Home » राजनीति » know your evm hindi Electronic voting in India why tampering is not possible with evm
 

जानें क्या है ईवीएम मशीन आैर कितनी मुमकिन है इससे छेड़छाड़?

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 March 2017, 16:16 IST
EVM machine

देश में पांच राज्यों में हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने वाले दलों ने ईवीएम को कठघरे में खड़ा किया है. आरोप है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की गई है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे लोकतंत्र की हत्या तक करार दिया. वहीं उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत ने अपनी हार को ईवीएम का चमत्कार बताया. चुनाव आयोग ने साफ किया है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है. जानें इसके बारे में... 

ईवीएम क्या है ?
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पांच-मीटर केबल द्वारा जुड़ी दो यूनिटों-एक कंट्रोल यूनिट एवं एक बैलेटिंग यूनिट-से बनी होती है. कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है तथा बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखी होती है. बैलेट पेपर जारी करने के बजाए, कंट्रोल यूनिट का प्रभारी मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाएगा. यह मतदाता को बैलेटिंग यूनिट पर अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के सामने नीले बटन को दबाकर अपना मत डालने के लिए सक्षम बनाएगा.

ईवीएम का पहली बार चलन कब शुरू किया गया?

वर्ष 1989-90 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोगात्मक आधार पर पहली बार नवम्बर, 1998 में आयोजित 16 विधान सभाओं के साधारण निर्वाचनों में इस्तेमाल किया गया. इन 16 विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में से मध्य प्रदेश में 5, राजस्थान में 5, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 6 विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र थे.

कहां बनती है यह मशीन
ईवीएम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड, हैदराबाद द्वारा विनिर्मित 6 वोल्ट की एल्कलाइन साधारण बैटरी पर चलती है. ईवीएम का ऐसे क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है जहां पर बिजली कनेक्शन नहीं हैं.

क्यों नहीं संभव र्इवीएम से छेड़छाड़

1. किस बूथ पर कौन सा ईवीएम जायेगा, इसके लिए रैंडमाइजेशन की प्रक्रिया होती है, अर्थात सभी ईवीएम को पहले लोकसभा वार फिर विधानसभा वार और सबसे अंत में बूथवार निर्धारित किया जाता है और पोलिंग पार्टी को एक दिन पहले डिस्पैचिंग के समय ही पता चल पाता है कि उसके पास किस सीरिज का ईवीएम आया है. ऐसे में अंतिम समय तक पोलिंग पार्टी को पता नहीं रहता कि उनके हाथ में कौन सा ईवीएम आने वाला है.

2. बेसिक तौर पर ईवीएम में दो मशीन होती है, बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट. वर्तमान में इसमें एक तीसरी यूनिट वीवीपीएटी भी जोड़ दिया गया है, जो सात सेकंड के लिए मतदाता को एक पर्ची दिखाता है जिसमें ये उल्लेखित रहता है कि मतदाता ने अपना वोट किस अभ्यर्थी को दिया है. ऐसे में अभ्यर्थी बूथ पर ही आश्वस्त हो सकता है कि उसका वोट सही पड़ा है कि नहीं.

3. ईवीएम में अधिकतम 3840 मत दर्ज किए जा सकते हैं. जैसाकि सामान्य तौर पर होता है, एक मतदान केन्द्र में निर्वाचकों की कुल संख्या 15,00 से अधिक नहीं होगी फिर भी, ईवीएम की क्षमता पर्याप्त से अधिक है. ईवीएम अधिकतम 64 अभ्य‍र्थियों के लिए काम कर सकती है.

4. एक अधिकारी को मतदान के दिन लगभग 10 मतदान केन्द्रों को कवर करने के लिए ड्यूटी पर लगार्इ जाती है. वे अपने पास अतिरिक्त ईवीएम रखे रहेंगे और खराब ईवीएम को नई ईवीएम से बदला जा सकता है. ईवीएम के खराब होने के चरण तक दर्ज मत कंट्रोल यूनिट की मेमोरी में सुरक्षित रहेंगे और ईवीएम के खराब होने के बाद से मतदान प्रक्रिया जारी रखना पर्याप्त होगा. शुरुआत से मतदान शुरू करना आवश्यरक नहीं है.  

5.  वर्ष 1989-90 में जब मशीनें खरीदी गई थीं उस समय प्रति ईवीएम (एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेटिंग यूनिट एवं एक बैटरी) की लागत 5500/- थी. यद्यपि, प्रारंभिक निवेश किंचित अधिक है, लाखों मत पत्रों के मुद्रण, उनके परिवहन, भंडारण आदि, और मतगणना स्टाकफ एवं उन्हें भुगतान किए जाने वाले पारिश्रमिक में काफी कमी हो जाने की दृष्टि से हुई बचत के द्वारा अपेक्षा से कहीं अधिक निष्प्रभावी हो जाता है.  

6. ईवीएम की प्रोग्रामिंग इस प्रकार की गई है कि मशीनें एक मिनट में केवल पांच मतों को ही दर्ज करेगी. चूंकि मतों का दर्ज किया जाना अनिवार्य रूप से कंट्रोल यूनिट तथा बैलेटिंग यूनिट के माध्यम से ही किया जाना, इसलिए उपद्रवियों की संख्या चाहे कितनी भी हो, वे केवल 5 मत प्रति मिनट की दर से ही मत दर्ज कर सकते हैं

7. इसके अतिरिक्त मतदान अधिकारी द्वारा मतदान केन्द्र के भीतर जैसे ही कुछ बाहरी व्यक्तियों को देखा जाए तो उनके पास 'बंद' बटन दबाने का विकल्पे हमेशा रहेगा- एक बार ‘बंद’ बटन दबा देने के पश्चात कोई भी मत दर्ज करना संभव नहीं होगा और इससे बूथ पर कब्जा करने वालों का प्रयास निष्फल हो जाएगा.

9. कंट्रोल यूनिट, की मेमोरी में, परिणाम, 10 वर्ष और उससे भी अधिक समय तक रहता है.

10. वोटिंग के दिन सुबह मतदान शुरू करने से पहले मतदान केन्द्र की पोलिंग पार्टी द्वारा सभी उम्मीदवारों के मतदान केन्द्र प्रभारी या पोलिंग एजेंट के सामने मतदान शुरू करने से पहले मॉक पोलिंग की जाती है और सभी पोलिंग एजेंट से मशीन में वोट डालने को कहा जाता है ताकि ये जांचा जा सके कि सभी उम्मीदवारों के पक्ष में वोट गिर रहा है कि नहीं. ऐसे में यदि किसी मशीन में टेंपरिंग या तकनीकी गड़बड़ी होगी तो मतदान के शुरू होने के पहले ही पकड़ ली जायेगी.

11. मॉक पोल के बाद सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट मतदान केन्द्र की पोलिंग पार्टी के प्रभारी को सही मॉक पोल का सर्टिफिकेट देते है. इस सर्टिफिकेट के मिलने के बाद ही संबंधित मतदान केन्द्र में वोटिंग शुरू की जाती है. ऐसे में जो उम्मीदवार ईवीएम में टैंपरिंग की बात कर रहे हैं वे अपने पोलिंग एजेंट से इस बारे में बात कर आश्वस्त हो सकते हैं.

12. मतदान शुरू होने के बाद मतदान केन्द्र में मशीन के पास मतदाताओं के अलावा मतदान कर्मियों के जाने की मनाही होती है, वे ईवीएम के पास तभी जा सकते है जब मशीन की बैट्री डाउन या कोई अन्य तकनीकी समस्या होने पर मतदाता द्वारा सूचित किया जाता है. हर मतदान केन्द्र में एक रजिस्टर बनाया जाता है, इस रजिस्टर में मतदान करने वाले मतदाताओं की डिटेल अंकित रहती है और रजिस्टर में जितने मतदाता की डिटेल अंकित होती है, उतने ही मतदाताओं की संख्या ईवीएम में भी होती है. काउंटिंग वाले दिन इनका आपस मे मिलान मतदान केंद्र प्रभारी (presiding officer) की रिपोर्ट के आधार पर होता है.

13. सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम टैंपरिंग से संबंधित जितने भी मामले पहले आये उनमें से किसी भी मामले में ईवीएम में टैंपरिंग सिद्व नहीं हो पाई है. स्वयं चुनाव आयोग आम लोगों को आंमत्रित करता है कि वे लोग आयोग जाकर ईवीएम की तकनीक को गलत सिद्व करने हेतु अपने दावे प्रस्तुत करें. लेकिन आज तक कोई भी दावा सही सिद्व नहीं हुआ है. 

First published: 14 March 2017, 16:16 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी