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जयललिता: एक संघर्षशील व्यक्तित्व और उलझी हुई विरासत

एस मुरारी | Updated on: 10 February 2017, 1:37 IST
QUICK PILL
  • तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद पूरा राज्य शोक में डूबा हुआ है. तीन दिन के लिए राज्य के सभी स्कूल-कॉलेज बंद हैं. सात दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है.
  • चेन्नई के अपोलो अस्पताल में सोमवार रात साढ़े 11 बजे मुख्यमंत्री जयललिता ने अंतिम सांस ली. उनके निधन के बाद देर रात ही ओ पन्नीरसेल्वम को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया गया है.
  • हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में जयललिता ने सियासी अनुमानों को झुठलाते हुए एआईएडीएमके को दोबारा जीत दिलाई.
  • 22 सितंबर को बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत के बाद उन्हें चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके की महासचिव जयललिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. वह एक ऐसी जुझारू राजनीतिक शख्सियत थीं जिन्होंने कभी भी आसानी से हार नहीं मानी. उनका 68 साल का जीवन अंतहीन संघर्षों से भरा रहा है. बीमारी के चलते वह 75 दिन अस्पताल में रहीं. ये दिन भी अनिश्चय और ड्रामे से भरपूर रहे.

चेन्नई के अपोलो अस्पताल ने 11:30 बजे रात में उनके निधन की घोषणा की, उसके लगभग घंटे भर बाद ही एक आपात बैठक बुलाकर उनके अतिविश्वासपात्र ओ पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री पद का नेता चुन लिया गया.

जयललिता की विवादास्पद सहयोगी रहीं शशिकला नटराजन को पार्टी का महासचिव चुना गया है. सत्ता पर पर्दे के पीछे उन्हीं का नियंत्रण रहने की अटकलें हैं. इस कदम को उनके अतिरिक्त राजनीतिक समीकरण के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके के 90 सदस्य हैं.

लोग कहते हैं कि गवर्नेन्स में शशिकला यदि कोई दखलंदाजी करती हैं तो उन्हें डीएमके की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ सकता है. ऐसा नहीं है कि पन्नीरसेल्वम को डीएमके की तरफ से विरोध का सामना न करना पड़े, लेकिन जयललिता के शासनकाल के दौरान उन्होंने विरोध सहने को लिए खुद को तैयार कर लिया है.

पन्नीरसेल्वम के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी को एकजुट रखने की होगी. अब जयललिता नहीं हैं तो ऐसे में एआईएडीएमके को उसके विरोधियों- न केवल मुख्य विपक्षी दल डीएमके बल्कि राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस की ओर से भी दबाव और उठापटक का सामना करना पड़ सकता है. ये दल 1967 से राज्य में अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए प्रयासरत है. 1967 में डीएमके ने तमिलनाडु में कांग्रेस से सत्ता हथिया ली थी.

गवर्नेन्स में शशिकला यदि कोई दखलंदाजी करती हैं तो उन्हें डीएमके की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

देखा जाए तो जयललिता और करुणानिधि के अलावा जयललिता के संरक्षक एमजी रामंचन्द्रन ने बड़ी पार्टियों को राज्य की सत्ता के निकट तक नहीं फटकने दिया. यह बात अलग है कि नई दिल्ली की उत्तरोतर सरकारों के साथ उनके रिश्ते अच्छे बने रहे या उन्होंने अच्छे बनाए रखे.

हालांकि 1972 में पार्टी में विभाजन के बाद एमजीआर ने अलग से अपनी एआईएडीएमके पार्टी बनाई. इससे डीएमके कमजोर हो गई. तमिलनाडु की राजनीति दो नेताओं करुणानिधि और एमजीआर तथा बाद में करुणानिधि और एमजीआर की नजदीकी जयललिता के बीच केन्द्रित हो गई.

करुणानिधि अब 92 साल के हो गए हैं. बढ़ती उम्र के कारण उन्हें चुनौतियों का सामना करने में दिक्कत आएगी. वह चेन्नई के एक अस्पताल में भर्ती हैं. हालांकि एआईएडीएमके की तरह डीएमके में उत्तराधिकारी की कोई समस्या नहीं है. उनके पुत्र एमके स्टालिन ने पार्टी को अच्छी तरह संभाल लिया है और पार्टी पर नियंत्रण स्टालिन का ही माना जाता है.

वास्तव में देखा जाए तो स्टालिन के नेतृत्व में ही इस साल हुए विधानसभा चुनाव के लिए अभियान चलाया गया. उन्होंने अपनी काबिलियत साबित की और राज्य में 90 सीटें लाने में सफल रहे, पर वह जयललिता को दुबारा सत्ता में आने से नहीं रोक सके. वह अब राज्य में विपक्ष के नेता हैं. हालांकि डीएमके बहुत ही ताकतवर विपक्ष के रूप में स्थापित है. जयललिता जब अस्पताल में थीं, तब तीन उपचुनाव हुए, तीनों में डीएमके आगे नहीं निकल सकीं.

उत्तराधिकार एक विरासत

जयललिता को एमजीआर के उत्तराधिकारी के रूप में लोगों की स्वीकार्यता का लाभ मिला है. एमजीआर जब 1984 में अमरीका के एक अस्पताल में जीवन से संघर्ष कर रहे थे और एआईएडीएमके कलह की शिकार थी, उस समय उन्होंने एमजीआर की विरासत को संभाला. वह एमजीआर के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने में पूरी तरह सफल रहीं. उनके करिश्माई नेतृत्व और अथक चुनावी अभियान के कारण मतदाता पोलिंग बूथ तक खिंचे चले आए.

1972 में डीएमके में विभाजन के बाद एमजीआर ने अलग से अपनी एआईएडीएमके पार्टी बनाई.

हालांकि अमरीका में सफल इलाज के बाद एमजीआर भारत आ गए. लेकिन उनकी अनुपस्थिति के चलते पार्टी दो धड़ों में बंट गई थी. एक धड़े की नेता एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन थीं और दूसरे की जयललिता, लेकिन जयललिता ने खुद को रामचंद्रन की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

जब एमजीआर 1984 में मस्तिष्क के स्ट्रोक के चलते अमरीका के अस्पताल में भर्ती थे तब जया ने मुख्यमंत्री की गद्‍दी संभालनी चाही लेकिन जानकी ने ऐसा नहीं होने दिया.

1987 में एमजीआर का निधन हो गया. एआईएडीएमके में संघर्ष बढ़ गया. जया की महत्वाकांक्षाओं में रोड़ा डालते हुए एमजीआर के सहयोगी वीरप्पन ने जानकी को मुख्यमंत्री बनवा दिया लेकिन जयललिता ने विधानसभा में बहुमत परीक्षण में अपनी मजबूती दिखाई. लेकिन स्पीकर की मदद से जानकी ने सरकार तो चलाई पर वह सरकार बाद में बर्खास्त कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. सत्ता उनके लिए आसान नहीं रही.

जया की महत्वाकांक्षाओं में रोड़ा डालते हुए एमजीआर के सहयोगी वीरप्पन ने जानकी को मुख्यमंत्री बनवा दिया.

राष्ट्रपति शासन हटने के बाद 1984 में तमिलनाडु में चुनाव हुए जिसमें करुणानिधि की पार्टी डीएमके को भारी जीत मिली. पार्टी की हार के बाद जानकी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. जानकी के पार्टी छोड़ने से जयललिता के लिए आगे की राह आसान हो गई. जयललिता के हाथ न केवल करोड़ों का फंड हाथ लगा वरन पार्टी का चुनाव चिन्ह भी उनके हाथ आ गया.

1989 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन किया. उन्हें यह भरोसा था कि राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे और उनके प्रधानमंत्री बनते ही वह करुणानिधि सरकार को उनसे बर्खास्त करवा देंगी. पर भाग्य को तो कुछ और ही मंजूर था. वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए. पर उनकी सरकार गिर गई. चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने, चन्द्रशेखर सरकार ने 1991 में करुणानिधि सरकार को बर्खास्त कर उन्हें उपकृत किया.

तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 में विधानसभा चुनाव हुए. माना जाता है कि करुणानिधि लिट्टे को संरक्षण दे रहे थे. इसके चलते अन्नाद्रमुक और कांग्रेस के गठबंधन ने डीएमके को करारी शिकस्त दी. पहली बार जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं.

सत्ता सुख

1991-1996 तक का जयललिता का मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल न केवल निरंकुश, स्वेच्छाचारी रहा बल्कि उस पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. जनता ने उन्हें अगले चुनाव में उखाड़ फेंका. 1996 में पांच साल का मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा करने के बाद जयललिता चुनाव की तैयारी में थी कि उसी समय उन पर और उनकी सहयोगी शशिकला पर आय से अधिक सम्पत्ति मामले में कई मामले दर्ज हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा.

वह पांच साल सत्ता से दूर रहीं. 2001 में उनकी पार्टी को राज्य में जीत हासिल हुई. हालांकि, भ्रष्टाचार के दो मामलों में उनको अपराधी ठहराए जाने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया था. अन्नाद्रमुक ने निर्विरोध तौर पर उन्हें अपना नेता चुना लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता को दोबारा मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया. 2003 में जब अदालत ने जयललिता को चुनाव लड़ने की इजाजत दी तो उन्होंने अंदीपट्टी सीट से चुनाव लड़ा और दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं.

भ्रष्टाचार के दो मामलों में अपराधी ठहराए जाने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया था.

सितंबर 2014 में बेंगलुरू की विशेष अदालत ने आय से अधिक सम्पत्ति रखने मामले में उन्हें चार साल की सजा सुनाई. इस शोक से जया कभी उबर नहीं सकी. हालांकि हाईकोर्ट ने बाद में उन्हें बरी कर दिया था.

कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश के खिलाफ अपील की. कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है. अब जबकि जयललिता इस संसार में नहीं है, उनके खिलाफ मामले स्वत: ही खत्म हो गए हैं. लेकिन यदि शीर्षस्थ न्यायालय निचली अदालत के उस निर्णय जिसमें चार साल के कठोर कारावास और प्रत्येक के खिलाफ 100 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है, तो शशिकला और उनकी भतीजी समेत अन्य को इसते तहत सजा भुगतनी होगी.

राजनीतिक रूप से मूल सवाल यही है कि क्या भाजपा और कांग्रेस, जयललिता की मौत के बाद जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भर पाएगी. विधानसभा में दिए अपने एक संक्षिप्त भाषण में जयललिता ने एक बार कहा था कि भाजपा और कांग्रेस से राज्य के हितों के लिए संघर्ष की अपेक्षा नहीं की जा सकती. क्योंकि इन दलों का आधार कर्नाटक और केरल में है और तमिलनाडु के अपने अन्तरजातीय विवाद हैं, जैसे कि कावेरी, मुल्लीपेरियार और कृष्णा नदी जल बंटवारा आदि.

First published: 6 December 2016, 1:00 IST
 
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