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मायावती को राज्य सभा में लाया जाना चाहिए, मगर क्या विपक्ष एकजुट होगा?

भारत भूषण | Updated on: 26 March 2017, 7:34 IST

‘‘राज्यसभा में उत्तर प्रदेश के जिन सांसदों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, उनमें से अगर किसी को दोबारा राज्यसभा आना चाहिए तो वो हैं मायावती जी.’’ उत्तर प्रदेश चुनाव परिणाम के परिप्रेक्ष्य में विपक्षी दलों के एकजुट होकर काम करने को लेकर बात करते हुए दिग्विजय सिंह ने यह बात कही.


सिंह का यह कहना कि बसपा नेता को राष्ट्रीय भूमिका के लिए समर्थन की जरूरत है; किसी भी कांग्रेस नेता द्वारा दिया गया ऐसा पहला बयान है. अप्रैल 2018 में 31 राज्यसभा सीटों में से 10 सीटें उत्तर प्रदेश की हैं, जिन पर चुनाव होना है. दस में से 8 सीटें भाजपा आसानी से जीत सकती है. एक सीट समाजवादी पार्टी को मिलेगी और दसवीं सीट को लेकर खींचतान मचेगी.


विपक्ष के एकजुट होकर काम करने की पहली परख इसी बात से हो जाएगी कि कांग्रेस, बसपा और समाजवादी पार्टी मायवाती के राज्यसभा में निर्वाचन को लेकर एकजुटता दिखाते हुए मायावती के पक्ष में वोट डाल पाते हैं या नहीं. यह इस बात का संकेत होगा कि सपा और कांग्रेस चाहते हैं कि मायावती राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक भूमिका निभाएं. इसी प्रकार यह 2019 के आम चुनाव से पहले विपक्ष की एकजुटता का परखने के लिए काफी है.


कैच के साथ एक बातचीत के दौरान कांग्रेस महासचिव ने कहा, भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी नेताओं को अहंकार त्याग कर एक दूसरे के साथ आना ही होगा.


‘‘राजनीति में अहंकार से काम नहीं चलता. विपक्षी दलों के समूह के रूप में एक साथ आने को लेकर उन्होंने कहा, ‘‘हमें सच्चाई का सामना करना होगा और सामूहिक रूप से काम करने के लिए अपने-अपने अहम् को घर छोड़कर आना होगा.’’ सिंह ने कहा कि भाजपा को उसकी विचारधारा व धनाढ्य वर्ग की समर्थक और अनुसूचित जाति जनजाति विरोधी नीतियों पर घेरा जा सकता है. हमें जनता को समझाना होगा कि ‘‘हिन्दुत्व तो भाजपा की विचारधारा का मुखौटा मात्र है और उसका असल मकसद तो सत्ता हथियाने के बाद ‘संपन्न’ लोगों की सहायता कर असहायों और गरीबों के विरुद्ध काम करना है.’’


कट्टरपंथी महन्त आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त करने से ही मोदी के विकास अजेंडा जैसे ढकोसले की पोल खुल जाती है. वे कहते हैं ‘‘क्या महन्त कहीं से भी गुजरात के विकास मॉडल में फिट बैठते हैं, जिसका ढिंढोरा मोदी पूरी दुनिया में पीटते हैं? योगी तो गुरू गोरखनाथ के सिद्धान्तों का भी पालन नहीं कर रहे हैं, जिन्होंने ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त करने के लिए मठ की स्थपना की.

 

हटता मुखौटा

 

वे कहते हैं ‘‘चुनाव दर चुनाव प्रधानमंत्री की प्रचार रणनीति साफ होती दिखाई दे रही है. वे चुनाव से तीन दिन पहले तक तो विकास की बात करते हैं और प्रचार के अंतिम वक्त पर वे अपने चुनाव प्रचार में साम्प्रदायिक मुद्दा ले ही आते हैं. यह भाजपा की सोची समझी चुनाव रणनीति है.’’

वे कहते है जनता के बीच आज साम्प्रदायिकता बड़ा मुद्दा बन गई है. सोशल मीडिया पर भी इसका चलन काफी बढ़ गया है. 2014 के लोकसभा चुनाव और हाल ही आए यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे यही दिखाते हैं कि भाजपा के लिए राष्ट्रीय सेवक संघ काम कर रहा है. उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा का मुकाबला करने के लिए गांधी जी के धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्तों का पालन करते हुए सभी धर्मों को एकसमान आदर एवं महत्व देना होगा. भाजपा को जवाब देने के लिए महात्मा गांधी की धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त काफी है.’’


एक बड़े गठबंधन का सुझाव देते हुए सिंह ने बताया कि 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ भी ऐसी ही लामबंदी हुई थी. हमारा लक्ष्य भाजपा की विचारधारा और उन तरीकों को चुनौती देना है, जिस पर देश को चलाया जा रहा है.’’

 

अपनी ही पार्टी और अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा, धर्मनिरपेक्षता से आशय एक आधुनिक व उदारवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करना है ना कि लोगों को यह उपदेश कैसे तैयार हों, क्या कपड़े पहनें, किससे मिलें और क्या खाएं? उन्होंने आशा जताई कि यही समय है जब कांग्रेस गांधी जी के धर्मनिरपेक्षता सिद्धांत को अपनाए.

पूरा इंटरव्यू देखने के लिए इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें.

First published: 26 March 2017, 7:34 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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