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क्या टाला जा सकता था मंदसौर का किसान आंदोलन?

स्कंद विवेक धर | Updated on: 10 June 2017, 15:52 IST

मध्यप्रदेश में चल रहा किसान आंदोलन भले ही 1 जून से शुरू हुआ हो, लेकिन इसकी नींव 17 अप्रैल को ही पड़ गई थी जब यहां के नीमच में 1 रुपये में 5 किलो प्याज बिकी. इसके बाद से आंदोलन शुरू होने तक प्याज की कीमत 1 रुपये किलो से कम रही और किसानों की लागत निकलना तो दूर मंडी तक प्याज लाने का खर्च निकलना भी मुश्किल होने लगा.

क्या प्याज की कीमतें गिरने के साथ ही बाजार में हस्तक्षेप कर मध्यप्रदेश सरकार किसानों के इस आंदोलन को टाल सकती थी? वह भी तब जब इसके लिए केंद्र सरकार बाकायदा एक योजना बनाकर पैसे देने के लिए दो साल से तैयार बैठी है. क्या आप जानते हैं कि जिस मूल्य स्थिरीकरण कोष को स्थापित करने की घोषणा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने बीते 5 जून को की, वह असल में दो साल पहले ही बन जाना चाहिए था?

कृषि उत्पादों की कीमत अत्यधिक गिरने से किसानों पर पड़ने वाली मार और कीमतें ज्यादा बढ़ने से उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले बोझ से निपटने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन मार्च 2015 में 500 करोड़ रुपये का मूल्य स्थिरीकरण कोष कोष स्थापित किया गया था.

शुरू में सिर्फ प्याज और आलू के लिए बने इस फंड से केंद्रीय एजेंसियों को सीधे ब्याज रहित कर्ज मिलना था, जबकि राज्य सरकारों को यह राशि लेने के लिए अपने राज्य में एक रिवॉल्विंग फंड की स्थापना करनी थी. इस फंड में 50:50 फीसदी हिस्सेदारी केंद्र और राज्य सरकार की होनी थी. इस फंड से होने वाले फायदे और नुकसान को भी केंद्र और राज्य सरकार को आधा-आधा वहन करना था.

 

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "तीन राज्यों तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने वर्ष 2015 में ही इस रिवॉल्विंग फंड की स्थापना कर केंद्र सरकार से पैसे ले लिए. वहीं, अन्य राज्यों ने केंद्र सरकार के बार-बार पत्र लिखे जाने के बावजूद इस फंड की स्थापना नहीं की."

तत्कालीन कृषि सचिव सिराज हुसैन के मुताबिक, राज्य सरकारें अपनी जेब से इस फंड के लिए पैसा देना ही नहीं चाहतीं. इसीलिए केंद्र द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद उन्होंने अपने यहां रिवॉल्विंग फंड नहीं बनाया. रिवॉल्विंग फंड न बनने की वजह से केंद्र ने भी राज्यों को पैसे नहीं जारी किए. ऐसे में जब प्याज की कीमत गिरीं तो बाजार हस्तक्षेप के लिए मध्यप्रदेश सरकार के पास कोई कोष ही नहीं था, जिससे तत्काल प्याज को ऊंची कीमत में सीधा किसानों से खरीदा जा सके.

इधर, 1 अप्रैल 2016 को यह फंड कृषि मंत्रालय से लेकर खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के सुपुर्द कर दिया गया. राज्यों द्वारा पैसा लेने की वजह से इस फंड का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हुआ और अब यह फंड 1,500 करोड़ रुपये का हो गया है. मंत्रालय बदलने के साथ ही इस फंड को लेकर सरकार का नजरिया भी बदल गया.

उपभोक्ता मामले विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "हमारे मंत्रालय का फोकस उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर वस्तु उपलब्ध कराना होता है. ऐसे में हम जरूरी वस्तु की कीमत ज्यादा बढ़ने पर ही इस कोष का उपयोग करते हैं, ताकि उपभोक्ता पर ज्यादा बोझ न पड़े." अधिकारी के मुताबिक, केंद्र स्तर पर सिर्फ दालों की खरीदारी के लिए ही इस फंड का उपयोग किया जा रहा है. प्याज की खरीदारी का केंद्र के स्तर पर अभी कोई विचार नहीं है.

First published: 10 June 2017, 15:52 IST
 
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