे समुचित जवाब भी मिलता था.

उन्होंने कहा कि अगर सरकार नौकरशाहों को कुछ देना चाहती है तो वह अन्य रास्ते भी निकाल सकती है. बजाए सशस्त्र बलों को नीचा दिखाने और उनके मनोबल को गिराने के. उन्होंने मोदी को चेतावनी दी है कि अगर वेतनमानों, नई रैंकिंग में विसंगति वापस नहीं ली गई तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे और मोदी हालात को पटरी पर लाने में समर्थ नहीं हो सकेंगे.

सीमाओं को वार जोन में बदलना

अमरिन्दर सिंह ने देश की सीमाओं को 'वार जोन' में बदलने पर भी मोदी सरकार को आड़े हाथों लया है. उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के उस लम्बे-चौड़े दावे को खारिज कर दिया कि देश की सीमाएं आज ज्यादा सुरक्षित हैं बनस्पत पहले के. उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह अपमान है.

अमरिन्दर का इन मुद्दों पर रुख अच्छी तरह से पूर्व सैनिकों के साथ है

अमरिन्दर ने शाह को याद दिलाया है कि सीमा क्षेत्र का विषय उठाना अनुचित और अकारण ही है. पूरी नियंत्रण रेखा पर हर दिन कुछ न कुछ होता रहता है. दोनों तरफ से सैनिक और नागरिक मारे जाते हैं या घायल होते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पूरा आंतरिक जम्मू सीमा क्षेत्र वार जोन हो गया है. इसके लिए मोदी सरकार की कमजोर रक्षा नीतियों और विचारहीनता को धन्यवाद. 

सभी तरह के राजनीतिक लाभ

उन्होंने इस बात की वकालत करते हुए कहा कि नई दिल्ली को देश की सुरक्षा और अपने नागरिकों की रक्षा की खातिर इस्लामाबाद के साथ राजनयिक रूप से सीमा विवाद सुलझाए और शांति बहाली किए जाने की जरूरत है. सीमावर्ती गांव के लोग बम हमलों से पीड़ित हैं और हिंसा का सामना कर रहे हैं. मोदी सरकार पीड़ितों की मदद करने, उन्हें संरक्षित और सुरक्षित करने में विफल रही है.

वह इस बात के पक्षधर हैं कि नई दिल्ली पाक से राजनयिकता के जरिए सीमा मुद्दे का समाधान करे.

वहीं नई दिल्ली में भिवानी के रिटायर्ड सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल की आत्महत्या करने की घटना के बाद अमरिन्दर ने ओआरओपी का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया है. कांग्रेस ने पंजाब के सभी जिलों में ओआरओपी को लेकर प्रदर्शन किया है और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह से मुलाकात की है और उन्हें ज्ञापन सौंपा है.

अमरिन्दर ने कहा कि सशस्त्र बलों के लिए ओआरओपी अंतिम सहारा है. सैनिकों की रैंक में कमी किए जाने का परिणाम आत्महत्या के रूप में सामने आया है. उनका मनोबल गिरा है. रक्षा मंत्रालय ने 7वें वेतन आयोग को लेकर जो अधिसूचना जारी की है, उससे भेदभाव सामने आया है. उन्होंने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने की मांग उठाई है. 

अमरिन्दर पूर्व सैनिकों के साथ हैं. वह कहते हैं कि पूर्व सैनिक केन्द्र सरकार के समर्थन के पात्र हैं

अमरिन्दर ने इस बात का उल्लेख किया है कि पूर्व सैनिक अपने वैधानिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. उन्हें केन्द्र सरकार के सहारे और समर्थन की जरूरत है और वे इसके पात्र भी हैं. अमरिन्दर ने यह भी कहा है कि पर्रिकर भारत के इतिहास के सबसे बदतर रक्षा मंत्री हैं और उन्होंने इसे साबित भी किया है.

विश्लेषकों का कहना है कि इन मुद्दों पर अमरिन्दर के रुख ने पूर्व सैनिकों को लुभाया है, उनको भी जो भाजपा के निष्ठावान समर्थक हैं. भाजपा कैसे आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें अपने साथ लाने में सफलता पाती है, अभी देखना बाकी है.

First published: 8 November 2016, 7:26 IST
 
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