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क्या राहुल गांधी की राजनीतिक अयोग्यता ने तोड़ी विपक्षी एकता?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 27 December 2016, 8:49 IST
(गेट्टी इमेजेज़)

2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ही कांग्रेस विपक्ष के तौर पर सकारात्मक माहौल बना रही थी. पर लगता है कि हाल के आक्रामक रवैये के चलते कांग्रेस ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. पार्टी ने 27 दिसंबर को विपक्ष की सभी पार्टियों के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस रखी है. इसका मकसद नोटबंदी को लेकर विपक्ष के हमले को और प्रभावी और ताकतवर बनाना है. पर हो सकता है, इस कांफ्रेंस में कई मुख्य पार्टियां शामिल ही न हों. ऐसा हुआ, तो यह कांग्रेस पार्टी के लिए काफी शर्मिंदगी की स्थिति होगी.

ख़बर है कि कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी के भरोसेमंद लेफ्टिनेंट अहमद पटेल और गुलाम नबी आजाद इस सम्मेलन के लिए जदयू, राजद, जेडीएस, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, बसपा, सपा और वामपंथी पार्टियों से मिले. पर इनमें से ज्यादातर ने कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के बारे में कुछ पक्का नहीं बताया. कुछ ने तो आने से साफ इनकार कर दिया. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने 26 दिसंबर को घोषणा की कि उनकी पार्टी इसमें हिस्सा नहीं लेगी. उन्होंने कहा, 'पार्टियों के बीच समुचित सलाह और समन्वय का अभाव है.'

येचुरी ने यह भी कहा कि न केवल वामपंथी बल्कि ज्यादातर पार्टियों से बैठक के एजेंडे के बारे में न तो सलाह ली गई और ना ही उन्हें जानकारी दी गई. बिहार में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी जदयू के नेता केसी त्यागी ने भी यही बात कही, 'हमारे विचार जानने की कोशिश नहीं की गई. हमें प्रेस कॉन्फ्रेंस के एजेंडे के बारे में नहीं मालूम. सबका एक-सा कार्यक्रम नहीं है. तो हम कैसे भाग ले सकते हैं?'

कहा जा रहा है कि बिहार में महागठबंधन सरकार की तीसरी पार्टी राजद भी भाग लेने के पक्ष में नहीं है, और ना ही एनसीपी और सपा. बसपा और डीएमके अब तक चुप हैं. केवल तृणमूल के संकेत सकारात्मक हैं. पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी कई बैठकों के लिए दिल्ली आती रही हैं.

राहुल की मोदी के साथ दुर्भाग्यपूर्ण बैठक

इन पार्टियों में से कइयों के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की एक हफ्ते पहले बदली रणनीति उन्हें पसंद नहीं आई. राहुल गांधी संसद सत्र समाप्त होने के साथ ही कांग्रेसी शिष्टमंडल के साथ मोदी से मिलने जा पहुंचे थे. उन्होंने यह फैसला तब लिया जबकि संसद में नोटबंदी के खिलाफ 16 पार्टियां एकमत थीं. राहुल की प्रधानमंत्री के साथ उस दुर्भाग्यपूर्ण बैठक ने विपक्षी एकता के आवेग को कमजोर कर दिया. बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो उसी दिन अपना विरोध जता दिया था.

कांग्रेस ने इस कदम से अन्य पार्टियों को यह संदेश दिया कि वह बिना किसी की भरोसे में लिए अपने मन का काम कर सकती है.

ऐसा लगता है, कांग्रेस ने विपक्ष की अन्य पार्टियों की नाराजगी समझ ली है और जानती है कि उसका यह दांव अब नहीं चलेगा. 26 दिसंबर को देर शाम जब जयराम रमेश से सम्मेलन में हिस्सा लेने वाली अन्य पार्टियों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया. उन्होंने कहा, 'जिन्हें कल आना है, आ जाएंगे. जो नहीं आएंगे, वे आगे आएंगे.'

उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस के समय तक की घोषणा नहीं की. सिर्फ यह कहा, 'यह कल उचित, सुविधाजनक समय पर होगी.' रमेश ने इस प्रश्न का भी सीधा जवाब नहीं दिया कि सम्मेलन में राहुल या सोनिया मौजूद रहेंगे या नहीं. अभी स्पष्ट तौर पर कह नहीं सकते कि यह पूरी कवायद सफल रहेगी या विफल.

संभावनाएं

कांग्रेस के लिए एकमात्र शुभ संकेत येचुरी का बयान है. उन्होंने कहा कि इन सब बातों से यह नहीं मानना चाहिए कि विपक्ष की एकता में दरार आ गई है. कहीं न कहीं येचुरी कांग्रेस को संदेश दे रहे हैं कि वह अपने पूर्व के रवैए को सुधारते हुए सबको भरोसे में लेकर कोई कदम बढ़ाए. अभी भी देर नहीं हुई है.

उन्होंने कहा कि संसद में सबका आपसी सहयोग बना रहेगा. वामपंथियों की तरफ से इसमें थोड़ी गुंजाइश बची हुई है, उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने की संभावनाएं हैं. उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस उनसे संपर्क करती है, तो वे विचार करेंगे और सम्मेलन में भाग ले सकते हैं.

अपना विरोध जताने के लिए विपक्ष की सभी पार्टियों का अलग-अलग एजेंडा होना चाहिए. येचुरी ने कहा, 'मैं किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहता, पर कहना चाहता हूं कि विपक्ष की किसी भी गतिविधि की सफलता हमेशा पहले से की गई आपसी सलाह पर निर्भर करती है.'

कांग्रेस के ऊपर संतुलन स्थापित करने की चुनौती है. सभी पार्टी के हितों का सामंजस्य बिठाने की महती जिम्मेवारी है, जो विभिन्न राज्यों में उनके साथ-साथ अन्य के साथ भी स्पर्धा में हैं- पश्चिम बंगाल में तृणमूल और वामपंथी, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा.

इन हालात में कांग्रेस यदि सोचती है कि वह केंद्र में विपक्ष की पार्टियों का साथ लिए बिना आगे बढ़ सकती है, तो भूल जाए. यदि वह विरोध की रणनीति पर अकेले कोई फैसला लेती है, तो इसका सफल होना असंभव है.

पिछले दिनों विपक्ष की एकता की जबरदस्त संभावनाएं पैदा हुई थीं, जब विपक्ष की सभी पार्टियों ने मिलकर मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का मिलकर विरोध किया था और इस कदम को वापस लेने पर मजबूर किया था. समय आ गया है कि वह इतिहास के पन्नों को पलटे और उनसे सबक ले.

First published: 27 December 2016, 8:49 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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