Home » राजनीति » Non-Dalit Icons in UP's Dalit memorials: Is it a master plan of BJP against Mayawati?
 

क्या योगी ने माया को किनारे लगाने का 'मास्टर प्लान' तैयार कर लिया?

अतुल चंद्रा | Updated on: 7 June 2017, 13:38 IST
फाइल फोटो

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार मायावती और बसपा को झटका दे सकती है. सरकार प्रदेश में अन्य जातियों के महापुरुषों के स्मारक और प्रतिमाएं लगा सकती है, ताकि केवल दलित स्मारकों का ही महत्व न रह जाए.

इन स्मारकों में राजा सुहेलदेव, सावित्री बाई फुले, अहिल्या बाई होल्कर, दक्ष प्रजापति, गुहराज निषाद, महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की प्रतिमाएं शामिल की जा सकती हैं. इनमें दो राजपूत राजाओं के अलावा अन्य सभी अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी समुदाय से हैं.

ये प्रतिमाएं लखनऊ स्थित भीमराव आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल(आंबेडकर मेमोरियल) के अंदर और बाहर रखी जा सकती हैं. किसानों के कर्ज माफी के लिए राजस्व जुटाने और कमीशन भुगतान पर विचार कर रही योगी आदित्यनाथ सरकार ने मायावती के स्मारकों के रख-रखाव के लिए भी पैसा जारी कर दिया है.

बसपा की प्रतिक्रिया इस पर फिलहाल काफी सधी हुई हैै. पार्टी के वरिष्ठ नेता राम अचल राजभर ने कहा, "हम सिर्फ इतना कहेंगे कि हम सभी संतों और महापुरुषों का सम्मान करते हैं. उनके प्रति भी हमारी आस्था है."

सियासी तौर पर काफी संवेदनशील इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी ने टिप्पणी करने से इनकार किया है. पार्टी के एक प्रवक्ता ने लखनऊ में कहा, "हमें इस बारे में कुछ नहीं कहना है."

 

माया के पार्क

मायावती ने अप्रैल 2009 में कई बहुजन नेताओं की प्रतिमाएं प्रदेश में लगवाईं, जिसमें स्वयं अपनी प्रतिमा को भी शामिल कर दिया. इस पर बसपा सुप्रीमो की कड़ी आलोचना भी हुई थी. यहां बी आर आंबेडकर, कांशीराम, मायावती के अलावा सभी अन्य प्रतिमाएं सात फीट ऊंची हैं. ये हैं- रमाबाई आंबेडकर, छत्रपति शाहू जी महाराज, कबीरदास, संत रविदास, ज्योतिबा फुले, बिरसा मुंडा, नारायण गुरु और गुरु घासीदास की. इन प्रतिमाओं की कीमत 1.08 करोड़ रुपये आंकी गई है.

पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बताया कि आंबेडकर स्मारक के बाहर करीब 13 प्लेटफॉर्म खाली पड़े हैं, जिन पर अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई जा सकती हैं. इसी प्रक्रिया में आंबेडकर स्मारक के बाहर राजा सुहेलदेव की कांस्य से बनी 18 फुट ऊंची और अन्य संगमरमर की प्रतिमाएं लगाई जाएंगी.

 

कैच न्यूज़

महापुरुषों को उचित स्थान

राजभर बसपा सदस्य रह चुके हैं. अभी वह सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी(एसबीएसपी)के नेता हैं और पूर्वी यूपी में उन्हें अच्छा-खासा जनसमर्थन हासिल है. 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले एसबीएसपी ने भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया था.

चुनाव से पहले भी भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव की विरासत को उचित स्थान दिलाने की कोशिश की थी, लेकिन राजभर ने इसका विरोध किया. राजभर के लिए 11 वीं सदी के राजा सुहेलदेव काफी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे उसी समुदाय के हैं.

अप्रैल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ के सैनिक स्कूल का नाम सुहेलदेव के नाम पर रखने की विहिप की मांग मानने पर राजी हो गए थे. कहा जाता है राजा सुहेलदेव ने सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी को हराया था. उन्होंने विहिप की एक और मांग भी मान ली कि बहराइच में मसूद की कब्रगाह पर एक सूर्य मंदिर बनाया जाए. अभी वहां एक दरगाह है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहना है कि पहले यहां एक आश्रम होता था.

 

जातीय राजनीति

राजनीति विशेषज्ञ प्रोफेसर एस.के द्विवेदी ने कहा कि सरकार का यह कदम जातीय राजनीति को बढ़ावा देने वाला है. उन्होंने कहा, "अन्य पिछड़ा वर्ग और उच्च जाति के महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाने का निर्णय भाजपा का जनाधार बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया है. मायावती ने दलित वोटरों को लुभाने के लिए ही तो प्रतिमाएं लगाई थीं. मौजूदा सरकार का अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाने के पीछे एक उद्देश्य उनकी शिक्षा और आदर्शों को बढ़ावा देना हो सकता है."

लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख रह चुके द्विवेदी ने कहा, "कुछ हस्तियों की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर सार्वजनिक अवकाश न देने के सरकार के निर्णय से उन्हें प्रसन्नता हुई थी. मुख्यमंत्री ने कहा था कि बजाय छुट्टियां देने के सरकार को बच्चों को स्कूल में उन महापुरुषों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए. इसी प्रकार मूर्तियां लगाने के बजाय भी ऐसा ही कुछ किया जा सकता है."

First published: 7 June 2017, 13:35 IST
 
अगली कहानी