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जानिए कब और कैसे भाजपा-शिवसेना गठबंधन की पड़ी थी नींव और कैसे छूटा साथ

आदित्य साहू | Updated on: 23 January 2018, 13:50 IST

पिछले काफी समय से रिश्ते में आ रहे तनाव के बीच एनडीए में शामिल शिवसेना ने एनडीए का साथ छोड़ने का फैसला कर लिया है. शिवसेना की कार्यकारिणी की बैठक में यह तय हुआ है. शिवसेना ने 2019 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया है. शिवसेना की मंगलवार को हुई एक अहम बैठक में इस बारे में फैसला लिया गया.

बीजेपी और शिवसेना के बीच काफी वक्त से चल रही तल्खी का नतीजा मंगलवार को सामने आ ही गया. पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें अकेले दम पर राज्य में ‘शिवशाही’ (शिवसेना की सत्ता) की वापसी का संकल्प लिया गया.

कैसे हुई थी रिश्ते की शुरुआत

शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थांपना की थी. उन्होंने महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए शिवसेना की स्थापना की थी. पार्टी बनाने के लिए उन्होंने भूमिपुत्र का नारा दिया था. शिवसेना के गठन के समय बालासाहेब ठाकरे ने नारा दिया था, ''अंशी टके समाजकरण, वीस टके राजकरण.'' यानि 80 प्रतिशत समाज सेवा और 20 प्रतिशत राजनीति.

1970 के शुरुआती दिनों में पार्टी को काफी लोकप्रियता मिली. इस दौरान दूसरे राज्यों, विशेष रूप से दक्षिण भारतीय लोगों पर महाराष्ट्र में काफी हमले हुए. 1970 के बाद शिवसेना का भूमिपुत्र का दांव कमजोर होने लगा.

शिवसेना ने पहला चुनाव 1971 में लड़ा था लेकिन उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीता. 1989 के लोकसभा चुनाव में पहली बार शिवसेना का पहला सांसद चुना गया. महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव शिवसेना ने पहली बार 1990 में लड़ा जिसमें उसके 52 विधायक चुनकर आए.

शिवसेना ने भूमिपुत्र का दांव कमजोर होने पर हिंदुत्व के मुद्दे पर आगे बढ़ना शुरू किया. पार्टी ने भाजपा के साथ 1989 में गठबंधन किया जो अभी तक चल रहा था. हालांकि 2014 में विधानसभा में दोनों दल अलग हो गए थे. लेकिन फिर बाद में इकट्ठे हो गए थे.

 

क्यों छूटा साथ

साल 2014 में केंद्र की मोदी सरकार बनने के बाद ही भाजपा और शिवसेना के रिश्ते डगमगा रहे थे. मोदी सरकार के शपथ लेने के समय ही शिवसेना ने खुद की अनदेखी का आरोप लगाया था. इसके बाद उसी साल के अंत हुए महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी का साथ छोड़ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया था.

इससे पहले साल 1999 से लेकर 2014 तक शिवसेना भाजपा के साथ विपक्ष की भूमिका में थी. लेकिन 2014 के चुनाव में अलग लड़ने के बाद दोंनो ने चुनाव बाद गठबंधन कर फिर से महाराष्ट्र में सरकार बनाई थी. हालांकि इसके बाद भी शिवसेना न तो मोदी सरकार और न ही राज्य की फडणवीस सरकार से खुश रही. शिवसेना केंद्र की मोदी सरकार, यहां तक कि राज्य की फडणवीस सरकार की खासी आलोचक रही है.

नोटबंदी, जीएसटी जैसे केंद्र सरकार के फैसलों से लेकर हर उस मुद्दे पर शिवसेना अपने सहयोगी पर हमलावर रही, जिसके जरिए विरोधी पार्टियों ने बीजेपी को घेरने की कोशिश की. तल्खी इस हद तक बढ़ गई थी कि शिवसेना परंपरागत राजनीतिक विरोधी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ करते नजर आई.

बीएमसी के चुनाव भी इस तल्खी के माहौल में लड़े गए. बीजेपी और शिवसेना ने अलग अलग चुनाव लड़ा. चुनाव में बीजेपी ने शिवसेना को इतनी कड़ी टक्कर दी कि शिवसेना ने उस वक्त चुप्पी साधने में ही भलाई समझी और बीजेपी के सहयोग से नगर निगम की सत्ता पर काबिज होने में भलाई समझी. लेकिन अब शिवसेना ने भाजपा का साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया है.

 

क्या पड़ेगा असर

अगर अभी बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूट जाता है तो केंद्र में इसका कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार गिर जाएगी. महाराष्ट्र सरकार में बीजेपी और शिवसेना की गठबंधन के 288 विधायक हैं. इनमें 122 बीजेपी के, 63 शिवसेना और बाकी अन्य विधायक हैं. वहीं, कांग्रेस के 42, और एनसीपी के 41 विधायक हैं.

इसके अलावा बीएमसी में भी इसका असर पड़ेगा और शिवसेना की सत्ता हाथ से चली जाएगी. हालांकि कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह शिवसेना की ओर से बीजेपी पर दबाव बनाने की रणनीति है.

First published: 23 January 2018, 13:50 IST
 
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