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'मगहर' से चुनावी अभियान की शुरुआत कर बुआ-बबुआ महागठबंधन को पटखनी दे पाएंगे PM मोदी?

आदित्य साहू | Updated on: 28 June 2018, 13:26 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज यूपी के संत कबीर नगर से आगामी लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की. उन्होंने संत कबीर की 500वीं पुण्यतिथि पर उनकी परिनिर्वाण स्थली पर जाकर उनकी मजार पर चादर चढ़ाया और अभियान की शुरुआत की. उन्होंने कबीर अकादमी का शिलान्यास भी किया. इसके साथ ही विपक्ष यह सवाल उठाने लगा है कि आखिर ऐसा क्या है कि पीएम मोदी को कबीर याद आ गए हैं.

बता दें कि साल 2014 के चुनावी अभियान की शुरुआत पीएम मोदी ने यूपी के काशी से की थी. काशी और मगहर धार्मिक मान्यताओं के बिल्कुल विपरीत हैं. हिंदू धर्म में मगहर को अच्छे नजर से नहीं देखा जाता. धार्मिक मान्यता है कि काशी में मरने वाला व्यक्ति स्वर्ग जाता है जबकि मगहर में मरने वाले को नर्क नसीब होता है. कबीर धार्मिक मान्यताओं के बिल्कुल विरोधी थे. यहा कारण है कि अपनी मौत के अंतिम समय में वे मगहर चले गए थे और वहीं उन्होंने प्राण त्यागा था. 

बता देें कि कबीर को दलितों, पिछड़ों, शोषितों, सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता का मसीहा माना जाता है. कबीरपंथियों में सबसे ज्यादा दलित और पिछड़े समुदाय के लोग शामिल हैं. मौजूदा समय में यही समाज बीजेपी से सबसे ज्यादा नाराज दिख रहा है. इसी समाज के जरिए बसपा और सपा मिलकर मोदी को मात देने की जुगत में लगे हैं. ऐसे में पीएम मोदी संत कबीर के दर पर जाकर कहीं न कहीं जाति संतुलन के साथ-साथ ढाई करोड़ कबीरपंथियों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं.

राजनीतिक विशेषज्ञों का भी कहना है कि पीएम मोदी कबीर के बहाने दलितों और पिछड़े तबके के लोगों के मन में अपने लिए जगह बनाना चाहते हैं. बता दें कि हाल के दिनों में जिस तरह उप-चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है, उससे भाजपा की चिंता बढ़ी है.

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भाजपा की उप-चुनावों में हार का मुख्य कारण बसपा और सपा का साथ आना है. इन दोनों का ही मुख्य वोटबैंक दलित और पिछड़ा समुदाय है. एेसे में पीएम मोदी मगहर जाकर कबीर दास की मजार पर मत्था टेकने के बहाने दलितों-पिछड़ों का समर्थन पाने और अपना खोया हुआ आत्मविश्वास पाने की उम्मीद कर रहे हैं.

First published: 28 June 2018, 13:14 IST
 
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