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नोटबंदी: भाजपा की दुविधा, लापरवाह मुखिया के बचाव की मजबूरी

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:36 IST

उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनावी संभावनाओं को लेकर अचानक सजग हो गई है. नोटबंदी से पहले उसे अपनी जीत का पूरा भरोसा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भी उत्साही जनमानस का हुजूम था.

लेकिन मोदी ने खुद ही अपने नाटकीय और बिना सोचे-समझे फैसले से अपनी छवि बिगाड़ ली. पहले ऐसा लगता था मानो उनकी शख्सियत को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. पर अब उनके लिए ना तो कोई ताली बजा रहा है और ना ही ‘मोदी मोदी’ का राग अलाप रहा है, जैसा कि वे पहले करते थे. नोटबंदी के कारण आम आदमी को भारी नुकसान हुआ है.

पूरी दुनिया एकमत है कि भारत सरकार ने नोटबंदी करके सबकुछ खत्म कर दिया. जिस सोशल मीडिया की मोदी की छवि बनाने में अहम भूमिका थी, उसके ही वायरल वीडियो, और संदेश उनकी छवि को मिट्टी में मिला रहे हैं. पार्टी के ही कुछ लोग अपने नेताओं से कहना चाहते हैं कि नोटबंदी से उनकी छवि तार-तार हो गई है.

गरीब आदमी जानता है कि कैश का न होना क्या होता है. यहां तक कि जिनका पैसा बैंक में था, उन्हें भी गरीब होने का अहसास कराया गया. इसलिए इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए जब इस महीने की शुरुआत में मोदी की बहराइच में जनसभा निरस्त कर दी गई. जब उन्हें मालूम हुआ कि रैली के मैदान में बहुत कम लोग हैं, तो उन्हें मोबाइल फोन से संबोधन करना पड़ा.

पूरी दुनिया एकमत है कि भारत सरकार ने नोटबंदी करके सबकुछ खत्म कर दिया

भाजपा की चुनावी संभावनाओं पर नोटबंदी इतनी भारी पड़ी है कि मोदी ने 19 दिसंबर को ज्यादातर समय कानपुर में जनता को संबोधित करते हुए बिताया. इसमें भी वे डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए बेअक्ली से दैनिक और साप्ताहिक लॉटरी स्कीम की घोषणा कर रहे थे. देश का प्रधानमंत्री ही ऐसा कर रहा था.

अब देखना है कि क्या यूपी के डिजिटल वोटर्स आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट देंगेे. यह तो साफ है कि नोटबंदी और उसके हर दिन बदलते लक्ष्य लोगों को प्रभावित नहीं कर पा रहे. शुरू में उसका मकसद काले धन पर अंकुश लगाना था, जिसे जल्द ही कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ दिया.

वहां से मिली रिपोर्टों से लगता है कि कारोबारी खुश नहीं हैं, क्योंकि उनका कारोबार घट कर महज एक तिहाई रह गया है. ये व्यवसायी, जो भाजपा के हमेशा भरोसेमंद समर्थक रहे हैं, हो सकता है, उनमें से कुछ अन्य पार्टियों को वोट दे दें और अन्य बिलकुल वोट नहीं डालें.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का दावा है कि यूपी के ग्रामीण इलाकों में नोटबंदी से उपजी तकलीफें अभी सामने आनी बाकी हैं. वहां तकलीफ इससे नहीं हुई कि उन्हें बैंक या एटीएम के बाहर लाइन में खड़ा रहना पड़ा, बल्कि इससे है कि उनकी मांग घटी है और बेरोजगारी की आशंकाएं बढ़ीं हैं. इसलिए क्योंकि युवा प्रवासी कामगार शहरों और अर्ध शहरी केंद्रों से वापस अपने गांवों में लौट आए है.

कैश की कमी से दुकानदारों और कारोबारियों ने कम माल खरीदना शुरू कर दिया क्योंकि वे अब कम बेच रहे हैं. वे अपने कैजुअल वर्कर्स को रख सकते हैं. वे ईमानदार हैं. पर एक या दो महीने बाद उन्हें छोड़ने के लिए विवश होना पड़ेगा. तब नोटबंदी की पीड़ा और भी बढ़ जाएगी.

पार्टी की अंदरूनी बेचैनी

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार तो पार्टी के सांसदों और अधिकारियों की आशंकाएं दूर कर दी थीं. पर उन्हें दिल्ली में हाल की एक बैठक में फिर से नाराजगी का सामना करना पड़ा. बैठक तीन घंटे चली, गुजरात के पार्टी-प्रतिनिधियों ने नोटबंदी की तारीफ की, पर दिल्ली और यूपी इस कदम के विरोध में थे. वे सवाल पूछ रहे थे.

शाह को इस तरह के सवाल-जवाब सुनने की आदत नहीं है. जब उनमें से कुछ नेताओं ने नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव गिनाने शुरू किए, तो वे अपना धैर्य खो बैठे. जब यूपी के दो सांसद यह बताने के लिए खड़े हुए कि किस तरह पार्टी की चुनावी संभावनाएं खत्म हो गई हैं, तो उन्हें बाकायदा चुप करा दिया गया. उन्हें याद दिलाया गया कि वे कमजोर उम्मीदवार हैं, जो मोदी लहर के कारण जीते थे. उन्हें अपने तारणहार की आलोचना नहीं करनी चाहिए.

शाह ने बैठक में मौजूद सभी लोगों से कहा कि वे नोटबंदी के विरोध में कुछ नहीं सुनेंगे और भाजपा को यह कहना जारी रखना है कि नोटबंदी बेहद सफल रही है. उन्हें साफ-साफ कहा गया कि ‘सौ बार बोलोगे तो सच हो जाएगा.’

नेताओं और खुद प्रधानमत्री के बारंबार प्रचार के बावजूद भाजपा को इस बात की आशंका घेरे हुए है कि उसे प्रधानमंत्री की लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी. कइयों का सोचना है कि मोदी की ना तो डिजिटलीकरण की योजना और ना ही रैलियों में बनाया गया उत्साह उन्हें वोट दिला सकेगा. ऐसे लोगों का तर्क है कि बिहार चुनाव अभियान में भी मोदी ने अपनी रैलियों में अच्छी खासी भीड़ को जुटाई थी, पर उससे वोट हासिल नहीं हुए.

चुनावी गणित

2014 के आम चुनाव में भाजपा को लोकसभा में 71 सीटें मिली थीं. मोटे तौर पर 339 विधानसभा सीटें. पर अब 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में मई 2014 जैसी जीत की कोई संभावनाएं नगण्य हैं. अमित शाह ने हर सांसद के लिए उनके निर्वाचन क्षेत्र में 3 विधानसभा सीटों की जीत का लक्ष्य तय कर रखा है.

हर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में 4 से 5 विधानसभा सीटें हैं. इससे भाजपा को सैद्धांतिक रूप से 213 सीटें मिल सकती हैं. विधानसभा में स्पष्ट बहुमत. हालांकि राजनीति इस तरह की उम्मीद आधारित फार्मूले से नहीं चलती.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक यूपी में नोटबंदी से पहले और बाद के आंतरिक चुनाव सर्वेंक्षणों से सामने आया है कि भाजपा और बहुजन समाज पार्टी दोनों दौड़ से बाहर निकलती नजर आ रही हैं. इसके विपरीत हैरानी की बात है कि समाजवादी पार्टी के पक्ष में सकारात्मक माहौल बन रहा है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पांच साल की सत्ता के बाद भी शायद अखिलेश यादव के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं है.

भाजपा के लिए यूपी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना बेहद जरूरी है. यदि भाजपा यूपी में जीत जाती है, तो पार्टी और उसके निर्विवाद नेता नरेंद्र मोदी को काफी बल मिलेगा. आलोचक, जो मानते थे कि अब मोदी अर्श से फर्श पर आ गए हैं, गलत साबित होंगे. इससे 2019 में आम चुनाव में जीतने का भी ठोस आधार तैयार होगा.

यूपी और बिहार के बीच, भाजपा के पास वर्तमान लोकसभा में फिलहाल 93 संसदीय सीटें हैं. 2019 के आम चुनाव में जीतने के लिए उनमें से ज्यादातर सीटें बरकरार रखनी होंगी. यदि भाजपा यूपी विधानसभा चुनाव जीतती है, तो मोदी को अपने उम्मीदवार चुनने की काफी आजादी मिल जाएगी.

मोदी के इवेंट्स और तमाशा में एक दूसरे के साथ सामंजस्य है, पहला खत्म नहीं होता कि दूसरा शुरू हो जाता है

अपनी पार्टी से उम्मीदवार चुनने के साथ ही वे बसपा और सपा के जीत सकने वाले उम्मीदवारों को भी अपनी ओर खींच सकते हैं. यूपी में जीत का एक छोटा पहलु यह भी है कि मोदी को न केवल अपने रिकार्ड को केंद्र में बचाना है, बल्कि लखनऊ में भी.

यदि भाजपा यूपी विधानसभा चुनाव में हारती है, और पार्टी यूपी और बिहार में लोकसभा की 50 फीसदी सीटें भी बनाए नहीं रख पाती है, तो दिल्ली में अगली सरकार बनाने का अवसर उसके हाथ से निकल जाएगा. यूपी की हार से देश के अन्य हिस्सों में भी जनमानस प्रभावित होगा, क्योंकि इससे लोगों को मोदी प्रभाव के उतार पर होने का प्रमाण मिल जाएगा. जनता के बीच जो उनका आकर्षण और प्रभाव बना हुआ है, फीका पड़ जाएगा.

फिर भी दो बातें मोदी के अब भी पक्ष में हैं. पहली, हालांकि नोटबंदी के बाद भाजपा को लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है, पर विपक्ष में किसी तरह की एकता नहीं है. इसलिए कहना मुश्किल है कि भाजपा के हारने से किसे फायदा होगा. दूसरी यह कि मोदी अब तक सभी बाधाओं को मात देते रहे हैं. एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने मोदी को एक बार एक सफल इवेंट मेंजर बताया था. उनके इवेंट्स और तमाशा में एक दूसरे के साथ सामंजस्य है, पहला खत्म नहीं होता कि दूसरा शुरू हो जाता है.

ऐसे में मोदी अब भी करिश्मा कर सकते हैं, किसानों को कर्ज माफी देकर, ग्रामीण बेरोजगारों को सामाजिक सुरक्षा देकर, व्यापारियों और कारोबारियों को कर में छूट देकर, और मध्य वर्ग के लिए आयकर में कटौती करके. वे बाहरी खतरे की बात करके देश का ध्यान अंदरूनी मुद्दों से हटा सकते हैं. इससे उन्हें राजनीतिक सत्ता मिलने में मदद मिल सकती है.

ऐसे लापरवाह मुखिया को बचाने, उनका पक्ष लेने, उसमें यकीन करने के गभीर खतरे हैं. निडरता, जोशपूर्ण व्यवहार और जोखिम उठाने की योग्यता राजनीति में कभी-कभी ही सफलता दिला सकती है. इतिहास साक्षी है कि इतने व्यापक स्तर पर सामाजिक छल के नतीजे सरकार के लिए खतरनाक हो सकते हैं, और अंतत: उनके लिए भी जो इसके लिए जिम्मेदार होते हैं.

First published: 21 December 2016, 8:07 IST
 
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