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कीर्ति आजाद ने जेटली को बताया अक्षम, कहा- सरकार की बर्बादी की सबसे बड़ी वजह हैं

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 December 2016, 10:00 IST
(एजेंसी)

भारतीय जनता पार्टी के निलंबित सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने रविवार को अपने संसदीय क्षेत्र दरभंगा में नोटबंदी को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर हमला करते हुए आरोप लगाया कि उनकी अदूरदर्शिता और अक्षमता की वजह से केंद्र सरकार की किरकिरी हो रही है.

कीर्ति ने मांग की कि ऐसे में जेटली को जिम्मेदारी का एहसास करते हुए वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. कीर्ति आजाद ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री कोई निर्णय ले रहे हैं और बैंकों में करोड़ों लोगों का कालाधन सफेद किया जा रहा है. ये बैंक किसके अंतर्गत हैं? ये वित्त मंत्रालय के अंतर्गत हैं. दुर्भाग्य से हमारे वित्त मंत्री पूरी तरह से अक्षम हैं. इसलिए उनको पद से इस्तीफा दे देना चाहिए.

उन्होंने आरोप लगाया कि नोटबंदी से पूरे देश में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास का माहौल उत्पन्न हो गया है.

उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकार की मंशा स्पष्ट रहती तो विमुद्रीकरण की पूर्व तैयारी अवश्य होती. उनके नीतिकारों को व्यवहारिकता का ज्ञान नहीं है. आम लोगों को 500 और 1,000 रुपये की बजाय 2,000 रुपये के नए नोट छापे जाने का तर्क समझ में नहीं आ रहा है.

आजाद ने कहा कि आम लोगों का मानना है कि इस पूरे प्रकारण से कॉरपोरेट घराने को लाभ मिलने की संभावना है.

इसके साथ ही फैसले पर सवालिया निशान खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि आठ नवंबर के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में छापेमारी शुरू की गई और जहां-तहां कालाधन पकड़ में आ रहा है. यही कार्य पूर्व में व्यापक पैमाने पर ना होना वित्त मंत्रालय की अक्षमता का परिचायक है.

कीर्ति आजाद ने वित्त मंत्री अरुण जेटली पर प्रहार करते हुए नोटबंदी के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार ठहराते हुए कहा कि इस दौरान रिजर्व बैंक ने 59 बार नोटबंदी से संबंधित आदेश जारी किए.

वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के बीच तालमेल का घोर अभाव है. उन्होंने आरोप लगाया कि छोटे और कुटीर उद्योग इस नोटबंदी से बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं. बड़ी संख्या में मजदूरों को काम के अभाव में घर लौटना पड़ रहा है.

कीर्ति ने कहा कि आम लोगों की नोट के अभाव में क्रय शक्ति घट गई है. इस नोटबंदी से रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं और बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न सकती है.

उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में कैशलेस प्रणाली का सफल होना मुश्किल लगता है. उन्होंने कहा कि जिन देशों में कैशलेस प्रणाली प्रचलन में भी है वहां की सरकारों पर नोट छापने का भारी दबाव है.

First published: 26 December 2016, 10:00 IST
 
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