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3 साल बाद भी भाजपा को गुजरात में मोदी की क्यों ज़रूरत है?

राजीव खन्ना | Updated on: 24 May 2017, 10:43 IST
आर्या शर्मा/ कैच न्यूज़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो गए हैं. इन तीन सालों में उन्होंने हमेशा अपने होम टर्फ गुजरात को विकास के प्रतीक के रूप में पेश किया है. वे 'गुजरात मॉडल' को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की पूरी कोशिश करते रहे हैं. पर क्या गुजरात सचमुच ऐसा रहा है?

गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी का प्रभुत्व इतना बढ़ गया कि वे अपने संगठन से भी ऊपर नज़र आने लगे. अब स्थिति यह है कि राज्य में भाजपा की पहचान मोदी से हो रही है न कि मोदी की पहचान भाजपा से. यह इस बात से सिद्ध है कि विधानसभा चुनावों में वे पार्टी के मस्कट रहेंगे. इस साल मोदी राज्य में चौथी बार आए हैं और अपने नाम से भाजपा के लिए जनता का समर्थन मांग रहे हैं.

 

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अस्थिर राजनीति

गुजरात को संघ परिवार की कर्मस्थली और भाजपा का गढ़ माना जाता है. यहां यह खुद को अजेय होने का दावा करती है, लेकिन मोदी के यहां से जाने के बाद राज्य में पार्टी के लिए कुछ खास संतोषजनक नहीं हुआ.

करीब 14 साल तक मोदी ने यहां शासन किया. जब भी असंतोष के संकेत नज़र आए, तुरंत दबा दिया गया. पर उनके नई दिल्ली आने के बाद यह स्थिति नहीं रही. दो बार मुखिया बदलने पड़े. मोदी के बाद आनंदीबेन पटेल सीएम बनीं, पर विशेषज्ञों का कहना है कि आरएसएस को उनके प्रतिद्वंद्वी अमित शाह को केंद्र में भाजपा अध्यक्ष बनाना पड़ा.

आनंदीबेन के कार्यकाल में हमेशा चर्चा रही कि उनकी जगह या तो शाह को लाया जाएगा या फिर उनके किसी आदमी को. और आखिर उनकी जगह विजय रूपानी को सीएम बनाया गया, जिन्हें मोदी और शाह दोनों का क़रीबी माना जाता है. पर शासन चाहे आनंदी का रहा या रूपानी का, आम धारणा है कि पुलिस के कामकाज सहित गुजरात की सरकार केंद्र से नियंत्रित है.

आनंदीबेन के बाद उम्मीद थी कि यह शीर्ष पद नितिन पटेल को मिलेगा, पर शाह के करीबी होने के कारण रूपानी को सीएम बनाया गया. इसे भाजपा के लिए अनुकूल माना गया. नितिन पटेल आनंदीबेन की तरह राज्य में सशक्त पटेल लॉबी के प्रतिनिधि हैं.

 

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अशांति और आंदोलन

मोदी के जाने के बाद गुजरात में अशांति और आंदोलनों का दौर रहा. आनंदीबेन के समय पाटीदारों ने हार्दिक पटेल के नेतृत्व में सरकार और शैक्षिक संस्थाओं में नौकरियों के लिए आरक्षण को लेकर आंदोलन छेड़ा. भाजपा ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, पर अब तक कोई पक्के नतीजे सामने नहीं आए. देखना है कि आगामी विधानसभा चुनावों में पटेल इसका किस तरह फ़ायदा उठाते हैं.

केशुभाई पटेल के शासन के समय आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त पटेल लॉबी भाजपा के पक्ष में हुई. मोदी के पटेल नहीं होने के बावजूद, लॉबी ने भाजपा को पूरा समर्थन दिया क्योंकि उनके हितों का कोई नुकसान नहीं हुआ था. और फिर इस समुदाय के पास कोई सशक्त नेता भी नहीं था.

पर हार्दिक ने युवाओं को उकसाया और इनमें दरारें उभरीं. नितिन पटेल को उप मुख्यमंत्री बनाने का भी कोई ज्यादा लाभ नहीं हुआ. दो दिन पहले ही नितिन ने पाटीदारों से भाजपा के लिए साथ मांगा है, यह कहते हुए कि भाजपा सरकारों ने अन्य समुदायों से ज्यादा पटेलों के लिए किया है.

एक तरफ आनंदीबेन का पटेल लॉबी ने साथ नहीं दिया, तो दूसरी ओर दलित आंदोलन ने उनके बाद सीएम बने रूपानी की नाक में दम कर दिया. उना में चार दलितों की पिटाई के बाद भड़के आंदोलन ने विकास के 'गुजरात मॉडल' की पोल खोल दी, जिसे मोदी और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर भुना रहे थे. इससे गुजरात का वह कृष्ण पक्ष भी सामने आया, जिसे अक्सर अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, राजकोट और कच्छ क्षेत्र का उदाहरण देकर छिपा दिया जाता था.

स्थितियां इससे और खराब हुईं कि पटेल और दलित आंदोलनों की जड़ें सौराष्ट्र में थीं, जहां कुल विधानसभा सीटों का करीब एक तिहाई हिस्सा है और जहां भाजपा का प्रभुत्व है. फिर आई नोटबंदी, जिसने ना केवल व्यवसायियों का धंधा खराब किया, बल्कि किसानों को भी आंदोलन के रास्ते पर ले आई. छोटे व्यवसायी तो अब भी नाराज हैं, और वे भी जिनकी हीरे उद्योग और टेक्सटाइल से नौकरी छूट गई थी.

 

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अल्पसंख्यकों के विरोध में ज़हर

अल्पसंख्यक तो पहले से भाजपा से नाखुश थे और इन अन्य समुदायों का साथ नहीं देने की मंशा से ध्रुवीकरण की पुरानी चालों को दोहराने का समय आ गया था. इसलिए गुजरात में पिछले कुछ महीनों से निषेध अधिनियम के साथ गोरक्षा कानून को और कठोर किया गया. कई स्थानों पर दंगे हुए. इसने अल्पसंख्यकों को और ज्यादा आतंकित किया.

हिंदूवादी संगठनों के दिखावों ने इस माहौल को और बिगाड़ा. विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया जैसे तत्व एक बार फिर अल्पसंख्यकों के विरोध में जहर उगल रहे हैं, और आगामी चुनावों में 182 विधानसभा सीटों में से 150 से ज्यादा सीटों की भाजपा की दावेदारी के बीच 'हम बनाम उन्हें' का माहौल बना रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा और दरियादिली दिखाने वाली है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आरके मिश्रा का कहना है, "इसलिए मोदी खुद पार्टी का समर्थन पक्का करने आए हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका यह गुजरात का 12वां और इस साल का चौथा दौरा है."

मोदी ने पिछले महीने इसी मकसद से सूरत में रोड शो रखा था. उनके समीक्षकों का कहना है कि उन्होंने गुजरात चुनावों के लिए कैंपेन शुरू कर दिया है मानो ये स्थानीय निकायों के चुनाव हों.

 

नितिन पटेल/ फ़ाइल फोटो

ख़तरनाक संकेत

मिश्रा कहते हैं, "यदि भाजपा की पहचान मोदी से होने लगी है, तो यह पार्टी के लिए खतरनाक स्थिति है. जब लोगों ने 'इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है' का नारा दिया था और उसके बाद कांग्रेस का जो पतन होना शुरू हुआ था, उससे वह अब तक नहीं उबरी है. भाजपा के लिए स्थितियां और भी बदतर हो सकती हैं क्योंकि यह काडर-आधारित पार्टी है. यह पार्टी गुजरात में एके पटेल, कांसीराम राणा, केशुभाई पटेल और मकरंद देसाई जैसे पिरामिड पर खड़ी थी. मोदी के आने के बाद यह पिरामिड उलट गया. यह तब तक सही है जब तक सब सही चल रहा है, पर जब यह सब सहज नहीं रहेगा, पार्टी के लिए स्थितियां और बिगड़ जाएंगी."

मिश्रा ने यह भी कहा कि गुजरात में मोदी शासन के समय विरोध में आवाज नहीं उठाने की संस्कृति विकसित हो गई थी. जो नेता विरोध करते, उनका राजनीतिक कॅरियर खराब कर दिया जाता. उतना कि उन्हें घुटनों के बल रेंगते हुए लौटना पड़ता. बड़े उद्योग के पूर्व राज्यमंत्री वल्लभभाई कथीरिया और गुजरात के पूर्व गृह मंत्री गोरधन झड़पिया का यही हाल हुआ था.

 

पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने पीएम मोदी के गुजरात दौरे के विरोध में सिर मुंडवाया है.

कमज़ोर विपक्ष

भाजपा के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि विपक्ष की कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है, जिस पर भरोसा किया जा सके. विपक्ष में अकेली कांग्रेस है, जिसमें लगातार राज्य स्तर पर उलट-पलट होती रही है. देखना यह है कि भाजपा के विरोध में बढ़ रहे असंतोष को यह अपने वोट में तब्दील करने में कितना सफल होती है. पिछले तीन सालों से मोदी अपने 'गुजरात मॉडल' को भुनाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, पर वही मॉडल उनके खुद के होम टर्फ में कमज़ोर पड़ गया है.

First published: 24 May 2017, 10:43 IST
 
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