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वंशवाद का कोढ़: चंद्रबाबू नायडू के बेटे का मंत्री बनना तय

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 March 2017, 19:52 IST

आंध्र प्रदेश की राजनीति में आजकल का हॉट टॉपिक है मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के पुत्र नारा लोकेश का विधान परिषद में ‘चुनाव’. सत्ताधारी तेलुगुदेशम पार्टी के ‘युवराज’ 20 मार्च को एमएलए कोटा के तहत ऊपरी सदन में चुने जाएंगे. कुछ विधायकों द्वारा उनका चयन किया जाएगा.

अब इस विषय पर वक्त बर्बाद करना बेमानी होगा कि कैसे राजनीतिक पार्टियां वंशवाद की राजनीति को आगे बढ़ाती हैं. वामपंथियों को छोड़ दिया जाए तो देश में शायद ही ऐसी कोई बड़ी पार्टी होगी जो वंशवाद के रास्ते पर न चली हो.
हालांकि ज्यादातर राजनेता चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी ‘‘लोगों के आशीर्वाद’’ से राजनीति में कदम रखे यानी की जनता द्वारा चुन कर राजनीति में आएं लेकिन नायडू ने सबसे अलग हटकर रास्ता चुना.

अपने ससुर एनटी रामाराव से विरासत में सत्ता पाने वाले नायडू अरसे से अपने पुत्र लोकेश का राजतिलक करने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं लेकिन अपने हर काम की तरह उनका इस सपने को सच करने का तरीका भी विचित्र है. नायडू भावनाओं में न बहकर सारे राजनीतिक फैसले वैज्ञानिक तरीके से करते हैं. उन्हें भावनाओं की कैमिस्ट्री से ज्यादा तर्कपूर्ण गणित रास आता है. भावनाएं न हों उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उनकी इच्छापूर्ति के रास्ते में अंकों की कमी नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने बडी ही चतुराई से अपने साले डग्गुबाती वेंकटेश्वर राव को दरकिनार कर दिया. डग्गुबाती ने 1995 में एनटीआर को हटाने में नायडू की मदद की थी. इसके बदले वे उपमुख्यमंत्री बनना चाहते थे. छह महीने बाद 1996 में उन्होंने डॉ. वेंकटेश्वर राव को सीधे पार्टी में शामिल किए बिना राज्यसभा चुनाव उम्मीदवार बना दिया और वे डेक्कन क्रोनिकल के प्रबंधक निर्दलीय उम्मीदवार को हरा कर राज्यसभा के लिए चुन लिए गए. यही गणित और रसायन शास्त्र की कहानी है. इसी प्रकार उन्होंने अपने साले एन.हरिकृष्णा को भी अपने कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया. नायडू ने उन्हें विधानसभा में भी नहीं चुने जाने दिया.

पहले टेस्ट में फेल

इससे इतर नायडू लोकेश के लिए अपनी पार्टी के ही किसी विधायक को अपनी सीट कुर्बान करने के लिए कह सकते थे (बेशक बड़ी कुर्सी के लिए) लेकिन उन्होंने ऐसा ‘मुश्किल प्रयोग’ करना ठीक नहीं समझा. राजनीति के लिटमस टेस्ट में लोकेश पहले ही फेल हो चुके हैं. करीब साल भर पहले उन्हें बृहन् हैदराबाद नगरपालिका (जीएचएमसी) चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसमें वे फेल हो गए थे. हालांकि चुनाव प्रचार नायडू ने किया था लेकिन जिम्मेदारी लोकेश पर थी.

अगर टीडीपी जीएचएमसी चुनाव में ठीक-ठाक सीटें जीत जाती तो तेलंगाना का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और ही होता. टीडीपी 150 में से मात्र एक ही सीट जीत पाई जबकि तेलंगाना राष्ट्र समिति ने 150 में से 99 सीटें जीतीं. इसके प्रचार की कमान मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे के.तारक रामाराव के हाथ में थी. देश के सबसे नए राज्य की राजनीति में लोकेश को नकार दिया गया. तभी से नायडू अपने बेटे को अपनी सरकार में शामिल कर सक्रिय राजनीति में लाने की कोशिश कर रहे हैं.

हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर अब तक नायडू अपने बेटे को सरकार में शामिल करने के सवालों को मुस्कान क साथ टालते आए हैं. जब उनकी ही पार्टी के सदस्य उनसे लोकेश को राज्य मंत्रिमंडल में शामिल करने की मांग करते तो वे कहते कि ‘‘हर एक को अवसर मिलेगा और हर बात का एक समय होता है.’’

गौरतलब है कि ये वही नायडू हैं, जिन्होंने 1986 में चित्तूर की एक सभा में एनटीआर को अपने अभिनेता बेटे बालकृष्णन को अपना उत्तराधिकारी बताने संबंधी बयान वापस लेने को मजबूर किया था. और अब ये स्वयं अपने बेटे को सरकार में ‘बैकडोर एंट्री’ करवा रहे हैं.

सोशल मीडिया पर विरोध

सोशल मीडिया पर पहले ही राजनीति के कच्चे खिलाड़ी लोकेश को इस तरह से विधायिका में लाने का विरोध हो रहा है. कुछ लोग कह रहे हैं कि इस ‘34 साल के बच्चे’ को अभी काफी कुछ सीखना है. यूट्यूब पर लोकेश के कुछ वीडियो ऐसे देखे जा सकते हैं, जिनमें वे भाषण देते हुए अनजाने में ही अपनी पार्टी पर ही तंज कसते नजर आ रहे हैं.

कुछ वरिष्ठ नेताओं ने लोकेश को विधान परिषद के जरिये मंत्रिमंडल में शामिल करने का विरोध किया. वे इस बात से खिन्न हैं कि एनटीआर द्वारा ऐसा किए जाने पर 30 मई 1985 को परिषद भंग कर दी गई थी. 8 अप्रैल 2007 को जब वाई.एस.राजशेखर रेड्डी के शासन में परिषद का पुनर्गठन किया जा रहा था तो नायडू ने उसका बहिष्कार किया था और 8 जुलाई 2004 को एक प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान उन्होंने कहा था ‘‘यह परिषद राजनीति के बेरोजगारों के लिए पुनर्वास केंद्र से अधिक साबित नहीं होगी.’’

नायडू के इस कदम की टीडीपी में ही आलोचना हो रही है क्योंके पार्टी चाहती थी कि ‘‘लोकेश बाबू गारु’’ को चुनाव जैसे सही रास्ते और मुख्य दरवाजे से केबिनेट में आते.

पुरानी परंपरा

अविभाजित आंध्र प्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों ने अपने बेटों को इसी तरह विधानसभा या संसद के निचले सदन में निर्वाचन के जरिये भेजा है. जैसे मैरी शशिधर रेड्डी (मैरी चन्ना रेड्डी के बेटे), कोटला सूर्य प्रकाश रेड्डी (कोटला विजय भास्कर रेड्डी), नदेन्दला मनोहर (एन भास्कर राव), पी.वी.रंगराव व पी.वी. राजेश्वर राव (पी.वी. नरसिंहा राव), जलागम प्रसाद राव (जलागम वेंगाला राव), वाई एस जगमोहन रेड्डी (वाई.एस. राजशेखर रेड्डी) और इनके अलावा केसीआर के बेटे और बेटी के.टी रामाराव और के. कविता आदि.

राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव और मीसा भारती (बिहार) देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अभय चौटाला (हरियाणा), मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव (यूपी), बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक (उड़ीसा), फारुक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला (जम्म-कश्मीर), शिबू सोरेन की बेटी दुर्गा सोरेन (झारखंड). इनमें से कई सीधे चुनाव जीतकर भी राजनीति में आए हैं.

केसीआर ने तो अपनी संतानों के राजनीति में प्रवेश को पूरी तरह उचित ठहराते हुए कहा था कि इन दोनों ने तेलंगाना आंदोलन में पूरी तरह सक्रियता से भाग लिया था. इसलिए जनता ने उन्हें चुना है. नायडू भले ही अपने बेटे के पक्ष में ऐसा कोई दावा न कर पाएं लेकिन लोकेश का विधायक और मंत्री बनना तय है.

First published: 7 March 2017, 8:16 IST
 
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