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फर्जी पार्टियों पर चुनाव आयोग का सर्जिकल स्ट्राइक एक जरूरी क़दम

अजय के मेहरा | Updated on: 25 December 2016, 7:48 IST

भारत के चुनाव आयोग ने 20 नवम्बर को घोषणा की थी कि वह उन 200 पार्टियों के नाम रजिस्ट्रेशन सूची में से हटाएगा, जिन्होंने 2005 के बाद से चुनाव नहीं लड़ा है. इस पर एक कदम और बढ़ाते हुए आयोग ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को लिखा है कि इन पार्टियों को आयकर में किसी भी तरह की छूट न दी जाए.

मुख्य चुनाव चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने हाल ही में कैच को दिए एक साक्षात्कार में बताया था कि इन राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग में पारदर्शिता बरती जानी चाहिए.

पिछले महीने देश में हुई नोटबंदी के चलते इन पार्टियों के बैंक खातों में जमा होने वाली रकम में तेजी से उछाल आया. ये सारी जमाएं उस नियम के तहत ही की गईं कि इन पार्टियों को इस बात की छूट है कि 20,000 रूपए तक की रकम का स्रोत बताने की जरूरत नहीं है. जैदी ने आशंका जताई थी कि ‘ये पार्टियां बहुत संभव है कि काले धन को सफेद बनाने का काम कर रही हों.’

चुनाव आयोग द्वारा 200 ऐसी पार्टियों को सूची से हटाने व मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा इन्हें चंदे के नाम पर काले धन को सफेद करने का माध्यम होने की आशंका जताने से दो सवाल खड़े होते हैं. पहला और बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या 1989 के बाद से कांग्रेस पार्टी के पतन के चलते भारतीय राजनीतिक दलों की लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा गई है?

दूसरा सवाल पार्टी और उनकी राजनीतिक फंडिंग पर उठता है. इससे देश में पार्टी व्यवस्था और चुनाव प्रक्रिया पर असर पड़ता है.

विभिन्न पार्टियों के आंकड़े

1952 में जब देश में पहली बार आम चुनाव हुए थे तब 14 राष्ट्रीय व 39 क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव मैदान में उतरी थीं. पांच साल बाद 1957 में जब चुनाव हुए तो पार्टी व्यवस्था और पारदर्शी नजर आई, क्योंकि इस बार 4 राष्ट्रीय और 11 अन्य पार्टियों ने भाग लिया. इसके 57 साल बाद हुए 16 वें आम चुनाव में पाया गया कि केवल 6 राष्ट्रीय, 39 क्षेत्रीय और 419 अन्य दल चुनाव मैदान में उतरे.

नई सूची में अब 7 राष्ट्रीय दल व 48 क्षेत्रीय दल शामिल हैं. अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस को राष्ट्रीय श्रेणी में प्रोन्नत कर दिया गया है. जाहिर है चुनाव लड़ने के लिए पार्टियों का पंजीकरण अनिवार्य करने के आयोग के नियम के बावजूद आजादी के बाद से देश में ऐसे दलों की संख्या बढ़ी है.

इसका सीधा सा नतीजा जो सामने दिखाई दे रहा है, वह यह है कि 1989 के बाद से चुनाव परिणामों में विघटन देखने को मिला. न केवल राष्ट्रीय दलों की कुछ राज्यों में सीमित पहुंच है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां पिछले दो दशक से इस दिशा में अधिक सतर्क हो गई हैं. यहां तक कि अब तो भाजपा में भी लगता है कि पार्टी के भीतर कोई संवैधानिक ढांचा रह ही नहीं गया है और पार्टी संगठनात्मक तौर पर कमजोर साबित हुई है.

आजादी के बाद से कई पार्टियों का गठन केवल इसलिए हुआ कि वे कांग्रेस से अलग हो कर नई पार्टियां बनी. आज तक यही ट्रेंड चला आ रहा है. बड़ी पार्टियों से टूट कर छोटी पार्टियां बनती जा रही हैं. ज्यादातर मामलों में देखा गया कि जैसे ही पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच आपसी मतभेद उभरे, बजाय पार्टी में ही समाधान ढूंढने के एक नेता ने अलग होकर नई पार्टी का गठन कर लिया.

इसके चलते ज्यादातर पार्टियां या तो परिवारवाद या व्यक्तिवाद का शिकार होती चली गईं. द्रमुक, अन्ना द्रमुक,समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, तेलगुदेशम पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, शिवसेना, बीजू जनता दल और बहुजन समाज पार्टी कुछ ऐसी ही असंगठित पार्टियों के उदाहरण हैं, जहां परिवारवाद व व्यक्तिवाद हावी है.

सबसे बड़ा रुपैय्या

करीब से जांच करने पर पता चला कि फंड की वजह से ही ये पार्टी और नेता अपने परिजनों की ओर झुक जाती हैं क्योंकि उनके लिए ये ही भरोसेमंद सहयोगी हैं. जाहिर है इन पार्टियों के न तो संगठनात्मक चुनाव होते हैं और न ही इनमें पार्टी के भीतर कोई लोकतंत्र है. दरअसल, चुनाव आयोग के नियमानुसार, पार्टियों को समय-समय पर अपने संगठनात्मक चुनाव करवा लेने चाहिए लेकिन अगर वे ये नियम मानते भी हैं तो इसके लिए वे फर्जी चुनावों का सहारा लेते हैं.

चुनाव आयोग अब तक इसे सख्ती से लागू नहीं कर पाया है. ऐसे में पार्टियां और उनको मिलने वाला चुनावी चंदा काफी बड़ी चुनौती बन गया है. आयकर और सम्पत्ति कर से छूट मिलने के चलते ये पार्टियां आयकर रिटर्न भरने के प्रति लापरवाही दिखाती हैं. इन पार्टियों का आयकर रिटर्न ऑडिट किए गए अकाउंट स्टेटमेंट के आधार पर भरा जाता है, जो कि छूट के लिए आवश्यक शर्त है. और तो और चंदा देने वाले का नाम गोपनीय रखने की छूट वाले चंदे की सीमा भी बढ़ा कर 20,000 रुपए कर दी गई है. इससे पार्टियां लगातार इस बात को छिपाती हैं कि चंदे में कितनी राशि मिली.

इसलिए कोई अचरज नहीं कि इन पार्टियों ने नोटबंदी के बाद इस नियम का दुरूपयोग करते हुए भारी मात्रा में अपने खातों में पैसा जमा करवाया हो. बार-बार चुनाव होने और उनमें होने वाले खर्च को देखते हुए पार्टियों को अपने पास पर्याप्त फंड रखना ही पड़ता है. चुनाव खर्च की सीमा भी काफी कम रखी गई है, जबकि यह हर साल बढ़ता ही जा रहा है. वर्ष 1996 में लोकसभा चुनाव का खर्च बढ़ कर 1,50,000 रुपए तक पहुंच गया और राज्य विधानसभा के चुनावों का 50,000 रुपए तक.

2011 के बाद से यह खर्च लोकसभा चुनाव का 40 लाख रुपए तथा राज्य विधानसभा चुनावों का 16 लाख रुपए तक पहुंच गया. राजनीतिक दलों को सरकार की ओर से दिए जाने वाले फ्री एयरटाइम के बावजूद ऐसे बहुत से खर्च हैं जो तय सीमा के अंदर नहीं आते. इसलिए पार्टियां और उम्मीदवार दोनों इस खर्च की भरपाई के लिए अनियमितता का ही रास्ता अपनाते हैं.

इसलिए चुनाव आयोग का यह कदम पार्टियों में व्याप्त अव्यवस्था को दूर करने और उनके वित्तीय हालात सुधारने के लिए है, लेकिन क्या सरकार इसमें और सुदार की दिशा में कोई कदम उठाएगी?

First published: 25 December 2016, 7:48 IST
 
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