Home » राजनीति » Did the EC forget that AAP is not the first to raise questions about faulty EVMs? BJP did it in 2009
 

क्या चुनाव आयोग भूल गया कि ईवीएम गड़बड़ी की शिकायत करने वाली 'आप' पहली पार्टी नहीं है?

आशुतोष | Updated on: 6 April 2017, 9:50 IST


जब मैंने पहली बार टीवी रिपोर्टिंग का करियर शुरू किया तो मुझे पहली बीट चुनाव आयोग (ईसी) ही मिली. उन दिनों टी.एन.शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उन्हें वी.पी सिंह ने चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था लेकिन वे राजीव गांधी और कांग्रेस के साथ नजदीकियों के लिए अधिक जाने जाते थे. परन्तु जब शेषन ने चुनाव आयुक्त का पद संभाला तो वे बिल्कुल ही अलग किस्म के व्यक्ति के तौर पर उभर कर सामने आए.


उनके चुनाव आयुक्त बनने से पहले ईसी दंतविहीन और बिना रीढ़ का विभाग था, जैसे अन्य सरकारी विभाग होते हैं, जो मात्र सत्ताधारी पार्टी के ही इशारों पर काम कर रहा था. (यहां मेरा इरादा शेषन से पूर्व के चुनाव आयुक्तों का अनादर करना नहीं है.) उन दिनों चुनाव किसी दंगेबाजी से कम तो नहीं थे. बैलेट पेपरों और मतपेटियों की लूट तो आम बात थी. अक्सर हत्या जैसे अपराधों को भी अंजाम दे देते थे और चुनाव आयोग मूक दर्शक बना हुआ था.


शेषन ने एक तरह से मृतपायः चुनाव आयोग में प्राण फूंक दिए. उन्होंने राजनेताओं को अनुशासित किया. उन्हें इसके लिए धमकियां मिलीं, गालियां तक सुनने को मिली लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. शेषन ने अकेले ही चुनाव प्रक्रिया में सुधार लाने का बीड़ा उठाया और पूरे तंत्र को ही बड़ी समस्याओं से मुक्त किया. बेशक राजनेताओं और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को शेषन के काम करने का यह तरीका रास नहीं आया. एक सदस्यीय चुनाव आयोग में दो आसैर सदस्य जोड़ कर इसे बहु सदस्यीय संस्था बना दिया गया. एम.एस. गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को भी चुनाव आयुक्त बना दिया गया. परन्तु वे भी शेषन के कामकाज में दखल नहीं दे सके.

 

बात अतीत की


मेरी शेषन के साथ कई बार बात हुई लेकिन वे कोई खुशनुमा मुलाकात नहीं कही जा सकती. वे एकदम दबंग व्यक्ति थे और कई बार मुझ पर चिल्ला भी उठते थे. मुझे याद है एक बार मुझे ईसी के बाहर उनका घंटों (10 घंटे से भी ज्यादा) इंतजार करना पड़ा और जब वे आए तो उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया. मैंने उनकी कार के अंदर माइक किसा तो वे माइक को अपनी ओर खींचने लगे. इस पर मैंने माइक वापस बाहर लेने की कोशिश की क्योंकि कार स्टार्ट हो चुकी थी. मैं बड़ी ही मुश्किल से अपना माइक वापस ले सका.


उन्हें कुछ लोग सनकी तक कह देते लेकिन उनका योगदान वाकई बहुत बड़ा है. उन्होंने चुनावों के प्रति जनता के मन में विश्वास जगाया और लोकतंत्र को समृद्ध बनाया. उन्होंने यह भी कर दिखाया कि कोई भी संस्था उम्मीद की किरण बन सकती है यदि उसके प्रबंधन से जुड़े लोग थोड़े स्वाभिमानी हों.

 

शेषन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राजनेताओं और सरकारों ने अपने ‘आदमी’ बिठा कर ईसी की आवाज दबाने की कोशिश की. हर केंद्र सरकार इसके लिए साझा तौर पर जिम्मेदार है. उन सभी ने अपने सरपरस्तों की खुशी के लिए व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की लेकिन किसी ने इतनी हिमाकत नहीं की थी कि वे राजनीतिक बयान जारी करें, जैसी मौजूदा ईसी ने ईवीएम खराब होने के आप पार्टी के आरोपों का जवाब देने के लिए किया है.

 

बैलेट पेपर पर ही हों चुनाव


मैं चुनाव आयोग को भाजपा का प्रवक्ता तो नहीं कहूंगा, क्योंकि यह उच्च संवैधानिक पद है. परन्तु एक गंभीर सवाल यह उठता है कि स्वत: और निष्पक्ष चुनाव करवाना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है. इसका काम यह सुनिश्चित करना भी है कि चुनाव मैदान में सारे उम्मीदवारों को समान अवसर मिले. ईसी एक तरह से अम्पायर है, जिसे चुनाव जैसा बड़ा मैच संचालित करना होता है.


चुनाव ही लोकतंत्र का आधार हैं. यह जनता की इच्छा से मिला जनादेश है. चुनाव प्रक्रिया में लेश मात्र संदेह भी जनता का विश्वास कमजोर कराने के लिए काफी है. इसलिए ऐसे किसी भी संदेह का प्रमाण सहित तुरंत समाधान कर देना चाहिए. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बारे में संदेह जताने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी आप पहले ऐसे व्यक्ति या पार्टी नहीं हैं, जिसने ईवीएम की वैधता पर सवाल उठाए हों. आप पार्टी और केजरीवाल के राजनीति में आने से कई साल पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी यह मुद्दा उठाया था और ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से ही चुनाव करवाने का सुझाव दिया था.


संडे इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत के दौरान 5 जुलाई 2009 को आडवाणी ने कहा था-‘‘ जब तक चुनाव आयोग ईवीएम मशीनों के पूर्णतः सुरक्षित होने की गारंटी नहीं दे देता और उनकी खामियों में सुधार की बात नहीं करता तब तक हमें बैलेट पेपर या मत पत्रों पर ही चुनाव करवाने चाहिए. आडवाणी ने कहा था कि कोई भी ईवीएम मशीनों पर नियंत्रण या दुरूपयोग के बारे में सवाल नहीं उठा रहा लेकिन ईवीएम मशीनों के संभावित दुरूपयोग पर चुनाव आयोग को जवाब देना ही चाहिए.

 

सही सवाल?


भाजपा के ही एक बड़े नेता और प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने इस पर एक किताब लिखी है-‘‘लोकतंत्र खतरे में-क्या ईवीएम मशीनों पर भरोसा किया जा सकता है. उस किताब का आमुख भी आडवाणी ने ही लिखा था. जाहिर है आडवाणी और उनकी पार्टी भाजपा ईवीएम मशीनों की वैधता को लेकर आश्वस्त नहीं थे. भाजपा के सुब्रमण्यन स्वामी तो वैसे भी ईवीएम का विरोध करते आए हैं.


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 2012 में ईवीएम के पेपर ट्रायल का मामला उठाया गया. कोर्ट ने कहा, ‘‘दोनों पक्षों की ओर से पेश दस्तावेजों से संतुष्ट होने के बाद हमने पाया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए पेपर ट्रायल तो होना ही चाहिए. चुनाव व्यवस्था में पारदिर्शिता स्थापित करने और मतदाताओं में विश्वास बनाए रखने के लिए ईवीएम मशीनों में वीवीपैट (वोटर वेरिफिकेशन पेपर ऑडिट ट्रायल) होना जरूरी है, क्योंकि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के माध्यम तौर पर वोट की अत्यधिक अहमियत है.’’


2014 के लोकसभा चुनाव में कुछ क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर यह पेपर ट्रायल हुआ था और फिर इस साल संपन्न हुए पंजाब व गोवा विधानसभा चुनावों में भी यह प्रयोग किया गया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट है कि अगर सवाल लोगों के लोकतंत्र में विश्वास का हो तो शंका का समाधान तुरंत किया जाना जरूरी है क्योंकि लोग इसी आधार पर लोकतंत्र में विश्वास करते हैं कि चुनाव निष्पक्ष व स्वतंत्र हों. किसी भी तरह की शंका पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गलत साबित होगी.

 

खामियां


पेपर ट्रायल के आवेदन को अदालत में गलत तरीके से पेश किया गया. कोई भी नागरिक या राजनीतिक हस्ती पेपर ट्रायल की गणना के लिए नहीं कह सकते, क्योंकि यह अदालती आदेश के तहत होना चाहिए. कानून बनाने वालों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को जटिल और बोझिल बना दिया है.


पेपर ट्रायल के आधार पर मतों की दोबारा गिनती के लिए कोर्ट की इजाजत लेनी जरूरी है और अधिकतर ऐसा संभव नहीं हो पाता. पंजाब में आप पार्टी के कई उम्मीदवार ईवीएम मशीनों की सत्यता परखने के लिए पेपर ट्रायल करवाना चाहते थे लेकिन निर्वाचन अधिकारी ने उन्हें यह कह कर लौटा दिया कि इसके लिए वे संबंधित कोर्ट से आदेश लाएं. इससे पूरा मकसद ही बेकार हो गया.


भाजपा और उसके कुछ समर्थकों का तर्क है कि आप पार्टी यह मांग इसलिए कर रही है कि वह चुनाव हार चुकी है. इसे एक तरह से उनकी हार के प्रति भड़ास निकालना माना जा रहा है. अगर ऐसा ही है तो क्या भाजपा के पास इस बात का जवाब है कि 2009 के चुनावों के बाद आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल क्यों उठाए? 2009 का चुनाव भाजपा कांग्रेस के हाथों हार गई थी. उस वक्त आडवाणी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे. भाजपा विपक्ष में थी. समझा जा सकता है कि भाजपा तब दो बार लगातार आम चुनाव हारने से आहत थी. अगले दस साल के लिए उसे सरकार में आने का मौका नहीं मिलने वाला था. क्या तब यह चुनाव हारने की भड़ास नहीं थी?


सबसे बड़ी आपत्ति तो इस बात को लेकर है कि उस वक्त के चुनाव आयुक्त ने आडवाणी के खिलाफ कोई व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं की थी. ना ही उन्होंने आत्मावलोकन करने जैसी कोई बात कही थी. चुनावी पैनल पूर्णतः आश्वस्त था कि ‘‘ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती.’’


गौरतलब है कि यह मामला उठाने वाले आडवाणी अकेले ही नहीं थे. सीपीएम और जद (यू) ने भी उनका साथ दिया था, जैसे आज मायावती, अखिलेश यादव और कांग्रेस केजरीवाल का साथ दे रहे हैं. कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग से उसी समय जवाब मांगा है, जब आप के प्रतिनिधि शनिवार को चुनाव आयोग से मिले. क्यों? क्या आप इस मामले की गहराई को नहीं समझ पा रहे?


ईवीएम मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में चला गया है. कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया है कि चार सप्ताह के भीतर इस पर जवाब दे. क्या अब चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को भी निर्देश देगा? भारतीय संविधान अधिकारों के वर्गीकरण पर आधारित है ताकि लोकतंत्र तानाशाही में न बदले. हर संस्था की अपनी भूमिका है. उनकी प्रतिबद्धता संविधान के प्रति बनती है न कि किसी व्यचक्ति विशेष के प्रति.


एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने शेषन से एक बात सीखी, वह यह कि अतीत का असर मेरे फैसले पर नहीं पड़ना चाहिए. जो लोग उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन हैं, उन्हें बांटने वाली प्रवृत्ति से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए. साथ ही किसी विचारधारा और व्यक्ति से प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष होकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए.


शेषन ही ऐसा कर सकते थे. उन्हें हमेशा भारतीय लोकतंत्र को और सजीव बनाने के लिए याद किया जाएगा. गौरतलब है कि इतिहास बहुत कठोर रहा है और वर्तमान भले ही देखने में प्रशस्त लगे लेकिन भविष्य के अंधकारपूर्ण होने की आशंका है.

First published: 6 April 2017, 9:50 IST
 
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