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पुण्यतिथि विशेष: 'गुदड़ी के लाल' की ये कहानियां बहुत कम लोग जानते हैं

आदित्य साहू | Updated on: 11 January 2018, 14:41 IST

आज से ठीक 52 साल पहले आज के ही दिन एक ऐसे शख्स की मृत्यु हुई थी जिनकी संदिग्ध हालत में अचानक हुई मौत से देश सन्न रह गया था. इस शख्स का नाम था लाल बहादुर शास्त्री. ये देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे जो जवाहर लाल नेहरू के बाद देश के प्रधानमंत्री बने थे. पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की आज 52वीं पुण्यतिथि है.

शास्त्री जी का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में दो अक्टूबर, 1904 को शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर हुआ था. उनकी 11 जनवरी, 1966 को उज़्बेकिस्तान के ताशकंद में संदिग्ध मौत हो गई थी. उसी दिन उन्होंने ताशकंद घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे. यह घोषणापत्र भारत-पाकिस्तान के बीच समझौते पर आधारित था.

लाल बहादुर शास्त्री के सार्वजनिक, राजनीतिक और निजी जीवन से जुड़ी कई घटनाओं की आज भी मिसाल दी जाती है. आइए आपको भी उनके जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी ही आश्चर्यजनक घटनाओं से रूबरू कराते हैं-

नदी तैरकर पार कर जाते थे स्कूल

बचपन से ही लाल बहादुर शास्त्री को काफी गरीबी और मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कई जगह इस बात का भी जिक्र किया गया है कि पैसे नहीं होने की वजह से लाल बहादुर शास्त्री तैरकर नदी पार कर स्कूल जाया करते थे. हालांकि कई जगह नदी पार करने की कहानी अलग भी है.

यह सच है कि उन्हें पैसे नहीं होने की वजह से स्कूल जाने में दिक्कत होती थी. इसकी वजह से उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त कर सकें. वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे, यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था.

पीएम होकर भी पहने फटे कपड़े

लाल बहादुर शास्त्री जवाहर लाल नेहरू के बाद देश के प्रधानमंत्री बने थे. एक घटना है कि शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री होते हुए अपने फटे कुर्ते पत्नी से पहनने को मांगे और कहा कि ऊपर से कोट डाल लेने के बाद यह दिखेगा भी नहीं. वहीं दूसरी घटना है कि जब शास्त्री जी 1965 के युद्ध में जीत के बाद पाकिस्तान से समझौते के लिए ताशकंद जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनका कोट फटा था.

उनके पास नया कोट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और स्वाभिमानी होने की वजह से वे किसी से पैसे मांग भी नहीं सकते थे. कहा जाता है कि उन्होंने फटे कोट को रफू करवाया और वही कोट पहनकर ताशकंद में उन्होंने दुनिया के बड़े नेताओं के साथ बैठक की.

निजी काम के लिए नहीं किया सरकारी गाड़ी का उपयोग

वहीं प्रधानमंत्री होने के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री ने कभी प्रधानमंत्री को दी गई सरकारी गाड़ी का उपयोग अपने निजी काम के लिए नहीं किया. एक बार उनके बेटे ने गाड़ी का उपयोग कर लिया था तो शास्त्री जी ने गाड़ी के उपयोग से होने वाले खर्च को जोड़कर उतना पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाया.

निजी आवागमन में दिक्कत होने के बाद पत्नी के बहुत जोर देने पर लोन लेकर एक कार खरीदी थी. उन्‍होंने फिएट कार खरीदी थी, उस समय उसकी कीमत 12 हजार रुपये थी जबकि खाते में सिर्फ 7 हजार रुपए थे. इसलिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5 हजार रुपये का लोन लिया था.

नहीं था कोई घरेलू नौकर

प्रधानमंत्री होने के बावजूद उनके घर में उनकी पत्नी की मदद के लिए कोई घरेलू नौकर नहीं था. शास्त्री जी और उनके परिवार के लोग खाना बनाने से लेकर अपने कपड़े धोने का काम खुद किया करते थे.

नजीर है शास्त्री जी का इस्तीफा

जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे तो एक रेल दुर्घटना हुई थी, जिसमें कई लोग मारे गए थे. इसके लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. तब देश और संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी और उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की था. उन्होंने कहा था कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी.

रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था, ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने और नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूं. यद्यपि शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं.’

आज भी जब किसी बड़े रेल हादसे के बाद जिम्मेवारी लेने की बात आती है तो लाल बहादुर शास्त्री जी की मिसाल जरूर दी जाती है.

जात-पांत का हमेशा किया विरोध

शास्त्री जी जात-पांत का हमेशा विरोध करते रहे. उन्होंने कभी अपने नाम के आगे भी अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया. शास्त्री की उपाधि उनको काशी विश्वविद्यालय से मिली थी.

आज भी कायम है मौत का रहस्य

लाल बहादुर शास्त्री की मौत का रहस्य आज भी कायम है. उनके बेटे सुनील शास्त्री का कहना है कि पूर्व पीएम शास्त्री की मौत दिल का दौरा पड़ने से नहीं हुई थी, बल्कि ये एक रहस्यमयी मौत थी. यदि पोस्टमार्टम कराया जाता तो सच्चाई सामने आ जाती. देश में कई लोगों ने शास्त्री जी की मौत पर सवाल उठाया था.

पूर्व सांसद सुनील शास्त्री ने कहा कि भारत-पाक युद्ध (1965) की समाप्ति के बाद जब पिताजी ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने गए तो पूरी तरह स्वस्थ थे. फिर 11 जनवरी 1966 की रात अचानक उनकी मृत्यु कैसे हो गई? मैं इसे साजिश मानता हूं.

साल 2009 में केंद्र सरकार ने इस संबंध में किए एक आरटीआई के जवाब में कहा था कि अगर शास्त्री जी की मौत से जुड़ी घटनाओं को सार्वजनिक कर दिया जाए तो भारत के कई अंतरराष्ट्रीय संबंध खराब हो जाएंगे.

वह पहले व्यक्ति थे, जिन्हें मरणोपरांत 'भारत रत्न' से नवाजा गया था. बहरहाल जिस तरह की नजीर लाल बहादुर शास्त्री ने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में पेश की है वह आज के राजनेताओं में ही नहीं उस वक्त के राजनेताओं में भी मिलना मुश्किल है. लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 से लेकर 11 जनवरी 1966 तक यानी करीब डेढ़ साल ही देश के प्रधानमंत्री के पद पर रहे, लेकिन उनका ये कार्यकाल अविस्मरणीय माना जाता है.

First published: 11 January 2018, 14:41 IST
 
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