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ठनका माया का माथा, अब योगी और 'मौर्य' पर नज़र !

सुधाकर सिंह | Updated on: 18 July 2017, 14:22 IST
आर्या शर्मा/ कैच न्यूज़

बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंगलवार को राज्यसभा में अचानक एलान किया कि वे राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे रही हैं. मायावती ने तल्ख तेवर में कहा कि उन्हें दलितों की आवाज़ उठाने से रोका जा रहा है इस वजह से उन्हें सदन में रहने का हक़ नहीं है. हालांकि बसपा के वर्तमान हालात का क़रीब से विश्लेषण करें, तो ऐसा लगता है कि मायावती ने सोच-समझकर ये क़दम उठाया है. तो सवाल उठता है कि क्या मायावती की नज़र यूपी में होने वाले लोकसभा उपचुनाव पर है? क्या मायावती अब राज्यसभा के बजाए लोकसभा के रास्ते संसद की चौखट पार करने का मन बना चुकी हैं? क्या मायावती अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाने वाली हैं?

इन तमाम संभावनाओं पर विचार करते हुए देखा जाए तो ये कई बातें उभरकर सामने आ रही हैं. मसलन अगर सबसे पहले मायावती के राज्यसभा से इस्तीफ़े की बात करें, तो अब उनके कार्यकाल के महज सवा आठ महीने बचे हैं. मायावती का कार्यकाल तीन अप्रैल 2012 को शुरू हुआ, जो दो अप्रैल 2018 को ख़त्म होने वाला था. उनकी पार्टी बसपा अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में है. 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी का खाता ही नहीं खुला, जबकि 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा अपने महज 19 सीटों पर सिमट गई.

अब मायावती के पास ख़ुद इतने विधायक नहीं हैं कि वो अपने बलबूते पर जीत सकें. राज्यसभा सदस्य बनने के लिए मायावती को 34 विधायकों का समर्थन चाहिए. यानी 15 विधायक और. ऐसे में उनके पास बगैर दूसरी पार्टियों की मदद के उच्च सदन में पहुंचने का रास्ता नहीं है. अगर सपा और बसपा मिल जाएं तो दो राज्यसभा सीटें हासिल हो सकती हैं. सपा के पास 47 विधायक हैं. इसमें कांग्रेस के 7 विधायक जोड़ दिए जाएं तो तीनों पार्टियों का आंकड़ा 73 होता है.

यूपी में दो सीटों पर लोकसभा उपचुनाव

यूपी चुनाव में शर्मनाक शिकस्त के बाद मायावती ने लगातार आक्रामक रुख अख्तियार किया है. माया ने पहले सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव दौरा करते हुए अपनी सिकुड़ती ज़मीन को बरकरार रखने की कोशिश की, जो भीम सेना के उभार के बाद ख़तरे में पड़ती नज़र आ रही थी. मायावती ने सदन में आरोप लगाया कि सहारनपुर हिंसा के मामले में उन्हें बोलने से रोका जा रहा है और अगर वे कमज़ोर तबके की आवाज़ नहीं उठा सकतीं, तो उन्हें सदन में रहने का अधिकार नहीं है. अगर मायावती के इस्तीफ़े के बाद खाली सीट से उपचुनाव होने पर अगर वो जीत भी जाती हैं, तो सियासी रूप से कोई बड़ी लकीर नहीं खिंचेगी. लेकिन अगर वो यूपी में लोकसभा उपचुनाव के दौरान ताल ठोकती हैं, तो ज़ाहिर तौर पर बड़ा बदलाव दिख सकता है.

गौर करने वाली बात है कि यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर सीट और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर सीट पर लोकसभा का उपचुनाव होना है. 19 मार्च को शपथग्रहण होने के बाद अब छह महीने के अंदर यानी सितंबर 2017 तक दोनों को विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता लेना ज़रूरी है. ज़ाहिर है योगी की लोकप्रियता को देखते हुए मायावती उनकी सीट यानी गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहेंगी. हालांकि फूलपुर से मायावती ज़रूर चुनाव लड़ सकती हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी संकेत दे चुके हैं कि बसपा के साथ जाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है.

क्या फूलपुर सीट से लड़ेंगी माया?

ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़ा विपक्षी मोर्चा बनाने की कवायद के तहत माया और अखिलेश में सहमति बन सकती है. राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पटना में 27 अगस्त को महारैली कर रहे हैं, जिसमें दोनों के शामिल होने की संभावना है. लालू पहले ही कह चुके हैं कि अगर सपा और बसपा साथ आते हैं तो यूपी से भी बिहार की तरह मोदी को आउट कर देंगे. अपनी सियासत को बचाने के लिए मायावती फूलपुर लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ सकती हैं. अगर 'बुआ' और 'भतीजे' की दोस्ती होती है, तो अखिलेश लोकसभा उपचुनाव में मायावती के समर्थन में अपना उम्मीदवार नहीं उतारने का एलान कर सकते हैं.

वैसे भी फूलपुर ऐसी ऐतिहासिक सीट है, जिसने सियासत का अनूठा रंग देखा है. समाजवादी विचारक डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने जब फूलपुर से 1962 में जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो उनसे कुछ लोगों ने पूछा कि क्यों चट्टान से टकराने जा रहे हैं? किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ कर लोकसभा में पहुंचिए. डॉक्टर लोहिया ने जवाब दिया था, "नेहरू के ख़िलाफ़ मेरे चुनाव लड़ने से हमारी पार्टी और विचारधारा का प्रचार होगा, क्योंकि दुनिया भर के प्रेस की नज़र वहां रहेगी. चट्टान को मैं भले तोड़ नहीं पाऊंगा, लेकिन उसमें दरार तो डाल ही दूंगा." उनकी बात सच साबित हुई. फूलपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा सीटों में से दो पर लोहिया से नेहरू हार गए थे. अब मायावती के सामने भी खुद की पार्टी का अस्तित्व बचाने की चट्टान सी चुनौती है.

First published: 18 July 2017, 14:14 IST
 
सुधाकर सिंह @sudhakarsingh10

कैच हिंदी टीम, वो अमीर हैं निज़ाम-ए-जहां बनाते हैं, मैं फ़क़ीर हूं मिज़ाज-ए-जहां बदलता हूं...

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