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हार के ठीकरे से बचने का बकवास बहाना है ईवीएम से छेड़छाड़, जानिए क्यों?

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 December 2017, 12:39 IST

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने वाली कांग्रेस ने ईवीएम को कठघरे में खड़ा किया है. हार्दिक पटेल ने काउटिंग शुरू होने से पहला आरोप लगाया था कि मतगणना से एक रात पहले भाजपा ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करेगी और जीत हासिल करेगी. कांग्रेस ने तो इसे लोकतंत्र की हत्या तक करार दिया है. लेकिन चुनाव आयोग ने साफ किया है कि ईवीएम के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती.

जानिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बारे में.

ईवीएम क्या है ? 
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पांच-मीटर केबल द्वारा जुड़ी दो यूनिटों-एक कंट्रोल यूनिट एवं एक बैलेटिंग यूनिट-से बनी होती है. कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है तथा बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कंपार्टमेंट के अंदर रखी होती है. बैलेट पेपर जारी करने के बजाए, कंट्रोल यूनिट का प्रभारी मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाएगा. यह मतदाता को बैलेटिंग यूनिट पर अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के सामने नीले बटन को दबाकर अपना मत डालने के लिए सक्षम बनाएगा.

ईवीएम का पहली बार चलन कब शुरू किया गया?

वर्ष 1989-90 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोगात्मक आधार पर पहली बार नवंबर 1998 में आयोजित 16 विधान सभाओं के साधारण निर्वाचनों में इस्तेमाल किया गया. इन 16 विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्रों में से मध्य प्रदेश में 5, राजस्थान में 5, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में 6 विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र थे.

कहां बनती है यह मशीन?
ईवीएम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद द्वारा विनिर्मित 6 वोल्ट की एल्कलाइन साधारण बैटरी पर चलती है. ईवीएम का ऐसे क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है जहां पर बिजली कनेक्शन नहीं है.

क्यों नहीं संभव र्इवीएम से छेड़छाड़

1. किस बूथ पर कौन सा ईवीएम जाएगा, इसके लिए रैंडमाइजेशन की प्रक्रिया होती है, यानी सभी ईवीएम को पहले लोकसभा वार फिर विधानसभा वार और सबसे अंत में बूथवार निर्धारित किया जाता है और पोलिंग पार्टी को एक दिन पहले डिस्पैचिंग के समय ही पता चल पाता है कि उसके पास किस सिरीज का ईवीएम आया है. ऐसे में अंतिम समय तक पोलिंग पार्टी को पता नहीं रहता कि उनके हाथ में कौन सा ईवीएम आने वाला है.

2. बेसिक तौर पर ईवीएम में दो मशीन होती हैं, बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट. वर्तमान में इसमें एक तीसरी यूनिट वीवीपीएटी को भी जोड़ दिया गया है, जो सात सेकंड के लिए मतदाता को एक पर्ची दिखाता है जिसमें ये उल्लेखित रहता है कि मतदाता ने अपना वोट किस अभ्यर्थी को दिया है. ऐसे में अभ्यर्थी बूथ पर ही आश्वस्त हो सकता है कि उसका वोट सही पड़ा है कि नहीं.

3. ईवीएम में अधिकतम 3,840 मत दर्ज किए जा सकते हैं. जैसा कि सामान्य तौर पर होता है, एक मतदान केंद्र में निर्वाचकों की कुल संख्या 15,00 से अधिक नहीं होगी फिर भी, ईवीएम की क्षमता पर्याप्त से अधिक है. ईवीएम अधिकतम 64 अभ्य‍र्थियों के लिए काम कर सकती है.

4. एक अधिकारी को मतदान के दिन लगभग 10 मतदान केंद्रो को कवर करने के लिए ड्यूटी पर लगाया जाता है. वे अपने पास अतिरिक्त ईवीएम रखे रहेंगे और खराब ईवीएम को नई ईवीएम से बदला जा सकता है. ईवीएम के खराब होने के चरण तक दर्ज मत कंट्रोल यूनिट की मेमोरी में सुरक्षित रहेंगे और ईवीएम के खराब होने के बाद से मतदान प्रक्रिया जारी रखना पर्याप्त होगा. शुरुआत से मतदान शुरू करना आवश्यरक नहीं है.  

5.  वर्ष 1989-90 में जब मशीनें खरीदी गई थीं उस समय प्रति ईवीएम (एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेटिंग यूनिट एवं एक बैटरी) की लागत 5500 रुपये थी. यद्यपि, इसमें प्रारंभिक निवेश अपेक्षाकृत अधिक है लेकिन लाखों मत पत्रों के मुद्रण, उनके परिवहन, भंडारण आदि और मतगणना स्टाफ एवं उन्हें भुगतान किए जाने वाले पारिश्रमिक में काफी कमी हो जाने की दृष्टि से हुई बचत के द्वारा अपेक्षा से कहीं अधिक निष्प्रभावी हो जाता है.  

6. ईवीएम की प्रोग्रामिंग इस प्रकार की गई है कि मशीनें एक मिनट में केवल पांच मतों को ही दर्ज करेगी. चूंकि मतों का दर्ज किया जाना अनिवार्य रूप से कंट्रोल यूनिट तथा बैलेटिंग यूनिट के माध्यम से ही किया जाता है, इसलिए अगर किसी मौके पर कुछ अप्रिय हो जाता है तो इससे छेड़छाड़ करने वाले उपद्रवियों की संख्या चाहे कितनी भी हो, वे केवल 5 मत प्रति मिनट की दर से ही मत दर्ज कर सकते हैं.

7. इसके अतिरिक्त मतदान अधिकारी द्वारा मतदान केंद्र के भीतर जैसे ही कुछ बाहरी व्यक्तियों को देखा जाए तो उनके पास 'बंद' बटन दबाने का विकल्प हमेशा रहता है. एक बार ‘बंद’ बटन दबा देने के पश्चात कोई भी मत दर्ज करना संभव नहीं होगा और इससे बूथ पर कब्जा करने वालों का प्रयास निष्फल हो जाएगा.

9. कंट्रोल यूनिट की मेमोरी में, परिणाम, 10 वर्ष और उससे भी अधिक समय तक रहता है.

10. वोटिंग के दिन सुबह मतदान शुरू करने से पहले मतदान केंद्र की पोलिंग पार्टी द्वारा सभी उम्मीदवारों के मतदान केंद्र प्रभारी या पोलिंग एजेंट के सामने मतदान शुरू करने से पहले मॉक पोलिंग की जाती है और सभी पोलिंग एजेंट से मशीन में वोट डालने को कहा जाता है ताकि ये जांचा जा सके कि सभी उम्मीदवारों के पक्ष में वोट गिर रहा है कि नहीं. ऐसे में यदि किसी मशीन में टेंपरिंग या तकनीकी गड़बड़ी होगी तो मतदान के शुरू होने के पहले ही पकड़ ली जाएगी.

11. मॉक पोल के बाद सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट मतदान केंद्र की पोलिंग पार्टी के प्रभारी को सही मॉक पोल का सर्टिफिकेट देते है. इस सर्टिफिकेट के मिलने के बाद ही संबंधित मतदान केंद्र में वोटिंग शुरू की जाती है. ऐसे में जो उम्मीदवार ईवीएम में टैंपरिंग की बात कर रहे हैं वे अपने पोलिंग एजेंट से इस बारे में बात कर आश्वस्त हो सकते हैं.

12. मतदान शुरू होने के बाद मतदान केंद्र में मशीन के पास मतदाताओं के अलावा मतदान कर्मियों के जाने की मनाही होती है, वे ईवीएम के पास तभी जा सकते है जब मशीन की बैट्री डाउन हो या कोई अन्य तकनीकी समस्या होने पर मतदाता द्वारा सूचित किया जाता है. हर मतदान केंद्र में एक रजिस्टर बनाया जाता है, इस रजिस्टर में मतदान करने वाले मतदाताओं की डिटेल अंकित रहती है और रजिस्टर में जितने मतदाता की डिटेल अंकित होती है, उतने ही मतदाताओं की संख्या ईवीएम में भी होती है. काउंटिंग वाले दिन इनका आपस मे मिलान मतदान केंद्र प्रभारी (presiding officer) की रिपोर्ट के आधार पर होता है.

13. सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम टैंपरिंग से संबंधित जितने भी मामले पहले आये उनमें से किसी भी मामले में ईवीएम में टैंपरिंग सिद्व नहीं हो पाई है. स्वयं चुनाव आयोग आम लोगों को आंमत्रित करता है कि वे लोग आयोग जाकर ईवीएम की तकनीक को गलत सिद्व करने हेतु अपने दावे प्रस्तुत करें. लेकिन आज तक कोई भी दावा सही सिद्व नहीं हुआ है. 

First published: 18 December 2017, 12:39 IST
 
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