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कुमार विश्वास का कद बढ़ाने की कसरत है आप में हुआ समझौता

चारू कार्तिकेय | Updated on: 4 May 2017, 10:54 IST


ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल पार्टी के भीतर मची उथल-पुथल का समाधान करने में सफल रहे हैं. पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक बुधवार 3 मई को हुई जिसमें पार्टी के भीतर सुलह-समझौता हो गया. पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक में भाग लेने के लिए कुमार विश्वास बुधवार सुबह केजरीवाल के घर पहुंचे थे. आप में तनातनी बढ़ने की वजह यह थी कि कुमार विश्वास ने अपने ऊपर हो रहे राजनीतिक हमलों के चलते आप छोड़ने की धमकी दे दी थी.

किसी भी समझौते पर पहुंचा जा सके, इसे ध्यान में रखते हुए कि कुमार विश्वास को ज्यादा की शक्तियां दी गईं और ओखला के विधायक अमानतउल्ला खान को पार्टी से निलम्बित कर दिया गया. अमानतउल्ला खान के खिलाफ कुमार विश्वास गुस्से से भरे हुए थे. अभी यह साफ़ नहीं है कि क्या खान को कुछ वक़्त के लिए निलम्बित किया गया है या अनिश्चित काल तक के लिए. अगर यह निलम्बन अस्थायी है, तो जो भय लगातार बढ़ता जा रहा था, उसे इस समाधान की छोटी-सी कीमत चुकानी पड़ेगी.

 

हालांकि, अगर यह समाधान कुछ निष्कासन के समान है तो यह निर्णय हानिकारक हो सकता है. ऐसे में जरूरी यह होगा कि आप अपनी सभी शक्तियों को दिल्ली विधान सभा में समेट कर रखे न कि उसे खो जाने दे. जहां तक विश्वास का सवाल है तो उन्हें राजस्थान का चुनाव प्रभारी बनाया गया है. आज ऐसी स्थिति नहीं है कि वे अचानक ही पार्टी में बहुत महत्वपूर्ण और ताकतवर बन जाएं. राजस्थान में चुनाव अभी बहुत दूर हैं. इस राज्य में चुनाव वर्ष 2018 के अन्त में होने हैं.

अभी यह भी ध्यान में रखना है कि अपने गृह क्षेत्र दिल्ली में हुए हाल के चुनाव में पार्टी ने कैसा प्रदर्शन किया है. अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि पार्टी अन्य राज्यों के विधान सभा चुनाव में कितनी ताकत के साथ उतरेगी.

 

 

खुद की वैल्यू

 

इस समझौते की सार्थकता इस बात में भी निहित है कि कुमार विश्वास का यह विरोध काफी लम्बे समय से चला आ रहा था और आप को ऐसे समय ठेस पहुंच रही थी जब पार्टी को अपने घर में ही काफी सुधार करने की जरूरत है. पार्टी को दिल्ली के निकाय चुनावों में भाजपा से काफी बड़ी पराजय मिली है और उसे विधान सभा के उप चुनाव में अपने घर में ही भाजपा से शिकस्त खानी पड़ी है. पार्टी का कोष खाली है और कार्यकर्ता भी हर समय की अपेक्षा अब काफी कम हैं.

पार्टी के भीतर ऐसे किसी भी बिन्दु पर इससे बदतर और क्या स्थिति हो सकती है कि जब पार्टी का एक संस्थापक नेता सार्वजनिक तौर पर खीज निकाल रहा हो और यह अफवाह फैला रहा हो कि कम से कम 30 विधायक पार्टी छोड़कर जा रहे हैं? आप और केजरीवाल वाकई में विश्वास को संतुष्ट करना चाह रहे थे और इसका सबूत इससे बढ़कर और कुछ नहीं हो सकता कि पार्टी मुखिया मंगलवार रात खुद विश्वास के घर उनसे मिलने गए.

 

कुमार विश्वास को नाममात्र के अधिकार मिलने से यह जाहिर है कि वह पार्टी में अपनी कुछ महत्ता चाहते थे.


विश्वास को एक राज्य का प्रभारी बनाकर और खान को निलम्बित करके कुमार को थोड़ी ज्यादा तरजीह दी गई है. हालांकि, तथ्य यह है कि नाममात्र के पुरस्कार के चलते उनके संतुष्ट हो जाने से यही संकेत है कि वह सिर्फ पार्टी में अपना महत्व चाहते थे.

आप की गलतियों को लेकर किसी भी मामले में कुमार विश्वास के विचारों को काफी हद तक केजरीवाल का समर्थन था. केजरीवाल काफी दृढ़ता से उनके साथ तब भी खड़े रहे थे जब खान ने कुमार पर भाजपा का एजेण्ट होने और पार्टी को तोड़ने के षडयंत्र में शामिल होने का आरोप लगाया था. विश्वास के आप छोड़ने और भाजपा में शामिल होने की अफवाहें अकारण ही समय गंवाने वाली अटकलें साबित हुईं. कहना न होगा कि वह इतनी आसानी से आप नहीं छोड़ने वाले क्योंकि अन्य किसी भी दल में उन्हें इतना महत्व कौन देगा? और किसी भी पार्टी का कौन-सा प्रमुख उन्हें मनाने खुद चलकर उनके घर जाएगा?

 

 

कहानी का अन्त नहीं


पार्टी ने राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) की महत्वपूर्ण बैठक में शामिल अपने सभी बड़े नेताओं की एक तस्वीर जारी की. परिवार की इस तस्वीर से एक बार फिर यह संदेश दिया गया है कि पार्टी में 'ऑल इज वैल' है.

 

हालांकि, इस कहानी का सम्भवतः यही अन्त नहीं है. खान एक विधायक होने के साथ ही महत्वपूर्ण हैसियत भी हैं और उनके निलम्बन का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा. आप के प्रशंसकों के लिए आज का यह फैसला नाकामयाबी का संकेत है. लेखक और आप के उत्साही समर्थक कृष्ण प्रताप सिंह ने ट्वीटर पर घोषणा कर दी है कि वह भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने वाले हैं.

 

आप ने यह भी घोषणा की है कि वह तीन सदस्यों पंकज गुप्ता, आतिशी मरलेना और आशुतोष की एक समिति बनाएगी जो विश्वास के खिलाफ लगाए गए खान के आरोपों की जांच करेगी. इसका अर्थ यह है कि जब यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, तब यह मुद्दा एकबार फिर गरमाएगा.

इस कुल-बैर से यह भी संकेत हैं कि पार्टी के भीतर अब कम से कम दो धड़े हो गए हैं-एक विश्वास समर्थक और दूसरा एंटी विश्वास. ये दोनों धड़े फिलहाल शांत हो गए हैं लेकिन इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि यह अनबन और अलगाव निकट भविष्य में एक बार फिर नहीं दिखाई देगा.

First published: 4 May 2017, 10:54 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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