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छत्तीसगढ़: जोगी के अंतिम पैंतरे से परास्त होगी कांग्रेस-भाजपा?

राजकुमार सोनी | Updated on: 13 June 2017, 10:57 IST
कैच न्यूज़

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मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का यह शेर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर सौ फीसदी लागू दिखाई देता है. राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले अर्जुन सिंह के इस चेले को जानने-समझने के लिए कई फ्रेम की ज़रूरत पड़ती है.

कभी मैकेनिकल इंजीनियर, कभी आईपीएस-आईएएस, कभी राज्यसभा और लोकसभा सांसद तो कभी मुख्यमंत्री की संक्षिप्त लेकिन विवादास्पद पारी खेले चुके जोगी एक दुर्घटना का शिकार होने के बाद से व्हील चेयर पर हैं, लेकिन पूरी जिजीविषा के साथ राजनीति के मैदान में डटे हुए हैं. विधायकों की खरीद-फरोख्त, अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार को मैदान से हटाने में बदनामी झेल चुके जोगी इन दिनों आरएसएस की तर्ज पर गांव-गांव में दस्तक दे रहे हैं.

जोगी का दावा है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में वे कुछ ऐसा कमाल दिखाएंगे जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी. जोगी का दावा सच होगा या ग़लत अभी इस पर कोई मुकम्मल राय कायम करना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन एक साल पहले बनी उनकी नई नवेली पार्टी जनता कांग्रेस (जे) की गतिविधियों को देखकर लगता है कि इस बार चुनावी समर में राष्ट्रीय दल कांग्रेस और भाजपा को दुविधा की तंग गलियों से गुजरना पड़ सकता है.

राजनीति के जानकारों की मानें तो छत्तीसगढ़ में एक बार फिर वर्ष 2003 जैसी स्थिति बन सकती है. जानकार कहते हैं कि अगर जोगी की पार्टी प्रदेश की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ती है, तो कांग्रेस के परंपरागत वोटों पर फर्क पड़ सकता है. वहीं प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है, "जोगी पिछले दो चुनाव में कांग्रेस में रहकर भाजपा को फायदा पहुंचाते रहे हैं. अब जबकि वे पार्टी में नहीं हैं तो जनता के बीच यह संदेश चला गया है कि जोगी ने भाजपा के लिए ही बी टीम गठित की है, लेकिन सरकार की जनविरोधी नीतियों से आजिज आ चुकी जनता इस बार विकल्प के तौर पर कांग्रेस का ही चयन करने वाली है."

शपथ पत्र के फंडे से मची खलबली

जोगी ने पिछले साल 6 जून को अपने पुत्र अमित जोगी के चुनाव क्षेत्र मरवाही के कोटमी इलाके में नई पार्टी बनाने का एलान किया था. इसके बाद 21 जून को उन्होंने मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह के गृहग्राम ठाठापुर में पार्टी के नाम की घोषणा की. जोगी का दावा है कि इस एक साल में उन्होंने धुर माओवाद प्रभावित बस्तर से लेकर सरगुजा तक 300 से ज़्यादा सभाएं ली हैं, लेकिन चप्पे-चप्पे को मंथने के लिए अब साल भर के लिए एक हेलीकॉप्टर भी किराए पर लेने का मन बना चुके हैं.

जोगी का कहना है कि उनकी पार्टी प्रदेश की जनता के लिए जो कुछ भी करना चाहेगी, उसे वे एक शपथ पत्र में देंगे. उनका दावा है कि उनकी पार्टी ने बूथ स्तर पर 10 लाख कार्यकर्ता तैयार कर लिए हैं, जो घर-घर जाकर दस्तक देंगे और यह बताएंगे कि जोगी की सरकार बनी तो जनता को क्या फायदा होगा. बहरहाल उनके शपथ पत्र के नए फंडे से कांग्रेस और भाजपा में खलबली मच गई है. जोगी कहते हैं, "अगर मैंने किसानों से वादा किया कि उन्हें धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रुपये दिया जाएगा, तो मैं इसे हर हाल में पूरा करूंगा. शपथ पत्र से मुकरने का मतलब है कि जनता मुझ पर केस दर्ज करा सकती है. झूठा शपथ पत्र देने के एवज में दो साल की सजा भी हो सकती है."

आज़ाद हूं मैं

जोगी की पार्टी बनने के बाद कांग्रेस के अलावा छोटी-बड़ी अन्य कई पार्टियों के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बिखरने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है. विधायक आरके राय और सियाराम कौशिक तो खुले तौर पर जोगी की सभाओं में हिस्सेदारी दर्ज करते दिखाई देते हैं. पूर्व विधायकों में विधान मिश्रा, धरमजीत सिंह, गुलाब सिंह, परेश बागबहरा, चैतराम साहू, अंतुराम कश्यप और दिग्गज नेता गजराज पगारिया सहित अन्य कई शामिल हैं.

एक घर और एक छत के नीचे रहने के बावजूद जोगी की पत्नी रेणु जोगी ने कांग्रेस से नाता नहीं तोड़ा है, इसलिए समय-असमय यह कयास लगाया जाता है कि देर-सबेर सोनिया या राहुल गांधी के कहने पर वे कांग्रेस में वापस आ सकते हैं, मगर जोगी इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "मैं गांधी परिवार की इज़्ज़त करता हूं, इसलिए उनके सुख और दुख में तो शरीक हो सकता हूं लेकिन अपनी राजनीतिक असहमति के चलते पार्टी में वापस लौटना असंभव है."

राजनीति के धुंरधरों का कहना है कि राजनीति में असंभव जैसा कुछ भी नहीं होता. जो जोगी विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप में कांग्रेस से निलंबित कर दिए गए थे, वही जोगी कांग्रेस में तब वापस ले लिए गए थे जब कद्दावर नेता वीसी शुक्ल ने भाजपा का दामन थाम लिया था. जोगी ने शुक्ल के खिलाफ महासमुंद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. हालांकि यह भी सच है कि लोकसभा के पिछले चुनाव में वे एक अनजान से चेहरे चंदूलाल साहू से पराजित हो गए थे.

क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़ोर

फिलहाल जोगी की पार्टी राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर बहस-मुबाहिसे से बच रही है. जोगी का कहना है कि उनकी पार्टी केवल और केवल क्षेत्रीय मुद्दों को जोर-शोर से उठाने के लिए ही बनी है. जोगी बताते हैं, "भाजपा ने किसानों को धान का 21 सौ रुपये समर्थन मूल्य देने का वादा किया था, लेकिन केंद्रीय नेताओं की मनाही के बाद मुख्यमंत्री को पीछे हटना पड़ा. उनकी पार्टी ऐसा नहीं करेगी. छत्तीसगढ़ के फैसले दिल्ली में नहीं लिए जाएंगे."

बहरहाल राजनीति के गलियारों में यह चर्चा तैर रही है कि जोगी कांग्रेस में लौटेंगे तो क्या होगा? यदि कांग्रेस में उनकी वापसी नहीं हुई और वे कुछ सीटों पर सफलता हासिल कर लेते हैं, तब क्या होगा? क्या वे कांग्रेस के साथ गठबंधन करेंगे या फिर भाजपा के साथ? अगर उनकी पार्टी सिर्फ वोटकटवा पार्टी बनकर ही रह गई, तब क्या उनका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा. जोड़-जुगाड़ और राजनीतिक तिकड़मबाजी के लिए सुर्खियों में रहने वाले जोगी के पैंतरे का सभी को इंतज़ार है.

First published: 13 June 2017, 10:55 IST
 
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